धर्म का ‘मर्म’ और संपदावाद की ‘सियासत’

    शाहिद ख़ान
    स्वतंत्र पत्रकार

    नई दिल्ली। बड़ी मछलियां हमेशा छोटी मछलियों का शिकार करती हैं। सदियों से चली आ रही इस विद्रूप परंपरा में विस्तार और साम्राज्यवादियों का हथियार कभी धर्म और आस्था बने, तो कभी दुनिया को एक अदृश्य कल्पित भय से बचाने का वैश्विक प्रलाप किया गया। औद्योगिक क्रांति के दौर के पहले से लेकर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के पहले और बाद बनाए गए वैश्विक माहौल में झांकने से इन विद्रूपताओं की वीभत्स छाप नज़र आती है । अपने दौर की शक्तियों और महाशक्तियों ने अपने इर्द-गिर्द इसी तरह का वातावरण बनाया, जिससे उनके वर्चस्व का घेरा सदियों तक क़ायम रह सके । वर्चस्व की इसी चाह में अनगिनत बार साज़िशों की वो बड़ी घटनाएं भी हुईं, जिनके पीछे के सच को सदियों बाद भी दुनिया जान नहीं सकी, लेकिन इतिहास की समीक्षा करने पर साज़िशों और वैश्विक शक्तियों की नीयत का अंदाज़ा खुलासे की हद तक हो जाता है । चाहे यूरोप की क्रांति का दौर और इस्लाम के पराभव का दौर रहा हो, चाहे चीन की कुटिल चाह में बौद्ध धर्म को समूल ख़त्म करने की परंपरा रही हो, और चाहे बौद्ध अनुयायियों के साथ आक्रांत करने वाला व्यवहार और उनसे जुड़ी निशानियों को मिटाने, उधेड़ने का अंग्रेजों और उनके पहले के शासकों द्वारा किया गया कृत्य हो । सबमें विस्तार और वर्चस्ववाद की वही वीभत्स झलक मिलती है । इनकी साज़िशों का यूं तो कोई अंत नहीं है, क्यों कि आज भी धरती के किसी न किसी हिस्से में साज़िशों की ऐसी ही आंधी चलायी जा रही है । प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से न तो रूस, चीन अमेरिका इससे अछूते हैं और न ही जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन बचे हैं । इस मामले में बीती सदियों तक भारत का इतिहास भी वत्सल भाव में नज़र आता है । हालांकि कंस और रावण के क़िस्से आज भी मौजूद हैं, लेकिन सदियों प्राचीन इन कृतियों को समूल धार्मिक या विशुद्ध रूप से कल्पित काव्य कहने का साहस किसी में नहीं है, हालांकि ऐसी चेष्टा सुप्रीम कोर्ट कर चुका है । इन काव्यों में कल्पित 34 करोड़ देवी-देवताओं की परिपाटी और राम-कृष्ण, वराह, बामन, नरसिंह और ऐसे तमाम अवतारों के बारे में अध्ययन करें, तो अंदाज़ा लगता है, कि अवतार की ये परंपरा कल्पित या नैसर्गिक रूप से बौद्ध या अन्य धर्म परंपरा से अलग नहीं है । अवतरण की इस परिपाटी को बौद्ध मतावलंबियों ने हृदय से पकड़ रखा है । जिसे बीती सदी से चीन येन-केन प्रकारेण छीनकर और बौद्ध परंपरा से अलग करके तबाह और बर्बाद करना चाहता है। आकाशवाणी होने के बाद जैसी कुटिल चेष्टा कंस ने कृष्ण को मारने के लिए की थी, उससे भी भयाक्रांत करने की कोशिशें चीन अबतक कथित बौद्धावतार पंचेन लामा को लेकर कर चुका है । ऐसी एक बड़ी कोशिश बीती सदी के आख़िरी सालों में चीन ने की थी । चीन ने 1995 में तिब्बती बौद्ध धर्म के दूसरे सबसे अहम व्यक्ति को छह साल की उम्र में अपने क़ब्ज़े में लिया । तब बौद्ध धर्म गुरू को दुनिया का सबसे युवा राजनीतिक बंदी कहा गया था । आज ढ़ाई दशक बाद भी उन्हें देखा नहीं गया है । और इससे बौद्ध परंपरा को लेकर चीन की नीयत पर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं ।

    पंचेन लामा के बचपन की तस्वीर (1995)

                 तिब्बत के बौद्ध अनुयायी तनातन मतावलंबियों की ही तरह पुनर्जन्म और अवतार में विश्वास रखते हैं । तिब्बती बौद्ध धर्म के दूसरे सबसे अहम व्यक्ति पंचेन लामा की 1989 में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद से ही अवतार की आशा लगी जा रही थी, ये अलग बात है, कि कुछ लोगों का मानना है, कि चीन सरकार ने उन्हें ज़हर दिलाकर मौत के घाट उतार दिया था । फिर इस दशके बाद अगले ही दशक में बौद्ध धर्म के दूसरे अहम व्यक्ति पंचेन लामा के अवतरित होने के आसार जताए जाने लगे ।

    14 मई 1995 को तिब्बती बौद्ध धर्म के प्रमुख दलाई लामा ने एन पंचेन लामा को पहचाने जाने की घोषणा की । ये एक अहम घटना थी । 6 साल के गेझुन चोएक्यी न्यीमा को पंचेन लामा का अवतार घोषित किया गया । वो तिब्बत के नाक्शु शहर के एक डॉक्टर और नर्स के बेटे थे । जबकि चीनी प्रशासन को उम्मीद थी कि पंचेन लामा को बिना दलाई लामा के हस्तक्षेप के पहचान लिया जाएगा । दलाई लामा 1959 में तिब्बत छोड़कर भारत आ गए थे और तिब्बत की निर्वासित सरकार का गठन किया था । चीनी सरकार ने न्यीमा और उनके परिवार को ही परिदृश्य से बाहर कर दिया और चीनी सरकार के प्रभाव वाले बौद्ध धर्म गुरुओं से ऐसे पंचेन लामा की पहचान करने के लिए कहा, जो चीन के इशारे पर चले । इसको बेहतर तरीके से समझने के लिए चीन की कई चालबाज़ियों पर भी ग़ौर करना चाहिए । 17 मई 1995 को चीन ने उन्हें अपने नियंत्रण में लिया और तब से ही उन्हें लोगों की नज़र से दूर रखा गया । एक बार एक अधिकारी ने साउथ चाइना मोर्निंग पोस्ट को बताया था, कि वो उत्तरी चीन के गानझू में रह रहे हैं । जबकि एक थ्योरी ये भी है, कि उन्हें या तो बीजिंग में या उसके आसपास रखा गया है ।

            अक्टूबर 2000 में ब्रिटेन की तत्कालीन विदेश मंत्री रॉबिन कुक ने संसद की सेलेक्ट कमेटी को बताया था, “हर बार जब हमने गेझुन चोएक्यी न्यीमा का सवाल उठाया । हमें चीन की सरकार ने ये भरोसा दिया, कि उनकी सेहत अच्छी है, और उनकी अच्छे से देखभाल की जा रही है । और उनके परिजन अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप नहीं चाहते हैं ।”

              “बाद में दो तस्वीरें दिखाईं और बताया कि ये गेझुन चोएक्यी न्यीमा की हैं । इनमें वो घर के भीतर दिख रहे थे। लेकिन उनसे मिलने की इजाज़त नहीं दी गयी । साल 1994-95 से ही एक दल पंचेन लामा को खोज रही है, जिसने उसी दौर में उनकी एक तस्वीर ली थी । इस तस्वीर के अलावा दुनिया के सामने पंचेन की कोई सच्ची तस्वीर मौजूद नहीं है । आज ढाई दशक बाद भी बौद्ध मतावलंबियों के आगे उम्मीदों का असीम क्षितिज है, जिस में पंचेन लामा को खोज पाना अतिदुश्कर है, लेकिन जज्बे क नहीं हुए हैं, क्यों कि अब पंचेन लामा बौद्ध मतावलंबियों की लिए ही नहींस वैश्विक राजनीति में दख़ल रखने वालों के लिए भी अहम हो गए हैं । दलाई लामा की तरह पंचेन लामा को भी बुद्ध के ही एक रूप का अवतार माना जाता है । पंचेन लामा को अमिताभ, यानी बुद्ध के असीम प्रकाश वाले दैवीय स्वरूप, का अवतार माना जाता है, जबकि दलाई लामा उनके अवालोकीतेश्वरा स्वरूप के अवतार माने जाते हैं । बौद्ध धर्म के मुताबिक पारंपरिक रूप से, एक रूप दूसरे स्वरूप का गुरू है और दूसरे के अवतार की पहचान में अहम भूमिका निभाता है । पंचेन लामा की उम्र और दलाई लामा की उम्र में पचास से ज़्यादा साल का अंतर है । ऐसे में जब दलाई लामा के अवतार की खोज होगी, तो ये काम पंचेन लामा ही करेंगे, लेकिन इस परंपरा में पंचेन लामा का अस्तित्व समाप्त होना यानी बौद्ध परंपरा पर विराम लगाने जैसा है । चीन की ये साज़िश यहीं तक सीमित है, या इससे आगे भी कोई चाल बाक़ी है ।

    एक आशंका ये भी है, कि जब 1995 में चीनी सरकार ने पंचेन लामा के चयन की प्रक्रिया पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की थी, हो सकता है वह पहले से इसकी तैयारी कर रही हो । दलाई लामा ने 2011 में अपने रिटायरमेंट और अवतरित होने को लेकर एक संदेश में लिखा था ।

    वे कहते हैं कि वे मेरी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे हैं, और फिर अपनी मर्ज़ी के व्यक्ति को 15वें दलाई लामा के तौर पर मान्यता देंगे.”

    दलाई लामा, तिब्बती धर्मगुरू

        दलाई लामा के इस बयान से चीन की चाल का अंदाज़ा अच्छी तरह से लग जाता है । इसलिए ये सवाल भी खड़ा होता है, कि क्या पंचेन लामा के बिना कोई और दलाई लामा बन सकता हैं?

    दलाई लामा के पुनर्जन्म को तलाशने में पंचेन लामा की भूमिका प्रमुख रहेगी, मगर इंटरनेशनल कैंपेन फ़ॉर तिब्बत के उपाध्यक्ष भूचुंग त्सेरिंग कहते हैं, ऐसा नहीं है, कि “दलाई लामा के फिर से अवतार लेने की प्रक्रिया पूरी तरह उन्हीं के ऊपर निर्भर करती है.”

       अनुमान है कि जब समय आएगा, चीनी प्रशासन “अपने राजनीतिक हितों के लिए पंचेन लामा को या फिर पंचेन लामा के तौर पर किसी दूसरे व्यक्ति को इस्तेमाल कर करेगा, लेकिन उस समय सबसे बड़ी समस्या ये होगी, कि संपूर्ण वैश्विक समाज और बौद्ध मतावलंबी क्या चीन के बताए व्यक्ति को पंचेन लामा के तौर पर स्वीकार करेंगे । यही वो बात है, जिससे बौद्ध परंपरा को चीनी साज़िशों के बीच थोड़ा संबल मिलता है । शायद यही सब सोचकर दलाई लामा ने कहा था, कि उनका उत्तराधिकारी भारत में भी मिल सकता है, जहां वह ख़ुद और लाखों तिब्बती पिछले 60 सालों से रह रहे हैं ।

    चीन का राष्ट्रीय प्रतीक ड्रैगन

        दुनिया भर में वैश्विक शक्तियों के हित और वर्चस्व के आगे धर्म और संप्रदायों के ख़िलाफ़ कैसी साज़िश हो रही है, पंचेन लामा का मामला उसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है । इस मामले में चीन की चालबाज़ियों की तरफ़दारी दुनिया का कोई भी देश नहीं कर सकता, क्यों कि इस तह के दूसरे तमाम मामले रूस अमेरिका, लंदन, जर्मनी को मिलाकर सभी कर चुके हैं । रूस ने चेचेन्या में पीढ़ियों तक एक धर्म विशेष के लोगों को गुलाम बनाए रखा, और अत्याचार  ऐसी ऐसी दुखद घटनाएं की, जिसके बारे में सुनकर आज भी लोगों के मन में सिहरन दौड़ जाती है । यूरोप और खाड़ी देशों की खनिज संपदाओं और खास तौर से पेट्रोलियम पर नज़रें गड़ाए अमेरिका, लंदन और फ्रांस ने कैसे करोड़ों लोगों की आहूति दी, कैसे समूची मानवता को युद्धोन्माद में झोंककर देशों का बंटवारा किया और खनिजों का दोहन करने के साथ ही आज भी सत्ता-साम्राज्य की वैश्विक राजनीति कर रहे हैं । किस तरह से चीन में मुस्लिम धर्म के मानने वालों को सिर्फ़ इसलिए यातनाएं जा रही हैं, कि वो इस्लाम को क्यों मानते हैं । तो इसी तरह भारतवंशियों की हर बात हर उदार चित्त चीन को सिर्फ़ इसलिए खटकता और चुभता है, क्यों कि उसकी चाल और नीयत पर इस पड़ोसी देश की धर्म परंपरा से लेकर वैश्विक राजनीति तक सवाल खड़े करती है । पंचेन लामा, तिब्बत औऱ दलाई लामा तक ही विस्तारवाद का ये दंश सीमित रहने वाला नहीं है, इसकी आंच में पूरी धरती धुलस सकती है, क्यों कि संपदाओं की जो हवस चीन के साथ तमाम वैश्विक शक्तियों के सीने में पल रही है, वह सारी धरती से मानवता का नाश करके, धरती को भस्म करके, इस धरती के कुछ चुनिंदा लोगों को सर्वोत्तम की सत्ता के तर्ज पर चांद और मंगल पर नये जहान के तौर पर आबाद भी कर सकती है । इन साज़िशों की आहट हर मानवतावादी को अवश्य करना चाहिए, वरना! धर्म पर निशाना लेकर नाश इन इंसानों का ही किया जाएगा । बौद्ध और पंचेन लामा की लड़ाई पूरी दुनिया के प्रबुद्ध समाज को लड़ना होगा ।