“अन्तर में भक्ति का फूल खिलाओ, फल परमात्मा तैयार रखे बैठे हैं”- सुधांशु जी महाराज

नई दिल्ली। बड़ी प्यारी सी एक कविता है कविराज रवीन्द्र नाथ टैगोर की। कविता कहती है कि फूल खुशबू बांटता हुआ, हंसता मुस्कुराता हुआ आवाज देता है फल को और उससे कहता है- आ मेरे सामने प्रकट हो, मैं तुझे ढूंढ रहा हूँ। मैं आया ही इसलिए हूँ कि तुझे निमन्त्रण दे सकूँ और तेरे माध्यम से इस लोक के कल्याण में सहायक बन सकूँ।

आप जानते हैं कि किसी पेड़ पर जब भी फल आता है तो पहले फूल आता है। फूल ने कहा कि तू आ जा! मैंने खुशबू रखी है तेरे लिए, कोमलता रखी है तेरे लिए, मिठास बसाई है तेरे लिए, आ तू आ। कहते हैं कि फूल ने जब ऐसा निमन्त्रण दिया तो फल की आवाज आई- मैं तो आया हुआ हूँ, मैं तेरे ही पास हूँ और तेरे ही दिल में छिपा हुआ बैठा हूँ। तेरे निमन्त्रण के लिए धन्यवाद। मैं तो तेरे हृदय में हूँ और अब प्यार से प्रकट होने ही वाला हूँ। आप लोग जानते हैं कि फल हमेशा फूल के हृदय में बैठा हुआ होता है। ठीक यही स्थिति मनुष्य की है।

कहा जाता है कि इन्सान अपने जीवन में प्रसन्नता और मुस्कुराहट लेकर अपने पास जो भी कुछ गुणों की सुगन्ध हो सकती है उसे लुटाता चला जाए। उसे फल की तरफ देखने की जरूरत नहीं है, फल उसके हृदय में अपने आप प्रकट होगा। यह फल कोई और चीज़ नहीं होती, बल्कि परमात्मा की कृपायें होती हैं जो रस बनकर हृदय से प्रकट हो जाती है। इसलिए उस प्रभु प्यारे को निमंत्रण देना नहीं पड़ेगा और यह पूछना नहीं पड़ेगा कि मैं तुझ तक कैसे पहुँचूँ। मैं आपसे कहता हूँ कि अपने-आपको प्यारे परमेश्वर में लीन कर दो और उसमें खो जाओ। आप ऐसा कर सके तो आप पाओगे कि ईश्वर सामने खड़ा हुआ है। उसे पाने में फिर कोई देर नहीं लगेगी।

आध्यात्मिक इतिहास के पन्नों में झांकें तो आप पाएँगे कि हमेशा यही हुआ है। जब भी किसी महापुरूष ने किसी ग्रन्थ का बहाना लेकर कुछ कहा, माध्यम या बहाना जरूर वह होता है लेकिन हुआ यही है कि जब उसके हृदय में भक्ति का फूल उगा, तब परमात्मा फल बनकर प्रकट हुआ और उनकी वाणी के माध्यम से रस बनकर दूसरों पर बरसा। यह तो उसका ढंग है अपने आप को प्रकट करने का, लेकिन प्राकट्य की सीढ़ी यही है। हमें परमात्मा के संसार रूपी इस पेड़ पर फूल बनना होगा, फल की इच्छा किए बिना भी वह आएगा और आपको अवश्य प्राप्त होगा।