“परमात्मा के नाम की जड़ी-बूटी सूंघें, जीवन के विष को समाप्त करें” – सुधांशु जी महाराज

    नई दिल्ली। गीता में भगवान ने कहा- “आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।’’ बड़े-बड़े ज्ञानियों को इस वैरी ने दबा रखा है। बड़े बड़े ज्ञानी लोग इस वैरी से दबे पड़े हैं। कहा गया है कि जो इसको दबा जाये, असली ज्ञानी तो वह है। दबाने से मतलब है इसको मिटाया जाए और कुछ प्रयोग करके इसे सकारात्मक रूप देकर इस बैरी को मित्र बना लिया जाए।

    यह बैरी कौन है? वो है अनुचित ग़ुस्सा। वेद सूत्र को मानकर आप इसे ‘मन्यु बना लें तो यह बैरी से मित्र बन जाए। वह मन्यु अनीति व अत्याचार को निरस्त करने में सहयोगी बनेगा और आपकी कीर्ति को अमर बना देगा। आप जिधर जाना चाहते हो उधर का अभ्यास करो। जिधर से अपने को रोकना है उधर का वैराग्य पैदा करो। इसे ही नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलना कहा जाता है।

    क्रोध की हानियॉं, काम की हानियॉं, लोभ की हानियॉं अपने मन को गिनाओ, बुद्धि को समझाओ और क्रोध न करने से जो लाभ होता है वे विशेषतायें बताओ़। विश्वास करो कि वह धीरे-धीरे समझेगा और ठीक होगा। इससे भी अलग एक बात परमात्मा के नाम के स्मरण की जो औषधि है, वह ऐसी अचूक संजीवनी है जो अपना असर ज़रूर दिखाती है। एक उदाहरण है कि जब सर्प नेवला को काट लेता है, तब नेवला भागकर कोई जड़ी-बूटी चबा लेता है और उसका विष समाप्त हो जाता है। वह आकर फिर लड़ता है और अक्सर विजयी होता है।

    कहते हैं कि जब संसार की वासनाओं का विषधर काटे, तब परमात्मा के नाम की जड़ी-बूटी को चबाना चाहिये, किसी विषय वासना का असर काम करेगा ही नहीं, जहर चढ़ेगा ही नहीं। क्रोध से क्रोध भड़क सकता है। अग्नि से अग्नि जलती है लेकिन बुरा करने वालो के लिए जो व्यक्ति अपनी प्रार्थना के आसन पर बैठकर मंगल कामना करना शुरू कर दे, उसका भगवान अवश्य भला करते हैं।

    लेखक विश्व जागृति मिशन के संस्थापक हैं।