कहाँ गए जीवित और जैविक सब्ज़ियों की बेलों वाले वो छप्पर, खपरैल और मुँडेर -राम महेश मिश्र

    नई दिल्ली। दीवारों पर सब्ज़ियाँ। छप्परों पर सब्ज़ियाँ। खपरैलों पर सब्ज़ियाँ। मुँडेरों पर सब्ज़ियाँ। छतों पर सब्ज़ियाँ। जैविक और स्वास्थ्यप्रद सब्ज़ियों से गाँव का हर कोना हरा-भरा। यह हमारे देश के गाँवों का स्वर्णिम इतिहास रहा है।

    याद है! हमारे बचपन में अम्मा खुरपी से ज़मीन में हमसे छोटा सा गड्ढा ख़ुदवाती। पानी व खाद डलवाती, उसमें एक ‘बीज’ डलवाती, फिर मिट्टी से ढकवाती। कहती- इसमें हरा-हरा नरम-नरम अंकुर निकलेगा। कुछ दिनों बाद वह निकलता, तब हम बड़े ख़ुश होते। हम बच्चे बार-बार उसे देखते, स्कूल से लौटकर सीधे उसके पास जाते, उसका ध्यान रखते, उसके आसपास उग गए खर-पतवार को हटाते। वह पौधा बड़ा होता, तब माँ पास में एक लकड़ी गड़वाती, पौधे को धागे के सहारे लकड़ी पर और बाद में दीवार पर चढ़वाती। एक दिन वह पौधा बेल बनकर छप्पर पर चढ़ जाता और उस पर ख़ूब फैल जाता।

    थोड़े दिनों बाद हम देखते, उसमें ढेर सारी सब्ज़ियाँ आ गईं हैं। लौकी, कद्दू, तोरई आदि-आदि। घर में ताज़ी तरकारी (सब्ज़ी) बनती और वह बड़ी स्वादिष्ट होती। उन दिनों अनाज की भारी कमी थी, सो कई लोग सब्ज़ियों से ही पेट भर लेते और ग़ज़ब के ताक़तवर बनते। उन बेलों, उन पर आए फूलों उस सब्ज़ी से अनेक जीवों एवं पक्षियों का भी पोषण होता। सब्ज़ी ज़्यादा निकलने के कारण माँ उसे पास-पड़ोस में भी बंटवाती, जिससे सम्बन्धों में मधुरता आती। कभी छुट्टी के दिन अम्मा हमें शहर भेजती। हम मौसी इत्यादि के पास वह सब्ज़ी पहुँचाते। वह बड़ी ख़ुश होतीं और सबको बतातीं, बहनौता सब्ज़ी लाया है, जिज्जी ने भेजी है। उसमें से पड़ोसी लोगों को भी देतीं। वे भी हमें प्यार करते। इससे रिश्ते मज़बूत बनते और भावना से भर जाते। शहर के पास के गाँवों के ग़रीब-गुरबे शहर जाकर कुछ सब्ज़ी बेच भी आते, जिससे कुछ नगदी घर में आ जाती। उन सब्ज़ियों की आर्थिकी आज की सब्ज़ी के भारी-भरकम मूल्य के हिसाब से देखें तो समूचे देश की वह घरेलू सब्ज़ी आज अरबों-खरबों रुपये की बैठेगी।

    राम महेश मिश्र, निदेशक, विश्व जागृति मिशन, नई दिल्ली

    आज गाँवों में छप्पर, खपरैल, मुडेर सब नंगे पड़े हैं। गाँव के युवक बाईक पर बड़े थैले में शहर से बासी और ज़हरीली सब्ज़ी गर्वीले भाव से लाते हैं और वह चाहते हैं कि लोग देखें कि वे ढेर सी सब्ज़ी लिए जा रहे हैं। सच तो यह है कि यह गर्व का नहीं बल्कि शर्म का विषय है।

    क्या हमारे गाँवों के उस अतीत को कोई वापस ला सकता है? आइए! कुछ मॉडल विलेज बनाएँ, जो अन्य गाँवों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकें तथा हमें जीवित और जैविक सब्ज़ी मिल सके।

    यह सब लिखने की प्रेरणा मुझे अभी मिली, जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर जिले के उकावली गाँव स्थित ‘गायत्री गौधाम’ की दीवारों पर फैली सब्ज़ियों की बेलों के फ़ोटोग्राफ़ सोशल मीडिया के ज़रिए प्राप्त हुए। हमारे मार्गदर्शक गुरुवर पं.श्रीराम शर्मा आचार्य की स्नेहछाया में पुष्पित व पल्लवित इस आध्यात्मिक केन्द्र से हमारी संस्कृति के कई पक्षों का ‘भाग्योदय’ हो रहा है।