बदहाली में जीने को मजबूर हैं वृंदावन की विधवाएं

    वृंदावन/ उमाशंकर उपाध्याय- प्रतिमा चतुर्वेदी। नारी यत्र पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता, जहां नारी की पूजा होती है वहाँ भगवान निवास करते हैं, और वहीं समृद्धि भी होती है…लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है ? हमारे समाज मे ऐसे रीति रिवाज और सामाजिक कुरीतियां हैं जो इन पंक्तियों पर से हमारे विश्वास को हटाने पर मजबूर कर देती हैं। पति की मौत के बाद समाज की कुरीतियों को अपनी किस्मत मानकर ये विधवाएं वृंदावन का रुख करती हैं। 

    वृंदावन जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां आने मात्र से ही तमाम दुख खत्म हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है । वृंदावन यानि भगवान कृष्ण की नगरी, गोपियों के बीच गाय चराने वाले बंसी बजैया की नगरी, राधा रानी के साथ रासलीला रचाने वाले कृष्ण कन्हैया की नगरी। जहां की मान्यता है कि कोई भूखे पेट नहीं सोता। राधे राधे की गूंज यहां की आबो हवा को सुरमयी कर देती है। इसके साथ ही अपनी पवित्रता की छटा बिखेरने में कोई कसर नहीं छोड़ती है। यह भारत का एक प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटन स्थल है। यहां के मंदिरों भजनाश्रमों में लाखों का चढावा सदियों से चढता आ रहा है। यहां की चमक दमक देखते ही बनती है। इन मंदिरों की भव्यता साक्षी है सुनहरे दौर की, वक्त के साथ साथ बहुत कुछ बदला चढ़ावा आनलाईन हुआ। बाजार बढ़ा, रोजगार बढ़ा, अगर कुछ नहीं बदला तो यहां रह रही विधवाओं का रुप। सफेद साड़ी में लिपटी एक नहीं बल्कि सैकड़ों माएं यहां अपनी बची खुची जिंदगी गुजारने पर मजबूर हैं। यह मजबूरी उनके अपनो ने उनके दामन में दी है, जिनके एक हुमक पर गहरी नींद से जाग कर उनको लोरी सुनाना वो जिनके सुख दुख अपने ममता के आंचल में यूं समेट लेना कि दर्द छू मंतर हो जाए, वक्त की हर आधी में वो दीवार की मानिंद ख़ड़ी रहीं लेकिन जब उनको हमारी जरूरत पड़ी तो हमने उनको दी कड़ी धूप और कड़ाके की ठंढ़ भरी खुली छत जहां आश्रय के नाम पर दो वक्त की रोटी जुटाना भी उनके लिये हिमालय पर जाने से कम ना था।

    लगभग 5000 मांताएं वृंदावन में रहती हैं ये वो औरते हैं जो समाज और परिवार से ठुकराई हुई हैं। एहसास और दर्द से कोसों दूर एक नई दुनियां बसा चुकी हैं, जहां इनके और द्वारिकाधीश के अलावा दूसरा कोई नहीं है। वृंदावन की सड़कों पर झुर्रियों भरे चेहरे दुखी काली अंधेरे में झांकते निरीह आंखें मटमैली सफेद धोती में लिपटी हुई लाठी के सहारे दर दर भटकने और भीख मांगने वाली लाचार बूढ़ी विधवा औरतें जो हर पल आप के सामने से निकलती दिखाई देगी और उनकी आंखों में एक दुख भरी दास्तां एक सवाल हमेशा दिखाई देता है कि क्या कभी बदलाव आ पाएगा। विधवा जीवन बेहद कठिन है पति का बिछड़ना और उसपर समाज के ताने जिंदगी को मुश्किल ही नहीं बल्कि बोझल भी बना देती हैं। ये जिंदगी जो अपनों के बीच गुजरनी चाहिये थी वो गुजरती है वृंदावन की तंग गलियों और अंधेरे छोटे कमरों में और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हुए कभी भजन गाकर तो कभी बाजार में सड़को पर मंदिरों के सामने अपने आंचल फैलाकर चंद सिक्के सिमेटे जिंदगी की घनघोर अंधेरे में कुछ पल ही सही जीने की राह सिखा जाते हैं। कान्हा की चरणों में अपने जीवन की आखिरी सांसे गुजारने की इच्छा लेकर देश भर से यहां जो विधवायें आती हैं उनमें ज्यादातर बंगाल से आई हुई हैं। पति की मौत के बाद इन कुरीतियों को अपनी किस्मत मान यह वृंदावन तक पहुंच जाती हैं। वृंदावन जिसके बारे में मान्यता है कि यहां के आबो हवा कृष्णमयी और यहां अलग आनंद की अनुभूति होती है, जो मोक्ष की तरफ ले जाता है। भक्ति काल के प्रमुख कवि चैतन्य महाप्रभु ने भी इन विधवाओं के सामाजिक तिरस्कार को देखते हुए उनके बाकी के जीवन को प्रभु भक्ति की ओर मोड़ा और वृंदावन आने के लिये प्रेरित किया। ५०० साल पहले चैतन्य महाप्रभु के जरिये शुरु की गयी यह प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है। वृंदावन के मंदिरों से जुड़ी सात देवालय बनाई गयी थी जिनमे अपार संपदा थी। उस दौर में इन्हें रहने खाने और कपड़े की फिक्र नहीं करनी पड़ती थी, जो उन दिवालयों में रहती थीं और भजन कीर्तन करती थीं। हालाकि समय एक सा कभी नहीं रहता है कुछ दिन बाद इनके आश्रम छीन लिये गये। आज उस जगह पर गेस्ट हाउस देखने को मिलेगा साथ ही इन विधवाओं के लिये जो योजनायें बनाई गयी थी वो कागजों में खो गयी। उस जमाने के आश्रम और आज के आश्रम में ज्यादा फर्क देखने को मिलता है। पुराने आश्रम में भूमाफियाओं के कब्जे के बाद विधवाओं के लिये सरकार ने जो आश्रम बनवाये थे उनके रखरखाव के लिये राज्य और केंद्र सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ सवालों में सिमट कर रह गया। हालाकि सरकार ने कुछ आश्रम बनवाये थे औऱ इन विधवाओं के पालन पोषण का जिम्मा अपने कंधों पर लिया था लेकिन सरकारी तंत्र की गैर जिम्मेदाराना हरकत ने गैर सरकारी संस्थाओं को आगे आने पर मजबूर होना पड़ा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वृंदावन में 3151 विधवा एवं बेसहारा महिलाएं विभिन्न सरकारी और निजी आश्रमों में रहती हैं, जबकि फुटपाथों, रेलवे स्टेशन, मंदिरों की चौखट पर पड़ी रहने और वहीं दम तोड़ देने वाली बूढ़ी विधवाओं की गणना कभी की नहीं गई। एक अनुमान के अनुसार, वृंदावन में 5000 से ज़्यादा विधवाएं हैं. सरकारी एवं निजी आश्रम विधवाओं के लिए जेल बन चुके हैं. आश्रम की छोटी-छोटी सीलन भरी कोठरियों में तीन-चार विधवाएं एक साथ रहने के लिए मजबूर की जाती हैं। सरकारी और गैर सरकारी आश्रमों में रहने वाली विधवाओं को पेंशन देने का प्रावधान है। आश्रम संचालक बूढ़ी अनपढ़ महिलाओं से फॉर्म पर अंगूठा लगवा कर बैंकों में उनके खाते खुलवा देते हैं. तीन सौ रुपये प्रतिमाह के हिसाब से साल में दो बार विधवाओं के खातों में 1800 रुपये आते हैं, लेकिन आश्रम संचालक बैंककर्मियों की मिलीभगत से चेक पर विधवाओं से अंगूठा लगवा कर सारे पैसे निकाल लेते हैं और उनके हाथ सौ-दो सौ रुपये रखकर बाकी पैसा हड़प कर जाते हैं। हालाकि विधवाएं अनपढ़ हैं, बांग्लाभाषी हैं, इसलिए बैंक अधिकारियों या प्रशासन के किसी अधिकारी तक वे न तो पहुंच पाती हैं और न अपने दर्द-शोषण की कहानी उन तक पहुंचा पाती हैं। आश्रमों में मीडिया के प्रवेश पर रोक है। मीडियाकर्मी वहां जिलाधिकारी की अनुमति से प्रवेश पा सकते हैं। जब किसी संस्था या मीडियाकर्मी द्वारा विधवाओं से मिलने के लिए जिलाधिकारी को पत्र दिया जाता है, तो आश्रमों की व्यवस्था सुधार दी जाती है। विधवाओं को नई धोतियां दे दी जाती हैं, उन्हें बाहरी लोगों के सामने क्या बोलना है, यह अच्छी तरह रटा दिया जाता है. यदि कोई महिला अपनी व्यथा बता दे, तो बाद में उसके साथ अमानवीय व्यवहार होता है, उसकी बेइज्जती की जाती है, उलाहना दिया जाता है, उसका खाना बंद कर दिया जाता है। जो विधवाएं सरकारी या गैर सरकारी आश्रमों में कैद होकर नहीं रहना चाहतीं और सड़कों पर जीवन व्यतीत कर रही हैं, उनकी भी कम दुर्दशा नहीं है। वे पेट की भूख मिटाने के लिए मंदिरों के आगे बैठकर भीख मांगती हैं। रात में उन्हीं मंदिरों की चौखट पर सो जाती हैं। क्योंकि वे किसी सरकारी या गैर सरकारी आश्रम में नहीं रहतीं, लिहाजा उन्हें न तो वृद्धावस्था पेंशन मिलती है और न विधवा पेंशन। सड़कों पर मृत्यु को प्राप्त होने वाली विधवाओं के शव कई-कई दिनों तक वहीं पड़े रहते हैं, उन्हें न तो नगर निगम उठवाता है और न ही आश्रम। वहां पड़ी लाशें सफाईकर्मी कूड़ा ढोने वाली गाड़ियों में लादकर यमुना तक पहुंचा देते हैं।

    वृंदावन धार्मिक नगरी है, लेकिन किसी कथा वाचक, धर्म प्रचारक, साधु-महात्मा अथवा पंडे-पुजारी ने विधवाओं के समुचित अंतिम संस्कार के लिए कभी कोई पहल नहीं की। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने नवंबर 2008 में इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग को सर्वेक्षण का आदेश दिया था। केंद्र और राज्य सरकारों को विधवाओं की दशा सुधारने के लिए कहा गया था। लेकिन अब तक कोई कदम नहीं उठाए। वृंदावन में देशभर से आई विधवाएं रहती हैं, जिनके जीवनयापन का सहारा है दान और भीख. किसी राजनीतिक दल को उनकी फ़िक्र न थी है और न है. क्योंकि वे किसी वोटर लिस्ट में नहीं हैं. वो क़तार की आख़िरी हैं….।