देवी बंदी माई मंदिर की अनोखी मान्यता, फल, फूल, सिंदूर से नहीं बल्कि ताला-चाभी चढ़ाने से होती हैं माता प्रसन्न

वाराणसी/ डॉ. आनंद पांडेय। देवी मां को फल, फूल, सिंदूर सभी काफी प्रिय होता है। भक्त जब अपनी मुरादें लेकर मां के दरवाजे पर आते हैं तो यही उन्हें चढ़ाते हैं। लेकिन वाराणसी के घाट पर देवी मां का एक ऐसा मंदिर है जहां भक्त मां को ताला और चाभी चढ़ा कर खुश करते हैं। इतना ही नहीं अगर कोई व्यक्ति मुकदमे और जेल में बंद होने से परेशान है तो देवी बंदी माता के दरबार में शीष झुकाने जरुर आये। कोर्ट कचहरी जैसी समस्या से तुरंत छुटकारा मिल जाएगा। ऐसी मान्यता है कि बड़े से बड़े मुकदमों से देवी बंदी माता अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।

मंदिर के पुजारी सुधाकर दुबे बताते हैं कि जो व्यक्ति कोर्ट कचहरी के मामले में परेशान होते हैं वो यहां आते हैं। इसके अलावा जो लोग जेल में बंद होते हैं उसको लेकर मन्नत स्वरुप यहां पर ताला लगाते हैं, जब उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं फिर वो आकर ताला खोलते हैं और मां के पूजन की जो विधि हैं मां को लाल फूल, चुनरी नारियल, लाल मीठा जैसे मलपुआ हुआ, गुलगुला हुआ इन सब का विशेष भोग लगाते हैं।

मंदिर में पूजा करने एक आए एक श्रद्धालु ने बताया कि उसके पति और एक औरत ने उसपर गलत आरोप लगाया था जिसकी वजह से वो बहुत परेशान हैं। उन्हें किसी ने बताया कि आप मां के मंदिर में जाईए आपका काम हो जाएगा।

जनश्रुति है कि देवी बंदी माता के इस मंदिर की स्थापना भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र अनिरुद्ध ने करवायी थी। मां के इस मंदिर की कहानी भी बड़ी रोचक है। उन्हें पाताल की देवी माना जाता है लेकिन भगवान विष्णु की आज्ञा से उन्होंने यहां वास किया था।

मंदिर के पुजारी पंडित सुधाकर दुबे बताते हैं कि यहां पर जो काशी में प्राचीन मंदिर हैं, भगवान श्री कृष्ण के लड़के अनिरुद्ध के द्वारा स्थापित हैं और यहां इस पारामंडल में इलाहाबाद का जो तीर्थ फल काशी में प्राप्त होता है, यहां सभी देवता विराजित हैं, और मां के एक साईड में दक्षिण मुखी हनुमान जी भी विराजित हैं।

धर्मयात्रा फाउंडेशन की संरक्षिका आशा पांडेय ने बताया कि यह एक मात्र देवी हैं जो देवताओं को भी बन्धनों से मुक्त करती हैं। देवी ने जब सतयुग में सभी देवों को मुक्त करा कर श्री राम से पूछा की देवों का कल्याण हो गया अब मैं कहा जाऊ तो भगवान ने कहा बाबा औगढ़ की राजधानी काशी में जाकर वास करो और अपने भक्तों का कल्याण करों तो देवी काशी आ गयी थी।

पौराणिक कथा के मुताबिक मां बंदी ने अहिरावण की जेल से भगवान राम और लक्ष्मण को मुक्ति दिलाई थी। ऐसी भी मान्यता है कि बंदी देवी, माता सीता का ही रूप हैं। इसलिए भक्तों का विश्वास है कि कोर्ट-कचहरी और जेल के मामलों में मां भक्तों की रक्षा करती हैं। इस मंदिर में मनोकामना पूरी होने पर भक्त ताला खोल देते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि कि मां का 41 दिन दर्शन करने से भी मनोकामना पूरी हो जाती है।

मनोकामना पूरी होने के बाद एक श्रद्धालु ने बताया कि वो 41 दिनों तक लगातार दिया जलाने आई। उसके घर में बहुत प्रॉबलेम्स चल रही थी। उसने बताया कि उनके मकान में एक 70 साल के किराएदार ने पिछले 20 सालों तक का किराया नहीं दिया था। इसके अलावा उसने उलटा केस भी कर दिए थे। जिसकी वजह से बहुत परेशान हो गए इस दौरान उसके दादा-दादी की भी डेथ हो गई। इसके अलावा उसके पापा और चाचा घर में रहते थे। उनको भी वो लोग रात में शराब पीकर बहुत परेशान करते थे तो किसी ने मां के बारे में बताया। जानकारी मिलने के बाद वो अपनी मम्मी के साथ यहां लगातार 41 दिन तक आई। चमत्कार ऐसा हुआ कि मात्र दो महिने में वो 70 साल का काम हो गया। उसके उसने पूरे परिवार के साथ मां का जो भी श्रृंगार होता हैं वो किया।

देवी की चारो पहर की आरती होती है। जिसमे सहनाई की गूज और तबले की थाप से देवी जगती और सोती हैं। त्रेता युग से लेकर आज भी माता लोगों के दुखों को हरते चली आ रही हैं। इसके बारे में भी मंदिर के पुजारी सुधाकर दुबे ने बताया कि जहां तक मां की आरती है वो सुबह में एक बार 5 बजे होती है फिर एक बार दोपहर में 11 बजे होती है उसके बाद शाम को 5 बजे होती है और फिर रात में 8:30 या 9 बजे एक आरती होती हैं, चारो पहर की आरती मां की होती है।

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर मां बंदी देवी का मंदिर है। कहते हैं जो भी यहां अपनी मुरादें लेकर आता है, मां झट से उसे पूरी कर देती हैं। यहां पूरे साल भक्तों की भारी भीड़ रहती है। लोगों की आस्था है कि ताले-चाभी से मां प्रसन्न होती हैं। जो यहां आकर ताले और चाभी मां को चढ़ाता है, मां उसकी झोली खुशियों से भर देती हैं।