‘गाय सहित सभी पशुओं की रक्षा के लिए बढ़ें मजबूत कदम’- राम महेश मिश्र

    नई दिल्ली। बीते दिनों नयी दिल्ली में हमारी मुलाकात ‘चिपको आन्दोलन’ के प्रणेता पं. चण्डी प्रसाद भट्ट से हुई। उनसे उत्तराखण्ड के पर्वतीय जंगलों पर कुछ दशकों पहले छाये आत्मघाती घटाटोप के दौरान हजारों स्त्री-पुरुषों द्वारा वृक्षों से चिपककर ‘पेड़ों को मत काटो बल्कि मुझे काट डालो’ की ऐतिहासिक हुंकार के बारे में हुई। वह वार्ता वास्तव में बड़ी प्रेरक थी, न केवल मेरे जीवन के लिए, वरन् पर्यावरणीय संसार के लिए बड़ी महत्वपूर्ण थी।

    श्री भट्ट जी ने मुझसे कहा- देखो! हम ऋषि संस्कृति के संवाहक हैं और ऋषियों की सन्तान हैं। हमारे उन पूर्वजों अर्थात् ऋषियों ने हमें कभी नहीं सिखलाया कि किसी का सर काटकर अपने स्वार्थों को पूरा करो। लेकिन आज क्या कर रहे हैं हम? हम वृक्ष काट रहे हैं, प्रकृति को नष्ट कर रहे हैं, हमारे जीवन-सहचर अपने जानवरों को खत्म कर रहे हैं। कहा जाता है कि प्रकृति  हमारी माता है, गौ हमारी माता है, गाय को भोग लगाये बिना हमारे सभी धर्म कार्य अधूरे रहते हैं, परन्तु क्या हम अपनी इन माताओं की रक्षा के लिये आगे आते हैं? अरे! उनकी रक्षा की बात छोड़ो, हम ईश्वर से उन्हें मिला अपना जीवन भी उन्हें जीने नहीं देते। श्रद्धेय पण्डित जी ने चिपको आन्दोलन के दौर की घटनायें मुझे सुनायीं, जिसमें बड़ी महत्वपूर्ण बात यह थी कि आन्दोलन में लगे पर्वतीय अंचलों के स्त्री-पुरुषों को पेड़ पुकार-पुकार कर कह रहे थे- ‘कृपा कर मुझे मत काटो’।

    पशु होते हैं सच्चे मित्र

    जानवरों को अधिकार है कि वे स्वतन्त्र और स्वछन्द रूप से जीवनयापन करें। कुछ जानवर भी मनुष्य की तरह स्वयं के प्रति जागरूक होते हैं, उनमें भी कई क्षमतायें होती हैं, जिसके कारण ही जानवर और मानव के बीच एक घनिष्ट सम्बध है। जानवर मनुष्यों के प्रति वफादार होते हैं, दोनों के बीच की मित्रता के अनेक किस्से भी प्रचलित हैं। कई बार जानवरों ने मनुष्य की जान बचाने के लिये अपने को खतरों मे डाला है। आज भी जानवर मनुष्य से अधिक वफादार है।आज मित्रता का वह धर्म कहीं लुप्त होता जा रहा है। लोग मित्र धर्म को भूलते जा रहे हैं। आज ऐसे व्यक्ति मिलने लगे हैं जिन्होंने सहज में किसी को मित्र नहीं बनाया, और जब उन्हें सच्चा मित्र मिला भी तो वह कोई इन्सान नहीं था, बल्कि एक कुत्ता था। एक दार्शनिक ने लिखा है कि तीन मित्र ही विश्वास करने योग्य होते हैं- ’कुत्ता, बूढ़ी पत्नी और जमा नकद धन।’ आदिमानव से लेकर आज तक जानवरों ने मनुष्य से मित्रता की व उसे अपनी तरफ से प्राण देकर भी निभाया। किन्तु, मनुष्य ने आज अपने स्वार्थ के लिये मित्रता को ही ताक पर रख दिया है।

    वन्य पशुओं की घटती संख्या एक राष्ट्रीय चिन्ता का कारण

    धन-लोलुपता के कारण आज जानवर विलुप्त होने की कगार पर खडे़ हैं। सरिस्का बाघ अभ्यारण्य भारत के राजस्थान प्रान्त में है, जहां से बाघ लुप्त हो गये हैं। अब वहाँ एक भी बाघ नहीं है। उनका शिकार हो गया है या वे वहाँ से चले गये हैं। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी की एक रिपोर्ट आयी थी, जिसके अनुसार देश के सभी 24 अभ्यारण्यों में 40 हजार बाघ थे, लेकिन अब इनकी संख्या 2011 की गणना के अनुसार केवल 1706 ही रह गयी है। यह विषय बड़ी चिन्ता का विषय भी है और गम्भीर चिन्तन का भी।

    एक बात यह भी सामने आयी है कि वर्ष 2013 में बाघों के शिकार की घटनायें सबसे अधिक हुई थीं। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इण्डिया के अनुसार वर्ष 2013 में कुल 63 बाघों की मौत हुई, उनमें 48 बाघ शिकारियों के द्वारा मारे गये। यदि यही होता रहा तो मारीशस के डोडो की तरह भारतीय बाघ भी एक इतिहास बनकर रह जायेगा।

    जानवरों के बिना विकास की बात बेमानी

    जहां एक ओर तो हम जानवरों के आवासीय स्थल नष्ट कर रहे है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण प्रदूषण के कारण उत्पन्न प्राकृतिक संकट से जानवरों की प्रजातियां नष्ट हो रही हैं। आज हम विकास की बात तो करते हैं, लेकिन बेघर जानवरों के लिये कुछ नहीं सोचते। हमारे आसपास बड़ी संख्या में हमारी माता कही जाने वाली गोमाता और हमारे सबसे करीबी मित्र कुत्ते बेघर व बिना भोजन के भटकते रहते हैं, बिलखते-तड़पते रहते हैं। हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि कम से कम इन दो जानवरों के प्रति मित्रता का रिश्ता जरूर निभायें, क्योंकि ये दोनों प्राणी सदियों से मनुष्य के पारिवारिक सदस्य रहे हैं।

    पशुओं के लीगल राइट्स पर भी हो काम

    हमें जानवरों के लीगल राइट्स के लिये आगे आना होगा, क्योंकि जानवरों के अन्दर भी सोचने की शक्ति होती है, भावनाएं होती हैं, निर्णय करने की क्षमता होती है। उनके भीतर भी एक जीवात्मा होती है। एक कमी मात्र यह है कि वे अपने अधिकारों की मांग नहीं कर सकते, अपने अधिकारों के लिये हमारी तरह अनशन नहीं कर सकते। अतः हमें अपनी आत्मा को झकझोरकर उनको उनके अधिकार दिलवाने के लिये आगे आना होगा। ’जिओ और जीने दो’ का सिद्वान्त अपनाना ही होगा। ऐसा नहीं करेंगे तो भावी पीढ़ी जानवरों को डायनासोर की तरह केवल चित्रों में ही देख पायेगी।

    भारतीय नस्ल की गायों का हो संरक्षण

    देशी गाय की नस्ल धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। जिस तेजी से गायों का वध हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि भारतीय गाय शीघ्र ही एक अतीत बन जायेगी। हमें इस स्थिति को रोकना होगा और आगे बढ़कर कठोर प्रयास करने होंगे। भारत सरकार तथा राज्य सरकारें भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं। कई प्रान्तों में गोहत्या को निषिद्ध किया गया है, परन्तु वह नाकाफी सिद्ध हो रहा है। गोतस्करी पर रोक लग नहीं पा रही। इसके लिए केन्द्र सरकार को आगे बढ़कर कठोर कदम उठाने होंगे तथा गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित कर देशी गोनस्ल को संरक्षित करना होगा। यह देश वर्तमान केन्द्रीय सरकार से लगातार इसकी मांग कर रहा है। हमारा सुझाव है कि भारत सरकार ऐसा प्रावधान करे कि कम से कम ग्रामीण अंचलों में हर परिवार को एक गाय का पालन-पोषण करना अनिवार्य हो। उधर शासकीय स्तर पर गोमूत्र व गोबर जैसे वेशकीमती अवयवों का मूल्य गोपालक को देने की नियमित व्यवस्था की जाय, ताकि गोपालन स्वावलम्बी बन सके।

    पशु-क्रूरता को रोकने हेतु UNO के कदम सराहनीय

    संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2013 में निर्णय लिया था कि जीव-जन्तुओं के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर रोक लगाने और दुनिया के जंगली पशुओें के सम्बन्ध में लोक-जागरूकता बढ़ाने के लिये प्रतिवर्ष 3 मार्च को ‘विश्व वन्य जीव दिवस’ मनाया जायगा। यह एक सराहनीय कदम है। विश्व वन्य जीव दिवस एक अवसर है, जब हम सभी पशुओं एवं जन्तुओं की रक्षा एवं विकास के विषयों पर चर्चा करें और इस दिशा में सामाजिक जागरूकता फैलायें। यह दिवस वन्य जीवों के विरुद्व हो रहे अपराध के लिये तत्काल कदम उठाने की भी याद हर वर्ष दिलाता है। हमारा संकल्प हो कि इस मौके का भी पूरा लाभ हम-सब-मिलकर उठायेंगे।

    लेखक विश्व जागृति मिशन नई दिल्ली के निदेशक हैं।