पूज्य स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज, ‘कर्मयोगी शब्द’ का जीवंत उदाहरण थे – स्वामी चिदानंद सरस्वती

पूज्य ब्रह्मानन्द जी महाराज की 125वीं जयंती पर हुआ श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन

ऋषिकेश/ रोहित उपाध्याय। लक्ष्मण झूला अंतर्गत ब्रह्मपुरी में पूज्य ब्रह्मानन्द जी महाराज की 125 वीं जयंती के उपलक्ष्य में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती, गोविन्दाचार्य जी, वन्दे मातरम से सन्त आशीष गौतम जी, महामंडलेश्वर दयाराम दास जी, महन्त स्वामी सुरेश दास जी और ब्रह्मपुरी के पूज्य संतों ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया।

आप को बतादें कि स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज महान व्यक्तित्व के धनी थे, उन्होंने समाज सुधार के अनेक कार्य किये। देश की स्वतंत्रता के लिये उन्होने स्वयं केा समर्पित किया और अनेक बार जेल भी गये। आजादी के बाद देश की राजनीति एंव समाज सेवा में भी उनका योगदान रहा।
इस मौके पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि पूज्य स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज, कर्मयोगी शब्द का जीवंत उदाहरण थे। कर्म को योग बनाने में अद्भुत कला थी उनमें। शिक्षा की ज्योति जलाने के साथ अंधविश्वास और अशिक्षा जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। उनका पूरा जीवन समाज के उत्थान में समर्पित रहा।

स्वामी जी ने कहा कि लोधी समाज नहीं है लोभी समाज। लोधी समाज ने अपने लाभ या लोभ के लिये नहीं बल्कि देश के विकास; संस्कृति और संस्कारों के लिये सदैव आगे बढ़कर कार्य किया है, उन्हीं में से आती है हमारे देश की नारी शक्ति साध्वी उमा भारती जी। बात भगवान श्रीराम की हो या राष्ट्र की हो; बात गंगा की हो या यमुना की हो इसके लिये हमेशा प्राण प्रण से लगी रही। सुश्री उमा भारती जी देश, राष्ट्र, संस्कार, संस्कृति, समरसता, एकता और देश की अखंडता के लिये हमेशा तत्पर रही। गंगा स्वच्छता के लिये सुश्री उमा भारती जी ने सदैव अपना जीवन समर्पित किया है।

स्वामी जी ने उपस्थित सभी भक्तों का ध्यान जल समस्या की ओर आकर्षित करते हुये कहा कि जल समस्या व्यक्तिगत नहीं बल्कि वैश्विक समस्या है अतः समाधान भी वैश्विक स्तर  पर होने चाहिये। जल वैज्ञानिक यह घोषणा कर रहे है कि भारत में 2030 तक भूजल स्तर वर्तमान समय से आधा हो जायेगा और 2040 तक विश्व का भूजल स्तर भी तीव्र वेग से कम होता जायेगा इसलिये हमें प्रयास भी क्रान्ति के रूप में करने चाहिये। जल के बिना सृष्टि पर किसी भी जीव के जीवन की कल्पना करना असंभव है। वर्तमान समय में जीवन आधारित आवश्यकतायें स्वच्छ जल और शुद्ध वायु दोनों समस्याओं का हल वृक्षारोपण में निहित है। जब तक पर्याप्त मात्रा में पृथ्वी पर वृक्ष मौजूद थे दोनों समस्यायें भी नही थी जब से वृक्षों को काटकर कंक्रीट के जगंल खड़े हुये समस्यायें भी बढ़ती गयी। अब वृक्षों की बलि नहीं बल्कि वृक्षों के लिये बलिदान का समय है तभी हम भावी पीढ़ियों के लिये प्राकृतिक सम्पदा सुरक्षित रख सकते है।’’ स्वामी जी ने उमा भारती जी को पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक रूद्राक्ष का पौधा भेंट किया तथा सभी साथ मिलकर एक रूद्राक्ष का पौधा लगाया।