ग्यारहवीं शरीफ पर विशेष : इंसानियत के लिए मिसाल थे शेख अब्दुल क़ादिर जिलानी

लखनऊ/ अहमद फैजान। पवित्र त्यौहार ग्यारहवीं शरीफ को मुस्लिम समुदाय द्वारा पूरे विश्व में बहुत हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार को मुस्लिम सूफी संत हज़रत शेख अब्दुल क़ादिर जिलानी की याद में मनाया जाता है जो हज़रत ग़ौस आज़म के नाम से मशहूर हैं। ग्यारहवीं शरीफ हर साल इस्लामिक कैलेंडर के चौथे महीने में मनाया जाता है। दुनिया भर के मुसलमान बग़दाद के प्रसिद्ध संत की याद में पूरे माह गरीबों और यतीमों को खाना खिलाते हैं जिसे नियाज़ और फातिहा कहा जाता है। दरअसल पैग़ंबर मोहम्मद साहब ने अपने समय में हर माह की ग्यारह तारीख को यतीमों को खाना खिलाने का रिवाज शुरू किया था जिसे बाद में हज़रत ग़ौस आज़म ने आगे बढ़ाया और इस तरह ग्यारहवीं शरीफ को एक याद के साथ साथ त्यौहार की शकल में मनाया जाने लगा। इस उपलक्ष्य में सवाब कमाने पर ज़ोर दिया जाता है। शेख अब्दुल क़ादिर जिलानी इंसानियत के लिए मिसाल थे और सभी को वह मानवता, प्रेम और सद्भावना की तरफ बुलाते थे।
हज़रत ग़ौस आज़म के जीवन को जानना भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि उनसे सत्य, अहिंसा, दान और पुण्य की शिक्षा और प्रेरणा भी मिलती है। उनका जन्म ईरान के नाइफ़ नाम के क़स्बे में सन 1078 में हुआ था और इसी नाइफ़ नाम के क़स्बे को बाद में गीलान नाम से भी पुकारा जाने लगा।
उनके बचपन का नाम मोहियुद्दीन था। इनकी वंशावली पैग़ंबर मोहम्मद साहब के निवासे इमाम हसन और इमाम हुसैन से जाकर मिलती है। ग़ौस आज़म ने अपना शुरुवाती जीवन अपने शहर गीलान में बिताया और अठ्ठारह वर्ष की आयु में बग़दाद चले गए जहाँ उन्होंने विभिन्न धर्मगुरुओं से शिक्षा हासिल की औरअपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होनें बगदाद छोड़ दिया। उन्होंने पच्चीस वर्ष इराक के रेगिस्तानी क्षेत्रों में एक समावेशी पथिक के रूप में बिताए और एकांत में अपने जीवन, व्यक्तितत्व और संसार से रूबरू हुए। हज़रत ग़ौस आज़म फिर बग़दाद लौट आये और उन्होनें समाज में मानवता का संदेश देना शुरू किया। उन्होनें समाज को संसार का सही आइना दिखाकर उन्हें शांति की ओर बुलाया था। वह एक महान प्रचारक तो थे ही इसके अलावा सूफीवाद के जनक भी थे। शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी की मृत्यु फरवरी माह में सन 1166 को हुई और उनको बग़दाद में बनाये हुए उन्ही के मदरसे “बाबुल शेख” में दफनाया गया। आज भी वहां श्रद्धालुओं का मेला लगा रहता है. ग्यारहवीं शरीफ को उनकी पुण्यतिथि भी पड़ती है. इस अवसर का विशेष महत्व यही है की उनकी याद में उन्ही के बताये रस्म व रिवाज को पुनः समाज में उजागर किया जाए और समाज को लाभान्वित किया जाये जिसमें हर तरह का दान पुण्य शामिल है।