सर सैय्यद को फिर से पढ़ने और समझने की जरुरत है- अरशद जमाल

    मऊ। आज (17 अक्टूबर) सर सैयद का जन्मदिन है, जिसको सर सैयद डे के नाम से पूरी दुनिया मे मनाया जाता है। इस अवसर पर AMU में तालीम हासिल करने वाले नए पुराने छात्र सर सैयद की तलमी खिदमात को बयान करते हैं। मेरा भी यही मानना है सर सैयद मरहूम से बड़ा मुसलमानों के लिये कोई रहबर (ओलमा.ए.कराम को छोड़कर) भारत मे नही पैदा हुआ। होसकता है मेरी बातों से कई लोगों को ऐतराज़ हो मगर सोचने का सबक तरीका अलग होता है। कुछ लोग खूबियां तलाश करते है तो कुछ लोग खामियां। आप जो तलाशोगे वो मिल ही जायेगा। सर डे के अवसर पर कई लोगों के मज़ामीन पढ़ने और कुछ कॉपी करने के बाद मैं ये कहना चाहता हूं कि…1857 की क्रांति के बाद के भारत का माहौल वही था, जो मधुमक्खियों के छत्ते का होता है। आग लगने के बाद ब्रिटिश राज ने इसी माहौल में हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने की पूरी कोशिश की थी। पहले तो दिल्ली में सिर्फ मुसलमानों को मारा गया। कहा जाता है कि एक ही दिन में 22 हजार मुसलमानों को फांसी दे दी गई। फिर 10-15 साल बाद पॉलिसी चेंज कर दी गई। अब मुसलमानों को फेवर किया जाने लगा। पर मॉडर्न बनाने के लिये नहीं। सदियों के सड़े-गले नियमों के साथ ही जीने के लिये बढ़ावा दिया जाने लगा। सैयद अहमद खान ने इसी माहौल में पहले तो खूब पढ़ाई की। फिर मुसलमानों को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिये कोशिश करने लगे। उसके बाद उन्हें अंग्रेजों और इस्लाम के ठेकेदारों दोनों से निबटना था।
    सर सैयद अहमद खान जो लोगों के लिये एक नाम हो सकता है। मगर सच ये है कि सर सैयद एक ऐसा शख्स जो 200 साल पहले पैदा हुआ और 200 साल आगे की बात करता था। विरोधी कहते रहे कि ये आदमी अंग्रेजियत का मारा था। अंग्रेजी सिर में घुसी थी। पुराने जमाने के नॉस्टैल्जिक लोगों को ये इस्लाम को डुबाने वाले लगते थे। औरतों के बारे में इनके विचार को लेकर इनके ऊपर प्रश्न उठाये गये। किसी के लिये ये पहले आदमी बने, जिसने भारत को तोड़ दो देशों की कल्पना की थी। फिर किसी के लिये ये बातों से पलटने वाले आदमी बने। इस्लाम के ठेकेदारों के हाथ में नाचने वाले बने।
    इतिहास को पढ़े तो पता चलता है कि मुगल राज खत्म होने के बाद मुसलमान समाज का अपर क्लास अस्तित्व बचाने के लिये लड़ रहा था। वहीं लोअर क्लास जो कि कारीगर था, ब्रिटिश इंडस्ट्रियल सामान के मार्केट में आने से बेरोजगार हो रहा था। उधर बंगाल में राममोहन राय और उनके बाद के लोगों के कामों के चलते हिंदू समाज पढ़-लिख के नौकरियों में आ रहा था। तो अपने बादशाहों की शानो-शौकत को याद कर आहें भरने के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था मुस्लिम समाज को।
    सैयद अहमद खान ने इसके लिये एक प्लान बनाया। साइंटिफिक सोसाइटीज, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट चलाने शुरू किये। साइंटिफिक चीजों का अनुवाद होने लगा। मैगजीन आने लगी, जिसमें सोशल रिफॉर्म पर बात हो रही थी। तरीका यही था कि अचानक से सब कुछ बदलने की बात ना कर ट्रेडिशन और मॉडर्निटी दोनों को एक साथ रखा जाये और धीरे-धीरे बदला जाये।
    अब अगर इस चीज को आज के नजरिये से देखें, तो यही लगेगा कि सैयद अहमद खान परंपरा को तोड़ने से डरते थे। फूंक-फूंक कर कदम रखते थे। जब मुसलमानों ने फ़ारसी ज़ुबान को अपनाना शुरू किया था तब सर सैयद खान अंग्रेज़ी सीखने को कह रहे थे, क्योंकि आने वाले जिस कल की तैयारी सर सैयद करना चाहते थे मुसलमानों के मुस्लिम रहनुमा उसको नही समझ रहे थे।
    सैयद अहमद खान दोषी थे अपनी बात को प्यार से कहने के क्योंकि वो सबसे लड़ना नहीं चाहते थे। ये उनका स्वभाव था। क्योंकि जब सर विलियम मियर ने Life of Mahomet लिख के इस्लाम के खिलाफ लिखा, तो सैयद अहमद खान ने गोलियां नहीं चलाईं बल्कि उनके दावों पर बहस करने इंग्लैंड गये।
    सैयद अहमद खान का सबसे बड़ा योगदान था अलीगढ़ आंदोलन। 1859 में उन्होंने मुरादाबाद में गुलशन स्कूल खोला। 1863 में गाजीपुर में विक्टोरिया स्कूल खोला। 1867 में मुहम्मडन एंग्लो-ओरियंटल स्कूल खोला। उसी दौरान वो इंग्लैंड भी गये। और वहां की एजुकेशन से बड़े प्रभावित हुये। लौटने के बाद अपने स्कूलों को वैसा ही बनाने की कोशिश करने लगे। ये स्कूल 1875 में कॉलेज बन गया। सैयद की मौत के बाद 1920 में ये यूनिवर्सिटी बन गया।
    सैयद अहमद खान एक और जगह फंसे थे। उनका मानना था कि अपने हक के लिये मुसलमानों को अंग्रेजों के साथ मिलकर रहना चाहिये। य़े चीज उस वक्त के लोगों को नागवार गुजरती थी, क्योंकि लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने में बहुत कुछ गंवा दिया था। सैयद ने इस अंतर को पाटने के लिये दो पैंपलेट भी लिखे।
    Loyal Muhammadans of India और Cause of Indian Revolt. बाइबल पर भी लिखा जिसमें ये बताने की कोशिश की कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी काफी क्लोज हैं। फिर उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस जॉइन करने से मना भी किया। खुद को ऑफर मिलने के बाद भी नहीं गये. वजह दी कि पहले पढ़ाई जरूरी है। जब तक ब्रिटिश सिस्टम को समझेंगे नहीं, पार्टिशिपेट कैसे करेंगे।
    सर सैयद का पूरा फोकस था मुस्लिम समाज को पढ़ाई के जरिये बदलने पर। किसी से गिला-शिकवा ना रहे। बल्कि अपने दम पर सब कुछ हासिल किया जाये. अगर ध्यान से देखें तो यही एप्रोच आज भी जरूरी है। अगर ISIS और आतंकवाद से निबटना है तो।
    सर सैयद को अपने जीवन में ही मात खानी पड़ी। अल्लामा इकबाल पैदा हो चुके थे और ये ले के आये इंकलाब की बातें। दीन-ईमान की बातें। शेर-ए-दिल बनने की बातें। वतनपरस्ती की बातें।
    ये बातें सुनने में अच्छी तो थीं पर साइंस और रीजन से दूर थीं। बेहद इमोशनल और उत्तेजित करने वालीं। इसलिये धीरे-धीरे इकबाल मुसलमानों में लोकप्रिय होते गये और सैयद अहमद खान पीछे छूटते गये, क्यों के मुसलमानों को हर दौर में जज़्बाती बाते पसन्द आती है, अमली और मेहनत करने वाली राय को मज़हब से जोड़कर नकार दिया जाता है।
    कोई चाहे कुछ भी कहे, सैयद अहमद खान ने मुसलमानों के लिये जो सोचा था, वो आज भी सोचने वाले बहुत कम है। जो लोग काम करते है मुसलमान उनके कार्यों को छोड़कर उसके आचरण की आलोचना करने में लग जाता है। आज पूरे मुल्क में मुसलमानों का कोई बड़ा अखबार या TV चैनल नहीं है, जो था भी वो बिक गया उनके हाथों में। कहने को तो हम 20 करोड़ है।
    दूसरी जगह को छोड़िये मऊ को देखिये के यहा के उद्योग में मुसलमान सबसे आगे है, मगर एक भी आधुनिक कोचिंग या शिक्षण संस्थान कि कोई ब्यवस्था नही है, न कोई CBSE कॉलेज न लड़को का कोई डिग्री कॉलेज, न कोई तकनीकी संस्थान। मुसलमानों के तलमी इदारों में शिक्षक की नियुक्ति गुड़ दोष के हिसाब से न होकर रिश्तेदारी और दोस्ती की बुनियाद पर होती है। चुप तमाशा देखने से बेहतर है कि आवाज़ तो उठे। जबतक अच्छे शिक्षक नही होंगे तबतक अच्छे छात्र कहा से पैदा होंगे।