जानिए कहां है सुरों के राजा का प्राचीनतम और चमत्कारि मंदिर बटुक भैरव

लखनऊ/ बुशरा असलम। उत्तर प्रदेश की राजधानी में सबसे व्यस्ततम इलाका है कैसरबाग। यहां एक सैकड़ों साल पुराना एक मंदिर है। इस मंदिर की खासियत है कि कला, संगीत और साधना से जुड़ी मन्नतें यहां पूरी होती है। जी हां यह मंदिर है सुरों के राजा बटुक भैरव की।
इस मंदिर की मान्यता है कि यहीं लखनऊ कथक घराने के धुरंधरों ने अपने पैरों में घुंघरू बांध कथक का ककहरा सीखा।
मंदिर में विराजमान बटुक भैरव महाराज को सोमरस प्रिय है, इसलिए ज्यादातर भक्त एक से बढ़कर एक ब्रांड की अंग्रेजी शराब चढ़ाकर भैरव बाबा को प्रसन्न करते हैं। यहां भादौ के आखिरी रविवार को मेले की परम्परा है। दूसरे मेलों के मुकाबले यहां के मेले का माहौल बड़ा अलग होता है। हर तरह की मदिरा भैरव जी पर जमकर चढ़ाई जाती है और यही मिलीजुली मदिरा प्रसाद रूप में भी बांटी जाती है।
वरिष्ठ पत्रकार अनिल भारद्वाज बताते हैं कि बटुक भैरव मंदिर का इतिहास करीब 200 साल पुराना है। यहां भैरवजी अपने बाल रूप में विराजमान हैं। बटुक भैरव को लक्ष्मणपुर का रच्छपाल कहा जाता है। उन्होंने बताया कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार बलरामपुर इस्टेट के महाराजा ने कराया था।
लखनऊ की मशहूर राजा ठंढाई के मालिक आशीष त्रिपाठी बताते हैं कि इस मंदिर में दोष, दु:ख, दुष्टों के दमन के लिए उपासना की जाती है। उनका कहना है कि बटुक भैरव की यह मूर्ति करीब 1000-1100 वर्ष पुरानी है।
रमेश कपूर बाबा भी इस मंदिर की महिमा का गुणगान करते नहीं थकते। वो बताते हैं कि इस मंदिर में सभी तरह की मन्नत पूरी होती है। गोमती नदी और इस मंदिर के संबंध में उन्होंने बताया कि उस दौर में गोमती नदी बटुक भैरव के पांव पखारती थी यानि गोमती नदी मंदिर के बेहद करीब से गुजरती थी।
इमेज एंड क्रिएशन के चेयरमैन दुर्गेश पाठक ने बताया कि इलाहाबाद की हण्डिया तहसील से एक मिश्रा परिवार लखनऊ आया था और यहां उसने कथक की बेल रोपी। उन्होंने बताया कि यह मंदिर कथक घराने में कालका-बिंदादीन की ड्योढ़ी के बस ठीक पीछे है। यहां भैरव प्रसाद, कालका बिंदादीन परिवार के लोगों के घुंघरू बांधे गए। राममोहन और कृष्णमोहन के भी घुंघरू बांधे गए। गौरतलब है कि कालका-बिंदादीन की ड्योढ़ी आज भी कथक सीखने वालों का तीर्थ है। लोग आज भी यहां की चौखट चूमते हैं, तो यहां इस भैरवजी के मंदिर में लखनऊ घराने के सभी दिग्गज नर्तकों के घुंघरू बंधे हैं।
भैरवजी मंदिर की व्यवस्था सम्भाल रहे दसनामी परम्परा के गृहस्थ साधु श्याम किशोर के मिताबिक बटुक भैरव सुरों के राजा हैं। वे स्वर लहरी हैं, उनमें लहर आती है। श्याम किशोर जी बटुक भैरव को स्वयं सोमरस अर्थात मदिरा का पान बड़े प्रेम से कराते हैं और कहते हैं कि बटुक भैरव को प्रसन्न करने के लिए किशन महाराज, बिस्मिल्ला खां, हरिप्रसाद चौरसिया, बफाती महाराज आदि लंबी लिस्ट है, जिन्होंने यहां दरबार में आकर मत्था टेका और अपनी कला का उनके सामने प्रदर्शन किया।