जहां केवल आनन्द है वही योग है- सुधीर मिश्र

लखनउ। भारतीय विधाओं में योग दर्शन ही ऐसा विषय है जो केवल जीवन के सैद्धान्तिक पक्ष को ही नहीं अपितु व्यावहारिक रूप में अपना कर जहाँ माध्यम रूपी शरीर के स्वास्थ्य की बात करता वहीं जीवन के हर क्षेत्र में सामंजस्यतापूर्ण जीवन जीने की कला भी बताता है। प्राचीन काल से ही भारत में प्रचलित योग पद्धतियाँ जिनकी दार्शनिक एवं धार्मिक परम्परायें भले ही भिन्न-भिन्न रहीं हों परन्तु वर्तमान समय में इसकी व्यवहारिक उपयोगिता निर्विवाद रूप से उभरकर सामने आयी है। इसकी बढ़ती उपयोगिता के कारण वैज्ञानिक व जन सामान्य दोनों की ही इस विषय में रूचि बढ़ी है। आज जहाँ व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व विकास की अपेक्षा की जाती उस संदर्भ में आमतौर पर यह कहा जा सकता है कि ‘‘इस महान विज्ञान में ऐसे महामंत्र हैं जिनके समग्र अभ्यास से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक भावनात्मक विकास में अत्यधिक सहायता मिल रही है।

योग क्या है?

योग शब्द का अर्थ है जोड़ना या युक्त करना। हर व्यक्ति के जीवन जीनें की दो धारायें हैं। पहला भौतिक दूसरी आध्यात्मिक। जीवन की यात्रा कोरे आध्यात्मवाद से भी संभव नहीं है। साथ ही जीवन  में सुख शान्ति, प्रसन्नता, आनन्द कोरे भौतिकवाद से भी संभव नहीं। निष्कर्षतः जीवन जीने के लिए भौतिक पदार्थों की जहाँ आवश्यकता है वहीं जीवन में शान्ति, आनन्द एवं ओजस्वितापूर्ण सन्तुलित जीवन जीने के लिए आध्यात्म की आवश्यकता है। क्योंकि एकान्तिक दृष्टि से जीवन नहीं जिया जा सकता है। इसलिए व्यक्तित्व को बनाना है तो अस्तित्व से जुड़ना ही पड़ेगा। मनुष्य का मन हर समय चंचल है। भारतीय आध्यात्म में इस चंचल मन को ईश्वर या ब्रम्ह में स्थिर या युक्त करने के विधि को ब्रम्ह विद्या या आत्म विद्या कहते हैं। भारतीय आध्यात्म के सभी शास्त्र, वेद, उपनिषद, गीता, हठप्रदीपिका, शिव संहिता, ज्ञान संकलिनी, योगवशिष्ठ, योगपातंजलि आदि इस आत्म विद्या या योग विद्या के प्रतीकात्मक तथा सांकेतिक भाषा से भरे हैं।  गीता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में लिखी यह पंक्ति ‘‘ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता सूपनिषस्तु ब्रम्हविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्ण अर्जुन संवादे अध्यायः’’ इस तथ्य को प्रमाणित करती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि –

इदं तु ते गुह्यततम प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। 

ज्ञानं विज्ञान सहितं यज्ज्ञात्व मोक्ष्यसे शुभात।। गीता 9/1।।

          अर्थात श्री कृष्ण कहते हैं कि शुद्ध हृदय से जानने की इच्छा करने वाले अर्जुन, इस परम गोपनीय ज्ञान को जो विज्ञान सहित है मैं तुमसे कहूँगा जिसे जानकर इस दुखमय संसार से मोक्ष प्राप्त करोगे।

 

विज्ञान सम्मत होने से तात्पर्य है कि धरती पर जन्मे समस्त मानव के द्वारा ब्रम्ह विद्या या योग विद्या का समान ढंग से अभ्यास करने पर परिणाम भी समान ही होता है। मनुष्य का मन हर समय चंचल है और यह उस तत्व में स्थिर करने के विधि जिसे हम योग विद्या कहते हैं और इस चंचल मन को स्थिर करने में जो बाधायें हैं वे सभी के लिए समान हैं। योग साधना करने में जो अनुभव होते हैं (दृष्य या आवाज सुनाई पड़ती है) वे सभी समान हैं तथा ब्रम्ह में स्थिर हो जाने पर जो परिणाम है वह भी समान होता है। यही कारण है कि सभी शास्त्रों में एकरूपता दिखाई देती है। यह पूरी विद्या निश्चित नियम से आबद्ध है अर्थात यह विज्ञान सम्मत है जो धरती पर प्रत्येक मानव चाहे किसी भी देश या जाति का हो प्राप्त कर सकता है। योग विद्या की साधना करने के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता होती है मनुष्य का अपने शरीर से स्वस्थ होना और अस्वस्थ व्यक्ति द्वारा योग साधना संभव नहीं है। अतः भारतीय ऋषियों ने मनुष्य शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ ऐसे वैज्ञानिक व्यायाम की खोज की जे मनुष्य शरीर को निरोग रखने के साथ-साथ अच्छा स्वास्थ्य बनाये रखने में पूर्ण सक्षम है। इन वैज्ञानिक व्यायामों को हठ योग कहा जाता है। इस प्रकार योग मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त है।

हठ योग

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जिन वैज्ञानिक व्यायामों को मनुष्य के अभ्यास के लिए उपयुक्त माना वे न केवल शरीर को ही स्वस्थ रखते हैं बल्कि  चित्तवृत्तियों को भी प्रभावित करते हैं जिसके चलते इन व्यायामों को करने के बाद मन में पर्याप्त शान्ति का अनुभव होता है। स्वस्थ शरीर तथा शान्त मन योग विद्या या ब्रम्ह विद्या की पहली आवश्यकता है। योग की उच्चतम अवस्था प्राप्त योगियों की ही यह देन है।  अतः इन व्यायामों के अभ्यास को भी योगाभ्यास कहा जाता है। ये व्यायाम भिन्न -भिन्न प्रकार के आसन, प्राणायाम, बन्ध तथा मुद्रा की क्रियायें होती हैं। हठ योग विज्ञान सम्मत योगाभ्यास मानव स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक लाभकारी होने के कारण विश्व भर में लोकप्रिय हो चुका है।

राजयोग-क्रिया योग

इससे ब्रम्ह विद्या या योग विद्या या आत्म विद्या अथवा क्रिया योग भी कहते हैं यही भारत का मूल योग है।  महर्षि पतंजलि द्वारा योग की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है-

योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।।2।।(पातंजलि योगदर्शन)

 

चित्तवृत्ति को रोक देना या स्थिर कर देना  योग है यानि चंचल मन को स्थिर कर देना ही योग है।

प्रकृति की यह देन है कि मनुष्य का चंचल मन ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य बिन्दु पर स्थिर नहीं हो  सकता। यही कारण है कि मन स्थिरता का वर्णन जब भी और जहाँ भी किया गया है उसमें ईश्वर को केन्द्र बिन्दु मानकर हुआ है। इसलिए महर्षि पतंजलि ने किन-किन उपायों से समाधि लाभ अर्थात मन स्थिर होता है बताते हुए कहा है –

ईश्वरप्रणिधानां द्वा ।।23।। (पातंजलि योगदर्शन)

यानि ईश्वर प्रणिधानय से मन स्थिर होता है अर्थात ईश्वर के प्रति पूरे मन से समर्पित होने पर ही मन स्थिर होता है जो मूल योग है। इसमें दो भाग हैं- चंल मन जिसे सभी अनुभव करते हैं परन्तु ईश्वर का अस्तित्व प्रत्यक्ष प्रमाण, अनुमान प्रमाण दोनों से भी सिद्ध होता है।

योग विद्या सम्पूर्ण जीवन दर्शन है। वह एक ओर जीवन के आदि, मध्य और अन्त को प्रकाशित करता है वहीं दूसरी ओर इसका मार्ग भी प्रस्तुत करता है अतः यह जीवन विज्ञान भी है। तथाकथित केवल आसना अभ्यास वाला योग समग्रता का प्रस्तुती नहीं दे पा रहा है। योग विषय के नवनिर्माण के लिए यह एक विचारणीय बिन्दु है इसका उद्देष्य शारीरिक स्वास्थ्य मात्र न होकर परम तत्व की अनुभूति सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास, संयमित शान्त व संतुलित जीवन तथा स्वस्थ समाज का निर्माण है। इस परिप्रेक्ष्य में इसके भविष्य पर विचार अपेक्षित है।

योग से सम्बन्धित भ्रान्तियाँ

  • योग सन्यासी वेश नहीं, समता का अभ्यास है।
  • योग जीवन से पलायन नहीं जीवन जीने की कला है।
  • योग अकर्मण्यता नहीं परम पुरूषार्थ है।
  • योग तामसिक तप नहीं सात्विक साधना है।
  • योग हाथ की सफाई नहीं, शक्तिपात नहीं बल्कि योग मंजिल न मिले तब तक निरन्तर धैयपूर्वक चलने वाला अभ्यास है।
  • योग प्रदर्शन नहीं, योग का मापदण्ड कोई बाहर की वस्तु न होकर अन्दर की पवित्रता और निर्मलता है।
  • योग केवल आसन नहीं, कठिन आसन करने वाला ही बड़ा योगी होगा ऐसी धारणा ठीक नहीं। योग केवल शारीरिक प्रशिक्षण ही नहीं है, इसके साथ मूलतः मानसिक भावनात्मक, व आध्यात्मिक प्रशिक्षण है।
  • योग कोरा दर्शन नहीं व बौद्धिक व्यायाम नहीं बल्कि परम तत्व के बोध हेतु विचार और अभ्यास का सम्यक समन्वय है।
  • योग कोई साम्प्रदायिक वस्तु नहीं जो किसी व्यक्ति, वर्ग, वंश या जाति से सम्बन्धित हो बल्कि यह मानव मात्र के उत्थान का आत्मिक प्रयास है जो हजारों वर्षों के अभ्यास व अनुभव से अनुप्रमाणित है। योग कोई जटिल रहस्य, अकल्पनीय या रहस्यपूर्ण प्रक्रिया नहीं सरल, स्पष्ट व परिक्षित पद्धति है जो सोई शक्तियों को जगाने का विज्ञान है।

वर्तमान में इसके प्रति अधिकाधिक उपयोगितावादी दृष्टिकोण इसलिए अपनाया जा रहा है। क्योंकि स्वास्थ्य उन्नयन तथा परिरक्षण के साथ-साथ रूग्णों में रोग निवारण हेतु योगाभ्यास का प्रयोग बहुत बढ़ा है।  साथ ही अनुसंधानोंपरान्त प्राप्त सार्थक परिणामों के परिणाम स्वरूप जहाँ इसका स्वरूप भारतीय से अन्तर्राष्ट्रीयता की ओर व्यक्तिगत साधना से समाजपरक उपयोगिता की ओर तथा आध्यात्मिक अभ्यास से वैज्ञानिक परीक्षण की ओर अग्रसर हुआ वहीं इस लाभकारी परिवर्तनों के साथ-साथ अनेक चुनौतियाँ भी उभरी हैं।

  • वर्तमान का बहुचर्चित योग अपने मूल स्वरूप आध्यात्मिकता से लगभग पूरी तरह  हट चुका है।
  • समग्रता की अवधारण को पीछे छोड़ केवल आसनाभ्यास तक सीमित होता चला जा रहा है और आसनों का अभ्यास योग का पर्यायवाची बन गया है।
  • पूरे विश्व में अपना परचम लहराया तो अवश्य परन्तु अपनी मूल प्रवृत्ति तथा प्राथमिक कड़ी यम-नियम जो इस महाविज्ञान की नीव है जो सदाचार एवं सामाजिक अनुशासन से सम्बन्धित हैं सदैव उपेक्षित रहे।
  • यह साधना सम्बन्धी अपने मूल लक्ष्य से भटकर जीविकोपार्जन का साधन बनता चला जा रहा है।
  • आज के परिप्रेक्ष्य में सबसे ज्वलन्त प्रश्न इस विषय के प्रति यह है कि योग साधना प्रदर्शन का विषय नहीं बल्कि आत्मसाधना का विज्ञान है। शरीर के सभी तंत्रों की महत्ता विशिष्ट है परन्तूु जीवन जीने के लिए साँस लेना, भोजन ग्रहण करना तथा इसको मलमूत्र के रूप में उत्सर्जित करना महत्वपूर्ण कार्यों में है। शरीर को आधार प्रदान करता है अस्थि तंत्र एवं इसमें गति प्रदान करता है पेशी तंत्र।  सूचनाओं के संप्रेषण का कार्य तंत्रिकातंत्र करता एवं जहाँ जीवन तरल रूप में बहता है वह है रक्त संचरण तंत्र। इन महत्वपूर्ण तंत्रों का स्वस्थ होना आवश्यक है।
  • स्वास्थ्य प्राप्त करने की दृष्टि से शरीर के विभिन्न संस्थानों जैसे पेट की रामबाण क्रिया नवली चालन जिसे व्यक्ति टी0वी0 पर देखकर करने लगा। अगर पेट में पेप्टिक अल्सर हो तो आप खुद समझ सकते हैं कि इसका प्रभाव क्या पडे़गा क्योकि पाचनतंत्र से सम्बन्धित और भी समस्यायें हो सकती हैं जिसका निदान योग की अन्य क्रियाओं से हो सकता है इसलिए पूरे तंत्र को सम्पूर्णता प्रदर्शित करना ठीक नहीं है।
  • प्राण ही जीवन है न कि केवल साँस इन क्रियाओं के साथ जितना व्यायामिक रूप दिखाया जा रहा है यह जनमानस के व्यायामिक विचारों को ही प्रश्रय दे रहा है न कि योग की मूलभूत अवधारणा को।
  • आजकल तो योग शिविरों में लाभ ही पूछे जाते हैं। यह कभी नहीं प्रश्न किया जाता कि इससे किसी को कोई समस्या तो नहीं उत्पन्न हुई जो कि क्रियाओं की वैज्ञानिकता पर संदेह उत्पन्न करा देती है।

 इसको मूल से जो़डे़ रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि इस महाविज्ञान में शरीर और मन को प्रशिक्षित करने की अद्भुत क्षमता है जिसके चलते योग के समग्र रूप के विकास से व्यक्ति और समाज को लाभान्वित करना आवश्यक है।  योग विद्या सम्पूर्ण जीवन दर्शन है।  तथाकथित केवल आसनाभ्यास वाला योग समग्रता की प्रस्तुति नहीं दे पायेगा।

सुझावः

  • सबसे पहले अपनी इस मानसिकता में सुधार करना पड़ेगा (व्यायाम) कि यौगिक बाह्य क्रियाओं को करते समय शरीर के उस भाग विशेष में दबाव पड़ा, पसीना निकला है कि नहीं।  यह व्यायाम की क्रिया हो सकती है योग की क्रिया नहीं।
  • योग सदैव सहजता, सरलता एवं वैचारिक स्तर पर जीवन के हर क्षेत्र में सामंजस्यतापूर्ण उदात्त भावों के बीच जीवन जीने की कला है।
  • उत्तर इस बात में नहीं है कि व्यक्ति यौगिक क्रियाओं को कर रहा है बल्कि प्रश्न इस बात में है कि वह जिस क्रिया को कर रहा है उसकी प्रक्रिया में कितनी शुद्धता, विशुद्धता एवं परिशुद्धता है।
  • व्यक्ति यौगिक क्रियाओं को कितनी बार कर रहा है से अच्छा है कि वह जिस क्रिया को कर रहा है उसमें कितनी सहजता है। जितनी सहजता होगी स्वभाव में उतनी सरलता, वाणी में उतनी मधुरता एवं हृदय में शुचिता होगी।
  • योग-रोग और आरोग्य की अवधारणा को वास्तविक अर्थों में जानने के लिए शरीर संरचना, शरीर क्रिया विज्ञान एवं विकृति विज्ञान (पैथालाजी) का ज्ञान आवश्यक है क्योंकि शरीर के अस्वस्थ होने की दशा में मोटे तौर पर शरीर की संरचना में जैव रासायनिक परिवर्तन ;ठपव बीमउपबंस तमंबजपवदद्ध एवं पैथालाजी में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।  ऐसी स्थिति में पतंजलि योग दर्शन की विभिन्न आसन, प्राणायाम, ध्यान का प्रत्यक्ष रूप से शरीर पर प्रभाव पड़ता है और यह व्यवस्थायें शरीर की फिजियोलाजी को प्रभावित करती हैं इसलिए शरीर की संरचना के साथ-साथ चिकित्सकीय दृष्टिकोण रखते हुए उनके प्रभावों का अध्ययन भी आवश्यक होता है।
  • योग केवल योगासनों तक सीमित नहीं अपितु जीवन का वह दिव्य विज्ञान है जिसमें जीवनापयोगी महामंत्र छिपे हुए हैं जिसकी साधना स्व से प्रारम्भ होकर स्व में स्थित होते हुए समष्टि को प्रभावित करती है।
  • व्यक्ति के प्रकृति (वात, पित्त, कफ) एवं उसमें गुणों की प्रधानता ( सत, रज, तम) के आधार पर योग के आन्तरिक एवं बाह्य साधना का महत्व है। इन परिस्थितियों में उचित मार्ग दर्शक के नेतृत्व में आमने-सामने बैठकर, बातचीत कर, शरीर तथा उसकी समस्या को समझकर किस प्रकृति का व्यक्ति है तथा किस गुण की प्रधानता है उस आधार पर नियमानुसार आहर की प्रकृति का चुनाव तथा उचित स्थान एवं उचित समय पर यौगिक क्रियाओं का अभ्यास कराया जाना ही यौगिक प्रबन्धन है साथ ही योग महाविज्ञान में मानवीय कौसल एवं मानवीय रोजगार की अपार संभावनायें भी हैं। किसको क्या करना है साथ ही किसको किस रोग में क्या करना उचित है, क्या करना अनुचित है इसकी जानकारी के लिए एक कुशल चिकित्सक एवं उसके निदान हेतु योग चिकित्सक से परामर्श करना आवश्यक है।

          ‘‘इस प्रकार’’ योग महाविज्ञान केवल रोग तक सीमित नहीं बल्कि आन्तरिक प्राण कर्म द्वारा प्राणों का स्पन्दन जब भावों की सच्ची साधना में स्वतः होने लगे तो वहीं स्वास्थ्य से सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करने की प्रमाणिक वैज्ञानिक पद्धति है जहाँ केवल आनन्द है – वही योग है।

लेखक सुधीर मिश्र लखनऊ विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट ऑफिसर हैं।