बढ़ती आबादी के बोझ तले दब सकती है धरती?

लखनऊ/ बुशरा असलम। आज विश्व जनसंख्या दिवस है। और इस साल यानि साल 2018 में वर्ल्ड पॉप्युलेशन डे की थीम है- परिवार नियोजन हर मनुष्य का अधिकार है। दरअसल, तेजी से बढ़ती दुनिया की आबादी ने हमारे सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। दुनिया की आबादी 760 करोड़ पहुंच गई है जो हर दिन, हर घंटे, हर सेकंड बढ़ती जा रही है। बढ़ती आबादी से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान आकर्षित करने के मकसद से ही हर साल 11 जुलाई को वर्ल्ड पॉप्युलेशन डे मनाया जाता है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने 1989 में पहली बार 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के तौर पर मनाने की घोषणा की थी। इसी कड़ी में यूनिवर्सल कम्यूनिकेशन मीडिया सेन्टर द्वारा लखनऊ के गोमती नगर लखनऊ में जन जागरुकता को ध्यान में रखते हुए संगोष्ठी का आयोजन किया गया ।

इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि मौसम वैज्ञानिक शत्रुघन लाल ने कहा कि भारत जनसंख्या के मामले में विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है लेकिन वह दिन दूर नहीं जब हम चीन को भी पछाड़ देगें। विश्व में प्रति मिनट जहां कुल 150 शिशु जन्म लेतें हैं, वहीं भारत में अकेले 60 बच्चों का आंकडा है। भारत की आबादी 2001 की जन गणना में 1 अरब दो करोड़ सत्तासी लाख हो गई थी। जनजागरुता के बावजूद 1.95 प्रतिशत वृद्धि दर रह गई और भारत की जनसंख्या विश्व के अन्य देशों की तुलना में आज भी बहुत अधिक है। 21वीं सदी में भी भारतीय उपमहाद्वीप में जनसंख्या नियंत्रण एक अत्याधिक संवेदनशील सामाजिक विषय है। यहां तक पढ़े लिखे लोगों में भी बच्चों का जन्म ऊपर वाले की देन मानतें हैं, जबकि जनसंख्या वृद्धि में जन मानस स्वयं जिम्मदार हैं। जन मानस जनसंख्या वृद्धि पर स्वतः अंकुश लगा सकता है, इसके लिये सामाजिक जन जागरुकता एवं जिम्मेदारी की निर्वहन करने की भूमिका स्वयं समाज की है। सरकारें मात्र सुझाव एवं सुविधा ही मुहैया करा सकतीं हैं।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि उच्च न्यायालय के अधिवक्ता श्री रवीन्द्र प्रताप सिंह ने कहा आज के जनसंख्या वृद्धि की गति से मानव की आवश्यकताओं एवं संसाधनों की पूर्ति करना असम्भव होता जा रहा है इससे मानव जीवन मूल्यों में निरन्तर गिरावट आ रही है। अमीरी और गरीबी के बीच की खाई निरन्तर बढ़ती जा रही है इन सामाजिक विषमताओं के कारण अपराधों के विभिन्न स्वरुप नजर आ रहें है। इस अवसर पर उन्होने कहा जन जागरुकता के कार्यक्रम सिर्फ गोष्ठियों एवं बैनरों तक सीमित न रहें इसके लिये उद्देश्य के प्रति प्रतिवद्धता और जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए, नियमों का कड़़ाई से पालन हो तभी हम सामाजिक समस्याओं पर अंकुश लगा सकतें हैं ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे युनिवर्सल कम्यूनिकेशन मीडिया सेन्टर के अध्यक्ष डॉ0 सत्येन्द्र कुमार ने कहा कि जन संख्या किसी भी राष्ट्र के लिये अमूल्य पूंजी होती है, वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करती है व वितरण – उपभोग भी करती है, किसी भी देश के आर्थिक विकास में जनसंख्या का विशेष योगदान होता है इसीकारण जनसंख्या को किसी भी देश के साधन व साध्य का दर्जा दिया जाता है। 2030 तक भारत की जनसंख्या 1.53 अरब हो जायेगी। भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार का वर्णन है कि प्रत्येक नागरिक को मूलभूल संसाधन मुहैया होने चाहिए, जबकि भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण दो तिहाई शहरी आबादी को 2030 तक शुद्ध पेयजल भी नसीब नहीं होगा। आज के परिपेक्ष्य में स्वास्थ्य सेवा में प्रति 10 हजार व्यक्तिओं पर तीन डाक्टर एवं 10 बिस्तर है। विश्व के कृषि भू-भाग का मात्र 2.4 प्रतिशत भारत में है जबकि यहां की आबादी दुनिया की कुल आबादी की लगभग 17 प्रतिशत है। रासायनिक खादों के प्रयोग से ऊपजाऊ भूमि लगातार ऊसर होतीं जा रहीं हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण देश के कुल आबादी का 1/3 भाग झुग्गी झोपडियों स्लम एरिया में निवास करता है। विश्व में सबसे पहले 1952 में जनसंख्या नियंत्रण हेतु परिवार नियोजन कार्यक्रम को अपनाया गया इसके बावजूद हम जनसंख्या वृद्धि के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर है। डॉ0 कुमार ने कहा कि संस्था सामाजिक जन जागरुकता कार्यक्रमों के द्वारा देश में स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत और डिजिटल भारत की अवधारणा को लेकर कार्य कर रही है और भविष्य में इसी दिशा में निरन्तर प्रयासरत रहेगी ।

वरिष्ठ टीवी पत्रकार अनुभव खंडूरी ने इमरजेंसी की याद दिलाते हुए कहा कि यह हैरानी की बात है कि करीब चार दशक पहले बढ़ती जनसंख्या तो एक मुद्दा थी, लेकिन आपातकाल में जबरन नसबंदी अभियान के बाद राजनीतिक दलों एवं अन्य नीति-नियंताओं के एजेंडे से यह मसला ऐसे बाहर हुआ कि फिर किसी ने उसकी सुध नहीं ली। क्या यह अजीब नहीं कि 43 साल पहले 1975 में जब भारत की आबादी 55-56 करोड़ थी तब तो बढ़ती जनसंख्या एक गंभीर मसला थी, लेकिन आज जब वह बढ़कर 130 करोड़ से अधिक हो गई है तब कोई भी उसके बारे में न तो चर्चा करता है और न ही चिंता?

रिसर्च स्कॉलर उमाशंकर उपाध्याय ने बताया कि बढ़ती जनसंख्या का प्रमुख कारण अशिक्षा है। इसके अलावा अशिक्षा, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का अभाव और अंधविश्वास भी जनसंख्या बढ़ने के कारण हैं। इस‍की वजह से भारत में संसाधनों का अभाव हो रहा है, भूख और कुपोषण बढ़ रहा है। आपको जानकर हैरत होगी कि विश्व में बीमारियों का जो बोझ है, उसमें से 20 प्रतिशत केवल भारत का है। बढ़ती आबादी के कारण प्राकृतिक चीजें घट रही हैं, सुविधाओं का अभाव हो रहा है। बेरोजगारी में इजाफा हो रहा है।

विश्व जनसंख्या दिवस कार्यक्रम के समापन के अवसर पर कार्यक्रम संयोजक विकास शुक्ला ने कहा कि विचारणीय प्रश्नचिन्ह खड़ा किया कि दक्षिण राज्यों में जहाॅ जन जागरुकता के कारण कम हो रही है वहीं उत्तर भारत में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक है, इसका कारण दक्षिणी राज्यों में शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाता है और प्रत्येक व्यक्ति जनजागरुकता के कारण सीमित परिवार एवं स्वस्थ्य परिवार के कॉन्सेप्ट के लेकर चलता है जबकि उत्तर भारत के गांव में जितने परिवार होंगे उतने हाथों को काम मिलेगा की अवधारणा है। इस अवसर पर विकास यादव, रवि पाण्डेय, इं0 देवेन्दु शुक्ला, विकास कुमार समेत कई गणमान्य मौजूद रहे।