आसक्ति से जीव अपनी स्वतन्त्रता खोकर दीन-हीन हो जाता है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। परमात्मा की दिशा में जाने वाले सभी मत, पंथ-संप्रदायों द्वारा रचित मार्ग आदरणीय एवं कल्याणकारी है…! संत-सत्पुरुष मानव-मानव में किसी प्रकार का अंतर नहीं मानते। कोई भी व्यक्ति अपने कुलविशेष के कारण किसी प्रकार वैशिष्ट्य लिए हुए उत्पन्न नहीं होता। इनकी दृष्टि में वैशिष्ट्य दो बातों को लेकर मानना चाहिए – अभिमान-त्यागपूर्वक, परोपकार या लोकसेवा तथा ईश्वरभक्ति। इस प्रकार स्वतंत्र चिंतन के क्षेत्र में इन संतों ने एक प्रकार की वैचारिक क्रांति को जन्म दिया। “संत” शब्द संस्कृत “सत्” के प्रथमा का बहुवचनान्त रूप है, जिसका अर्थ होता है – सज्जन और धार्मिक व्यक्ति। हिन्दी में साधु पुरुषों के लिए यह शब्द व्यवहार में आया। कबीर, सूरदास, गोस्वामी तुलसीदास आदि पुराने कवियों ने इस शब्द का व्यवहार साधु और परोपकारी, पुरुष के अर्थ में बहुलांश: किया है और उसके लक्षण भी दिए हैं। लोकोपकारी संत के लिए यह आवश्यक नहीं कि यह शास्त्रज्ञ तथा भाषाविद् हो। उसका लोकहितकर कार्य ही उसके संतत्व का मानदंड होता है। संत सदा मानव को जोड़ने का कार्य करते हैं और उनका आशीर्वाद सब पर बराबर का रहता है। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने श्रद्धालुओं को आह्वान किया कि जिस प्रकार विभिन्न नदियों का जल समुद्र में मिलने के बाद एक जैसा हो जाता है, ठीक उसी प्रकार संसार में धर्म अलग-अलग हैं, परन्तु भगवान एक ही है। मनुष्यों को जातपात का भेदभाव भुलाकर रहना चाहिए। अतः सभी धर्मो का आदर व सम्मान करना चाहिए, तभी मनुष्य का जीवन सफल होता है…।

आचार्यश्री” ने कहा – जो सत्संग और सत्कर्म के लिए समय निकालते हैं उनके हर कार्य का ध्यान प्रभु स्वयं ही रखते हैं। प्रभु की कृपा जब होती है, तब मनुष्य आनंद की अवस्था को प्राप्त करता है। जैसे अच्छा खेलने वाले खिलाड़ी को टीम में लिया जाता है, लेकिन अगर वही खिलाड़ी दो-तीन बार अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता तो उसे टीम से बाहर निकाल दिया जाता है। इसके विपरीत जिस इन्सान पर प्रभु की कृपा हो जाती है अथवा जिसे प्रभु का ज्ञान हो जाता है या जिसे प्रभु अपनी टीम में ले लेते हैं उसे कोई भी प्रभु की टीम से बाहर नहीं निकाल सकता। यह इंसान की मर्जी है कि वो दुनिया की टीम का खिलाड़ी बनना चाहता है अथवा प्रभु की टीम में शामिल होना चाहता है। अज्ञान का पर्दा ही है जो इंसान को भगवान की टीम से दूर रखता है। पूज्य आचार्यश्री जी ने आह्वान किया कि उसी अज्ञान के पर्दे को दूर करके अपना जीवन सफल करें। संत-सत्पुरुषों जा जीवन सुई की तरह होता है जो हमेशा समाज को जोड़ने का ही कार्य करते है, दूसरों को खुशी देते हैं एवं गिरते को संभालते हैं। हम हमेशा चाहते हैं कि हमारे बच्चे सही दिशा में चले और जीवन में सुख और शांति प्राप्त करें। इसके लिए हमें सही दिशा में जाना होगा। इसलिये ईश्वर और सद्गुरु के चरणों में जो अपने मन को लगता है, उसके मन की मैल हमेशा-हमेशा के लिए धुल जाती है एवं सदगुरु सभी विकारों से उसकी रक्षा करते हैं …।

आचार्यश्री ने जीवन में संतों की संगती का महत्व बताते हुए कहा – जब तत्वदर्शी महान पुरुषों की संगति मिलती है तो परमपिता परमात्मा की याद आती है। उनकी सत्संगति से मानव जीवन, सत्संग तथा परमात्मा के नाम के महत्त्व का पता चलता है तथा उसे ह्रदय में जानने की जिज्ञासा होती है। तब वे महान पुरुष परमात्मा के नाम व स्वरूप का बोध हृदय में करा देते हैं। नाम सुमिरन करने से मन के ऊपर जो माया का प्रभाव होता है, वह ऐसे दूर होता है जैसे सूर्य के उदय होने पर अंधकार समाप्त हो जाता है और आत्मा प्रफुल्लित हो जाती है। यदि सन्तों की संगति नहीं की तो परमात्मा की याद नहीं आती और जीवन का अमूल्य समय बरबाद हो जाता है। इसीलिए श्री कबीरदास जी कहते हैं – “कबीरा संगत साधु की , साहिब आवे याद। लेखे में सोई घड़ी, बाकी दिन बरबाद। ”

आचार्यश्री ने संतों की महिमा बताते हुए कहा कि संत वचन ज्ञान रूपी कुल्हाड़ी है, जो धैर्य एवं सावधानी से जीव के अज्ञान को काटती है। सत्संग की महिमा का व्याख्यान करते हुए पूज्य आचार्यश्री ने कहा कि भागवत में भगवान ने उद्धव जी को समझाते हुए कहा कि उद्धव जगत में जितनी आसक्तियां हैं उन्हें सत्संग नष्ट कर देता है। यही कारण है कि सत्संग जिस प्रकार मुझे वश में करता है वैसा साधन न योग है, न साख्य और न ही स्वाध्याय है। आसक्ति से जीव अपनी स्वतन्त्रता खोकर दीन-हीन हो जाता है। संसार वृक्ष के दो बीज हैं – पाप और पुण्य। असंख्य वासनाएं जड़ें हैं और तीन गुण तने हैं – सत, रज और तम। पांच भूत प्रधान शाखाएं, ग्यारह इंद्रियां शाखा, शब्दा आदि पाँच विषय रस हैं। जीव और ईश्वर दो पक्षी हैं। ये दोनों संसार वृक्ष पर घौंसला बनाकर रहते हैं। इस वृक्ष में वात, पित्त, कफ रूपी तीन प्रकार की छाल हैं। दो प्रकार के फल लगते हैं सुख और दु:ख। यह वृक्ष सूर्यमंडल तक फैला है। इस मण्डल का भेदन करने वाले मुक्त पुरुष पुन: संसार चक्र में नहीं पड़ते। जो मनुष्य शब्द, रूप, रस आदि विषयों में फंसे हैं। कामनाओं से भरे हुए होने के कारण गीद के समान हैं और दु:ख रूपी फल को भोगते हैं। अतः जो जीव विषयों से विरक्त रहते हैं एवं भगवद आनन्द में रहते हैं, वे संसार चक्र से छूटकर प्रभु के श्रीधाम को प्राप्त होते हैं …।