जहाँ शरीर का सुख अर्थ है वहाँ आत्मा का सुख परमार्थ है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। परमार्थ जीवन सिद्धि और ईश-अनुग्रह प्रदाता है। अतः निष्कामता, उदारता और परोपकार जैसे दिव्य भाव सर्वथा सहेज कर रखें…! उदारता के वृक्ष में ही कृतज्ञता के फूल पुष्पित-पल्वित होकर अपनी सुगंध बिखेरते हैं। यह फूल की उदारता ही है कि कोई भी भंवरा उसका पराग ले सकता है। कोई भी राहगीर उसकी सुगंध भीतर उतार सकता है। उदारवादी बनने पर व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुरूप सहजता से जीने लग जाता है। बीज बनकर पेड़ अपने जीवन का मोह भूल जाता है। फिर पेड़ बनकर फल और फूल देता है। अतः लोगों के साथ और लोगों के लिए जीने का मार्ग है – उदारता। समय के साथ बदलते रहने को उदारता कहते हैं। उदारता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है। उदारता का मूल है – देना। चाहे सामने वाले को अपनी बात कहने का अवसर ही हो। उदारवाद का अर्थ है – सामने वाले को अघिक महत्व देना। अहंकार मुक्त होकर देना। कर्तापन का भाव छोड़कर देना। सामने वाले के शरीर को नहीं, उसके आत्मा को देना। ताकि आपके अतिरिक्त किसी को पता भी न चल सके। वापस नहीं मांगने के भाव से, सामने वाले का शुभचिन्तक बनकर देना। उदारता आदत नहीं संस्कार है जिसका संबंध आत्मा के साथ जुड़ा है। इसमें नकारात्मकता नहीं होती, संस्कारवान लोग अपने ‘सर्व मंगल’ भाव से विशेष उदारता प्रकट करके उम्रभर के लिए अमिट छाप छोड़ देते हैं। गाय को चारा, पक्षियों को दाना एवं चींटियों को ‘कीड़ी नगरा’ जैसी परम्पराएं भले ही धर्म के नाम पर चलती हों, किन्तु व्यक्ति के मन में प्राणी मात्र के लिए सम्मान पैदा करने जैसा दुर्गम कार्य आसानी से हो जाता है। इन भावनाओं के स्पन्दन शरीर की ऊर्जा को संतुलित रखते हैं। शरीर प्रसन्न एवं निरोग रहता है। व्यक्ति व्यष्टि से समष्टि भाव की ओर निरंतर बढ़ता रहता है…।

आचार्यश्री ने कहा करते हैं कि परोपकार अथवा पर-सेवा ही परमार्थ का सच्चा एवं सक्रिय स्वरूप है। योग, ध्यान, साधना अथवा आराधना की अपेक्षा आत्मिक सुख के मार्ग परमार्थ की ओर बढ़ने के लिये “निस्वार्थ-सेवा” सबसे सरल साधन एवं उपाय है। सेवा संसार में सबसे बड़ा परमार्थ है। इसमें मानव जीवन की महती मान्यताओं का मूल्याँकन रहता है। सेवा द्वारा किसी दूसरे को सुखी बनाने में जो आत्मसंतोष प्राप्त होता है, उसकी तुलना में शारीरिक सुख तुच्छ व क्षणभंगुर है। दूरदर्शी व्यक्ति जानते हैं कि परोपकार से मनुष्य का न केवल लोक ही सुधरता है अपितु परलोक भी सँवरता है। संसार यात्रा के समय जो जिस मात्रा में अपनी आत्मा को प्रसन्न एवं उन्नत बना लेगा, महाभियान के समय वह उतने ही उच्च लोकों का अधिकारी बनेगा। इस प्रकार की अहैतुक प्रसन्नता आत्मा को यदि मिल सकती है तो केवल परोपकार और पर-सेवा रूपी परमार्थ से। जो परोपकार अथवा पर-सेवा का कोई व्यवहारिक सत्कर्म न करके तप अथवा योग साधन मात्र करते रहते हैं, वे भी एक प्रकार के स्वार्थी ही होते हैं। भले ही उनका वह स्वार्थ तुच्छ, हेय अथवा निकृष्ट न कहा जाये। हाँ, यह आध्यात्मिक स्वार्थ तब अवश्य ही परमार्थ बन सकता है जब यह पर-सेवा अथवा परोपकार के लिये ही किया जाये। यदि तप द्वारा प्राप्त होने वाले आत्म संयम, आत्मशक्ति अथवा आत्मरोध का उद्देश्य यह हो कि हम इस प्रकार एक सच्चे सेवक की पवित्रता प्राप्त करके जन-सेवा, लोक-सेवा अथवा परोपकार कार्य में ही संलग्न होंगे तभी श्रेष्ठ तप हो पाएगा… अन्यथा वह भी जायेगा स्वार्थ की परिधि में ही…।

आचार्यश्री ने कहा जहाँ शरीर का सुख अर्थ है वहाँ आत्मा का सुख परमार्थ है। जब तक परमार्थ द्वारा आत्मा को संतुष्ट न किया जायेगा, उसकी माँग पूरी न की जायेगी तब तक सर्व सुखों के बीच भी मनुष्य को एक अभाव एक अतृप्ति व्यग्र करती ही रहेगी। शरीर अथवा मन को संतुष्ट कर लेना भर ही वास्तव में सुख नहीं है। वास्तविक सुख है – आत्मा को संतुष्ट करना, उसे प्रसन्न करना। साँसारिक भोग भोगने और मनभाई परिस्थितियाँ पा लेने से शारीरिक सुख मिलता है, किन्तु आत्मा सुखी होती है – परोपकार एवं पर-सेवा रूपी परमार्थ कार्यों से। अतएव, विवेकशील व्यक्ति सच्चा सुख पाने के लिये स्वार्थ सुख की अपेक्षा परमार्थ सुख को अधिक महत्व देते हैं। वे परमार्थ सुख के लिये स्वार्थ सुख का भी त्याग कर देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि शारीरिक सुख छाया है और आत्मिक सुख सत्य है, यथार्थ है। अतः जिसके प्रति हमारी इतनी जिज्ञासा है, इतना आकर्षण है उसके बिम्ब को क्यों प्राप्त किया जाये, क्यों न चन्द्रमा की ही उपलब्धि की जाये…।