गुरु के बताए मार्ग पर चलकर प्रभु का भजन करे, यही मानव धर्म है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

टीकमगढ़। मानवीय अस्तित्व में नित्य-निरंतर स्थिर है – भगवदीय सत्ता। हम भगवदीय अंश हैं और भगवान अंशी; अतः जैसे ही चेतना अंतर्मुखी होगी आनंदानुभव प्रखर-मुखर होगा..! ईश्वर का अस्तित्व हममें अभिव्यक्त है। वह हममें है और हम उनमें हैं। सच तो यही है कि हम भगवान के अंश हैं, हममें उनकी अनंतता, दिव्यता, पवित्रता, सुचिता विद्यमान है। वे सनातन हैं तो वैसी सनातनता, वे शुभ हैं तो वैसी शुभता, वे मंगलमूर्ति हैं तो वैसा मांगल्य, वे निरंतर मधुर हैं तो वैसा माधुर्य हमारे पास है… “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति …॥ गीता में भगवान कहते हैं – इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। अर्थात्, जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटों में पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतों में एकीरूप से स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है; और, इसी से देह में स्थित जीवात्मा को भगवान ने अपना ‘सनातन अंश’ कहा है। वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है, लेकिन वह कब प्रकट होता है? शास्त्र कहते हैं – श्रवण करने से, सुनने से वह प्रकट होता है। अतः भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण ही धर्म का मूल है। इस प्रकार उस प्रभु को पाने की परम चाहत विधि का आचरण ही धर्माचरण है..।

“आचार्यश्री” जी ने कहा निर्मलता के अभाव के कारण ही मनुष्य स्वयं को जान नही पा रहा है। जन्म से बालक में जो गुण और संस्कार पाये जाते हैं वे अधिकाँश उसके पिता के गुणों और संस्कारों की प्रतिच्छाया ही होते हैं। बीज और फल में शक्ति, गुण और स्वाद की विशेषतायें प्रायः एक जैसी ही होती हैं। मीठे फल के बीज से उत्पन्न वृक्ष भी मीठे फल ही प्रदान करने वाले होते हैं। वातावरण, जलवायु तथा वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का मत है कि सन्तान के शरीर के न केवल सूक्ष्म गुणों में ही समानता पाई जाती है वरन् स्थूल द्रव्य में भी एकता के सभी लक्षण दिखाई दे जाते हैं। रामायण कहती है – ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि।। यानि, ईश्वर के अंश होने के कारण हम परम आनंद को पाने के अधिकारी हैं, चेतना के उस दिव्य स्तर तक पहुंचने के अधिकारी हैं जहाँ विशुद्ध प्रेम, सुख, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और शांति है। सम्पूर्ण प्रकृति भी तब हमारे लिये सुखदायी हो जाती है। इस स्थिति को केवल अनुभव किया जा सकता है, क्योंकि यह स्थूल नहीं है, अति सूक्ष्म है। परम की अनुभूति अंतर को अनंत सुख से ओतप्रोत कर देती है। और, परम तक ले जाने वाला कोई सदगुरु ही हो सकता है। सर्व भाव से उस सच्चिदानंद की शरण में जाने की विधि वही सिखाते हैं। हम देह नहीं हैं, देही हैं, जिसे शास्त्रों में जीव कहते हैं। जीव परमात्मा का अंश है, उसके लक्षण भी वही हैं जो परमात्मा के हैं। वह भी शाश्वत, चेतन तथा आनन्दस्वरूप है…।

“आचार्यश्री” ने कहा जीवात्मा के सम्बन्ध में आत्म-विद्या-विशारद आचार्यों का भी यही मत है। वेद, शास्त्र, उपनिषद्, गीता, पुराण, रामायण आदि- इन सभी धर्मग्रन्थों में आत्मा के सम्बन्ध में जो विवेचन हुआ है वह एक जैसा ही है। सबने स्वीकार किया है कि जीव अविनाशी तत्व है, वह ईश्वर का अंश है। उसमें परमात्मा के सब गुण बीज रूप से विद्यमान है। जीव को अनन्त सुखी, चेतन तथा निर्मल बताया गया है। यह गुण उसके अपने पिता परमात्मा के ही गुण हैं। सद्गुरु के प्रति, इष्ट के प्रति, पूर्ण समर्पण से ही श्रद्धा और भक्ति का जन्म होता है। जब मानव के मन में परमात्मा के प्रति श्रद्धा और भक्ति पूर्ण रूप से चैतन्य हो जाती है तब विश्वास रूपी शिव का प्रकाट्य होता है। श्रद्धा और विश्वास एक-दूसरे के पूरक हैं। किसी एक के अभाव में प्रभु की प्राप्ति नहीं होती है। आत्मशक्ति की अनुभूति के लिए ये दो ही सम्बल प्रख्यात हैं – श्रद्धा और विश्वास। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के प्रारम्भ में ही मंगलाचरण के द्वितीय श्लोक में इसकी स्पष्ट व्याख्या की है – “भवानीशंकरों वन्दे श्रद्धाविश्वासरुपिणौ। याभ्याँ बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् …”॥ अर्थात्, मैं उन श्रद्धा एवं विश्वास रूपी भवानी और शंकर की वन्दना करता हूँ, जिनके बिना अंतःकरण में अवस्थित परमात्म-सत्ता को सिद्धजन देख नहीं सकते। यह श्लोक संक्षेप में अध्यात्म के तत्वज्ञान के आधारों का निरूपण है। “आचार्यश्री” ने कहा कि किसी के प्रति श्रद्धा हो लेकिन विश्वास न हो तो काम नहीं बनता है। विश्वास हो और श्रद्धा का अभाव हो तब भी काम नहीं बन सकता है। जब ये दोनों मिल जाते हैं तो मन में प्रेम जागृत होता है। इसी प्रेम से प्रभु की प्राप्ति होती है। पार्वती श्रद्धा हैं और शिव विश्वास। जब तक श्रद्धा का विश्वास से मिलन न हो तब तक जीव आत्मा से और आत्मा परमात्मा से नहीं मिल सकती है। अतः मनुष्य को चाहिये कि अपने गुरु और प्रभु के प्रति श्रद्धा और विश्वास के साथ अपना सब कुछ सौंप कर गुरु के बताए मार्ग पर चलकर प्रभु का भजन करे, यही मानव धर्म है…।