युद्ध-रणनीति के प्रथम आविष्कारक हैं वाल्मीकि – डॉ० योगेन्द्र कुमार

वाराणसी/ सत्येंद्र। भारत अध्ययन केन्द्र में आयोजित कार्यशाला के नौवें दिन समकालीन परिस्थिति में शत्रुओं को चिन्हित करना और उनसे निजात पाने के शास्त्रीय सन्दर्भों पर बोलते हुए गोरखपुर के डॉ0 योगेन्द्र कुमार ने कहा कि मित्र भी यदि सिर्फ और सिर्फ आपकी कमियों को ही उजागर करे तो वह शत्रु की श्रेणी में आता है। वेद के सात सौ मन्त्रों में शत्रु की बात की गयी है। आज के समय में शत्रु-चिन्तन एक व्यावहारिक दर्शन है। शास्त्र हमें यह बताते हैं कि राजनीति में हम भाग्य के भरोसे नहीं बैठ सकते। महाभारत के शान्तिपर्व में शत्रुज्ञानमीमांशा अपने विकसित अवस्था में उपलब्ध होता है। वाल्मीकि शत्रुमर्दन के लिए सेना की रणनीति बताने वाले विश्व के पहले रणनीतिकार हैं। शुक्रनीतिसार में स्वाभाविक शत्रु की सूची दी गयी है। जिस राजा के बैठने पर राष्ट्र की सीमाएं संकुचित हो जाएं उस राजा को सत्ता से हटा देना चाहिए। समकालीन विश्व में युद्ध जीतने के जितनी भी विधियाँ प्रयोग की जाती हैं उन सभी का विधान वाल्मीकि रामायण, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कामन्दकनीतिसार, शुक्रनीतिसार और पंचतन्त्र में उपलब्ध हैं।
मित्रभेद तन्त्र की कथाओं पर बोलते हुए डॉ0 पल्लवी त्रिवेदी ने कहा कि पंचतन्त्र मित्र बनाने और सच्चे मित्र की परख करने का सिद्धान्त प्रदान करता है। इसमें मित्र-नीतिशिक्षा वर्णित है। यह तन्त्र मित्रता में किस प्रकार वैमनस्य स्थापित कर लाभ उठाया जाता है, इसके प्रति हमें सजग करता है।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से डॉ० मलय झा, श्री विरेन्द्र कुमार, गौरव पाण्डेय, ईशान त्रिपाठी, धीरज कुमार गुप्ता, अभिनन्दन, शशि कुमार, दिग्विजय त्रिपाठी, पंकज पाण्डेय, मिनाक्षी पाण्डेय, गोविन्द सहित बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन व धन्यवाद ज्ञापन डॉ० अनूप पति तिवारी ने किया।