राज्यपाल विष्णुकान्त शास्त्री ने कहा था कि अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए मरना सबसे बड़ा सौभाग्य होता है। -राम महेश मिश्र

नई दिल्ली। मंगलवार देर शाम जिन्हें हमने बड़े आदर के साथ याद किया। स्मृतिशेष आचार्य विष्णु कान्त शास्त्री जी राष्ट्र के गम्भीर चिन्तक, विद्वान, साहित्य आचार्य, कवि और सबसे अधिक एक सहज, सरल व सच्चे इन्सान थे। लखनऊ से पता चला कि कल उनकी पुण्य तिथि थी। आपको हम-सबकी भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

श्रद्धेय श्री विष्णु कान्त शास्त्री पाँच वर्षों तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे। लखनऊ राजभवन में आपके निवास की अवधि में उनके साथ कम से कम २४ सार्वजनिक मंचों पर हम साथ रहे थे। उनसे मिला स्नेह आज भी यदा-कदा भीतर तक भिगोता है। वह भाषाओं की शुद्धता के पक्षधर थे और हिन्दी में अंग्रेज़ी व अंग्रेज़ी में हिन्दी को मिलाने के बहुत ख़िलाफ़ थे। वह कहते थे कि भाषाओं के विनाश में उसके अपने लोगों की ही सर्वाधिक भूमिका होती है। जून २००१ में इन्दिरानगर के गायत्री ज्ञान मन्दिर के उदघाटन अवसर पर उनने ‘यहाँ साहित्य डिसप्ले किया गया है’ कहने पर हमें टोकते हुए ‘साहित्य प्रदर्शित किया गया है’ ठीक करके बोलने को कहा था। किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कुलपति ने मुख्यमन्त्री श्री कल्याण सिंह के माल एवेन्यू स्थित आवास पर प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी के रात्रि-भोज समारोह में भेंट होने पर हमें बताया था कि महामहिम शास्त्री जी ने आपकी वक्तृता-शैली की चर्चा कुछ अवसरों पर की है।

महामहिम श्री शास्त्री जी ने मेरे सुझाव पर हमारे दिव्य मार्गदर्शक परम पूज्य गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा रचित ७० खण्ड वाला सम्पूर्ण वांगमय साहित्य सर्वप्रथम राजभवन-पुस्तकालय में स्थापित कराया था, जो बाद में सैकड़ों पुस्तकालयों तक पहुँचा। वह वास्तव में महान थे। सभी वर्गों व जातियों को समान भाव से देखने और सबको आगे बढ़ाने वाले श्री विष्णु कान्त जी भावी भारत में सभी वर्गों की समरसता का सपना देखते थे। वह कहते थे कि ‘गायत्री और यज्ञ’ ने इस दिशा में बड़ा काम किया है।

वह स्वयं यज्ञीय कर्मकाण्ड के ज्ञाता थे, एक बार उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आवास पर हमारे द्वारा कराए जा रहे गायत्री यज्ञ में उन्होंने अपने लिए बनाए गए आसन पर न बैठकर हमारे समीप बैठकर साथ-साथ मंत्रोच्चारण किया था। उस समय वहाँ विराजे १५० से अधिक वरिष्ठ आईएएस व आईपीएस अधिकारियों सहित प्रान्त के गण्यमान व्यक्तियों ने उन्हें व हमें बड़े ध्यान से सुना था और बाद में अपनी प्रभावी टिप्पणियाँ दी थीं।

श्री शास्त्री जी कहा करते थे कि अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए मरना सबसे बड़ा सौभाग्य होता है। उनका देहान्त भी भारत के यशस्वी महापुरुष डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम जी की भाँति अपनी वाणी-साधना के मार्ग पर रेलगाड़ी में शिवनगरी-गंगानगरी काशी के समीप हुआ, जब वह वाराणसी की साहित्यक संगोष्ठी में भाग लेने जा रहे थे। रेलवे स्टेशन पर अगवानी करने आए लोग उनका पार्थिव शरीर लेकर बड़े भारी मन से काशी पहुँचे थे।

श्रद्धेय पण्डित विष्णु कान्त शास्त्री जी को मेरी आदरेय भावांजलि।

साभार- राम महेश मिश्र, संरक्षक, आल इंडिया जर्नलिस्ट यूनियन