मां विंध्यवासिनी के धाम पर ‘गुंडों’ का कब्जा

नई दिल्ली। विंध्याचल में मां विंध्यवासिनी के धाम पर गुंडों का कब्जा हो गया है। ये गुंडे कोई और नहीं यहां के कुछ अवैध पंडे हैं या पंडों के भेष में कुछ गुंडे हैं। माथे पर त्रिपुंड, गले में सोने की मोटी मोटी जंजीरें, रुद्राक्ष या स्फटिक की माला भी। मुंह में गुटखा दबाए हुए। कुछ तो दारू पीकर टुन्न भी। 
मां विंध्यवासिनी के मंदिर की हर गली में मंदिर से करीब सौ मीटर दूर से ही ये पंडे रुपी गुंडे मिलने शुरू हो जाते हैं। दर्शनार्थियों के पीछे लग जाते हैं। अगर आप इनसे बच गए तो भी खैर नहीं है। नहीं बचे, तो ये साथ चल देते हैं। पटाते हैं आपको कि ये गर्भगृह में बिना लाइन लगाए सीधे दर्शन करवा देंगे। मंदिर के भीतर, इनके लोग सेट होते हैं। जो भक्त बिना पंडों की मर्जी के आए हुए हैं, वो तो बेचारे लाइन में लगे रहते हैं, लेकिन पंडे जिन्हें साथ लेकर आते हैं, लाइन तोड़कर उनको लेकर मंदिर में घुसते हैं। लोगों का विरोध बेमानी हो जाता है। जजमान के साथ पंडे भी मंदिर के भीतर जाते हैं। फिर वहां मोलभाव शुरू हो जाता है। उन पर 11 हजार रुपये के दान से दबाव शुरू हो जाता है। अंत में एक हजार से पांच हजार रुपये तक निकलवा लिया जाता है, जैसा जजमान, वैसी वसूली। 
इधर जो लोग लाइन में स्वतंत्र रूप से खड़े हैं, मंदिर के द्वार पर पहुंचकर भी उनका नंबर नहीं आता। पंडों के जजमानों के बाद उनका नंबर आता है। उन पर भी वही दबाव पड़ता है, लेकिन जो यहां पहले आ चुके हैं या फिर जिन्हें उनके परिचित, रिश्तेदार सचेत कर देते हैं, वो तो अपनी श्रद्धा के मुताबिक, 501, 101, 51, 21 रुपये देकर दर्शन कर आते हैं। लेकिन जो पहली बार आते हैं पंडे इन्हें मूंड़ने की कोशिशों में लग जाते हैं। कई दर्शनार्थी तो लुटकर ही बाहर आते हैं। 
मैंने भी श्रीमती जी के साथ मां विंध्यवासिनी का दर्शन किया। पंडों की चालों से बचते हुए मैं बाकायदा पत्नी के साथ लाइन में लगा था। पीछे से दारू पीकर टुन्न एक कथित पंडा पांच लोगों का परिवार लेकर पीछे से आया और तीसरी लाइन बनाकर आगे खड़ा हो गया। पंडे के जजमान ठीक मेरी पत्नी के सामने आ गए। मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा, पूछा-प्रभु इतनी जल्दी प्रमोशन कैसे हो गया..? अचानक आप पीछे से आगे प्रगट हो गए। वो टेढ़ी मुस्कान मुस्कुराए। इस मुस्कान से वो बताना चाहते थे कि ऊंची सेटिंग से आए हैं। उनको साथ लेकर आए पंडे से मैंने पूछा-क्या गुरू, ये क्या तरीका है..? त्रिपुंडधारी पंडे के भीतर दारू उबल रही थी, लेकिन मुंह में दबा गुटखा साइलेंसर का काम कर रहा था, मुंह उठाकर बोला-का भयल..? शराब का भभका सीधे मुंह पर आया। खैर मैं दर्शन करके बाहर आया, कुछ पंडों से उसकी शिकायत भी की। 
पंडों की इस तरह की गुंडागर्दी का सिलसिला बहुत पुराना है। 22 जुलाई 2013 को एक बड़ी घटना हो गई थी। लाइन तोड़कर जबरदस्ती जजमानों को मंदिर के गर्भ गृह में ले जाते वक्त हरियाणा के एक परिवार ने कुछ पंडों का विरोध किया था। इसके बाद इन गुंडों का गिरोह उस ग्रुप के पुरुषों और महिलाओं पर टूट पड़ा था। बाद में ये मामला तूल पकड़ गया। पंडा समाज ने इस घटना पर माफी मांगी थी।
पिछले साल बसंत पंचमी पर ऐसी एक घटना में एक पंडे ने जौनपुर के एक परिवार को पीटकर घायल कर दिया था, मंदिर में भगदड़ मच गई थी। बाद में पुलिस ने प्रदीप पाठक नाम के इस कथित पंडे को गिरफ्तार भी किया था। यहां ये बात साफ कर दूं कि यहां पंडों के भेष में ये गुंडे ज्यादातर अवैध पंडे हैं, रजिस्टर्ड नहीं हैं, बस भेष बनाकर पंडे बने हुए हैं। अपनी करतूतों से मां के धाम को बदनाम कर रहे हैं। 
पंडों की ये मनमानी सिर्फ विंध्यवासिनी मंदिर तक नहीं है। अष्टभुजा देवी मंदिर के भीतर तो पंडों के भेष में गुंडे नहीं बल्कि ठग हैं। ये गुंडागर्दी नहीं करते, बस श्रद्धालुओं से ज्यादा से ज्यादा वसूलने में इन्हें महारत हासिल है। जैसे ही छोटे से द्वार से कोई श्रद्धालु भीतर पहुंचता है, पंडा उसे धर लेता है, माथे पर मां के चरणों से उठाकर चंदन लगाता है, श्रद्धालु का नाम पूछता है, फिर उस नाम के साथ संस्कृत में उल्टे सीधे मंत्र बोलकर एक रकम भी बोलता है। मेरा और मेरी पत्नी का नाम लेकर पंडे ने श्लोक पढ़ा, उसमें बोला कि आपके नाम से 11 हजार रुपये का संकल्प हो गया है मां के 
शृंगार के लिए। मैंने कहा-महराज जी, जो मेरी श्रद्धा होगी वो मैं करूंगा। मेरे और मां के बीच आप कहां से आ गए। पंडा अड़ गया, मैं आगे बढ़ा तो पंडे के चेले ने हाथ लगाकर रोक दिया, वो बाधा पार की तो अखंड ज्योति पर बैठा पंडा 11 हजार, फिर 11 सौ पर अड़ गया। उससे भी अपनी श्रद्धा की बात कहकर पीछा छुड़ाया। आगे फिर तीन-चार चुंगी, हर चुंगी पर बैठा पंडा। हर पंडा श्रद्धालु को लूटने पर आमादा।
अष्टभुजा देवी मंदिर से सीता कुंड के बीच में एक चाय वाला मिला। मैंने कहा-चाय हमारे मन की पिलाओ, पैसे अपने मन का लो। उसने तरोताजा कर देने वाली चाय पिलाई वो भी कुल्हड़ में। मैंने और श्रीमती जी ने दो-दो कुल्हड़ चाय पी। कीमत पूछी-उसने 7 रुपये प्रति कप के हिसाब से बताया। लोकल चाय 5 रुपये, स्पेशल चाय-7 रुपये कुल्हड़। मैंने उसे दस रुपये के हिसाब से जबरदस्ती करके चुकाया। वो ले नहीं रहा था, लेकिन मेरा मानना था कि इस ऊंची पहाड़ी पर इतनी बढ़िया चाय का दाम तो कम से कम 10 रुपये कुल्हड़ होना चाहिए। एक तरफ ये मेहनतकश था, जो 5 से 7 रुपये की शानदार कुल्हड़ वाली चाय पिला रहा था, दूसरी तरफ वो पंडे थे, जो श्रद्धालुओँ को ठगकर अपनी तिजोरियां भरने में व्यस्त थे। 
जिस गेस्टहाउस में मैं रुका था, वहां एक कार्यक्रम था, उसमें नगर पालिका चेयरमैन भी आए थे। मैंने उनसे पंडों की शिकायत की, कहा कि इससे मां का धाम बदनाम होता है। उन्होंने मेरे आगे हाथ जोड़े, कहा कि पंडों की गलती के लिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूं.. और क्या कर सकता हूं। मैंने कहा-मुझसे क्षमा मत मांगिए, इन गुंडे पंडों का कुछ कीजिए। बोले-कैसे करूं और कौन करेगा भी। यहां का विधायक भी पंडा है। यानी भांग तो कुएं में ही पड़ी है। हे विंध्यवासिनी माता, अब आप ही इन धूर्त और गुंडे पंडों को कुछ सद्बुद्धि दें। मैं विंध्याचल पंडा समाज से भी अपील करना चाहता हूं कि आप अपने बीच आ गए इन गुंडों को पहचानिए, ढूंढकर इन पर कार्रवाई करवाइए। इन चंद गुंडों की वजह से पूरा पंडा समाज बदनाम हो रहा है। धूर्तता से अवैध कमाई करके ये गुंडे मां विंध्यवासिनी के धाम को भी बदनाम कर रहे हैं।

आजतक चैनल के वरिष्ठ पत्रकार श्री विकास मिश्र के फेसबुक पेज से साभार।