गाँव आज भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के आधार स्तंभ हैं- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

टीकमगढ़। भारत की आत्मा गाँव में बसती है। सरित-सरोवर, झील-जलाशय, झरना-प्रपात, विविध-विटप, वन-पर्वत, खेत-खलियान और सहज-स्वाभाविक जीवन शैली यह सब गाँव की दिव्यता है। धरती-अम्बर और सकल प्रकृति-अस्तित्व रक्षण के लिये पर्यावरण सन्तुलन सहेज कर रखना प्रथम अनिवार्यता होनी चाहिये…! यह सच्चाई है कि मानव का आरम्भिक जीवनकाल जंगलों और पर्वतों में बीतता हुआ गाँवों में पूर्णरूप से विस्तार पा गया। गाँव में ही मनुष्य ने सभ्यता का पहला चरण रखा था। जब गाँव से सभ्यता सम्पन्न हो गई, तब वह धीरे धीरे अपना रूपान्तरण करती हुई नगर तक बढ़ चली। वास्तव में गाँव मनुष्य से निर्मित होकर भी प्रकृति देवी के गोद से फले-फूले और सुसज्जित हुए हैं, जबकि शहर तो पूर्णरूप से मानवकृत कृत्रिमता से सजे सजाए हैं। इसलिए प्रकृति प्रदत्त गाँव की शोभा हठात् हमारे मन को आकर्षित कर लेती हैं। गाँव आज भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के आधार स्तंभ हैं। गाँवों में भारतीय संस्कृति के दर्शन होते हैं। यहाँ भारत की सदियों से चली आ रही परंपराएँ आज भी विद्‌यमान हैं। यहाँ के लोगों में अपनापन और सामाजिक घनिष्ठता पाई जाती है। यहाँ खुली धूप और हवा का आनंद उठाया जा सकता है। यहाँ हरियाली और शांति होती है। भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश है जिसका एक बहुत बड़ा भाग आज भी गाँवों में निवास करता है। गाँव के लोग आज भी अपनी आजीविका के लिए पूर्ण रूप से कृषि पर निर्भर हैं। वास्तविक रूप में यदि देखा जाए तो भारत की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि ही है। भारतीय ग्राम्य-जीवन सादगी और प्राकृतिक शोभा का भण्डार है। अधिकांश ग्रामवासी किसान होते हैं। कठोर परिश्रम, सरल स्वभाव और उदार हृदय उनकी विशेषताएं हैं। सुबह जब किसान अपने खेतों में हल चलाता है, तो पक्षी उसके बैलों की गति के साथ श्रम की महिमा का संगीत छेड़ देते हैं। किसान स्वभाव से निश्छल होते हैं। सबके पेट भरकर और तन ढ़ककर भी स्वयं रुखा-सुखा खा लेते हैं।  “आचार्यश्री” ने कहा – प्रत्येक देशवासियों को गाँवों के संरक्षण के लिए सामने आना होगा। गाँव बचेगा तो संस्कृति बचेगी और संस्कृति बचेगी तो देश बचेगा। अत: यह आवश्यक है कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने के साथ ही हम गाँवों के विकास हेतु नई-नई योजनाएँ विकसित करें और उन्हें कार्यान्वित करें। इस प्रकार निश्चय ही हमारा देश विश्व के अग्रणी देशों में से एक होगा…।

“आचार्यश्री’ ने कहा – भारतीय संस्कृति में जल को भी देवता माना गया है। सरिताओं को जीवनदायिनी कहा गया है, हमारी संस्कृति में वृक्षों को भी देवता माना गया है। हमारे महान आयुर्विज्ञानियों की धारणा है कि संसार में ऐसी कोई वनस्पति नहीं जिसका सदुपयोग न हो। संभवतः इसी नाते वृक्षों को वंदनीय कह गया है। मत्स्यपुराण में तो यहां तक कहा गया है कि दस कुओं के बराबर एक बावड़ी है, दस बावड़ी के बराबर एक तालाब है, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र है और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है। हम प्रकृति से और प्रकृति हम से विलग रह ही नहीं सकती। भारतीय मनीषियों ने समूची प्रकृति को क्या, सभी प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वरूप माना। ऊर्जा के अपरिमित स्रोत को देवता माना … सूर्यदेव भव। वस्तुतः सूर्य हमारा यानी इस ग्रह का जीवनदाता है। बिना उसके वनस्पतियों का और परोक्ष रूप से अन्य जीवों का अस्तित्व असंभव है। तभी तो वैदिक ऋषि कामना करते हैं कि सूर्य से कभी हमारा वियोग न हो – नः सूर्यस्य संदृशे मा युयोथाः …। उपनिषदों में सूर्य को प्राण की संज्ञा दी गई। हमारी संस्कृति संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। प्राचीनता के साथ इसकी दूसरी विशेषता अमरता है। भारतीय संस्कृति कर्म प्रधान संस्कृति है। मोहनजोदड़ो की खुदाई के बाद से यह मिस्र, मेसोपोटेमिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं के समकालीन समझी जाने लगी है। चीनी संस्कृति के अतिरिक्त पुरानी दुनिया की अन्य सभी – मेसोपोटेमिया की सुमेरियन, असीरियन, बेबीलोनियन और खाल्दी प्रभृति तथा मिस्र ईरान, यूनान और रोम की संस्कृतियाँ काल के कराल गाल में समा चुकी हैं, कुछ ध्वंसावशेष ही उनकी गौरव-गाथा गाने के लिए बचे हैं; किन्तु भारतीय संस्कृति कई हज़ार वर्ष तक काल के क्रूर थपेड़ों को खाती हुई आज तक जीवित है। अतः प्रकृति का व संस्कृति का संरक्षण करना हर देशवासियों का परम कर्तव्य है। हमारे ग्रंथों में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी-पर्वत आदि की इसीलिए पूजा की जाती है, जिससे उन्हें नुकसान ना पहुंचे। हमें गांवों से जुड़े रहना चाहिए। गाँव का जीवन शहरी जीवन से अलग होता है। यहाँ की आबोहवा में जीना सचमुच आनंददायी होता है। गाँवों का प्राकृतिक सौंदर्य हमें जीवन की धन्यता, दिव्यता और नैसर्गिकता की अनुभूति कराता है, हमें प्राकृतिक बनाता है। गाँव में प्रकृति की निराली सुंदरता चारों ओर दिखाई पड़ती है। ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, कल-कल करती नदियां, फुदकते हुए पक्षियों का शोर, पंख फैलाकर नाचते मोर, महकते हुए फूलों पर मंडराते भौंरे, पेड़ों पर बैठे पक्षी किसे आकर्षित नहीं करते। गावों का जल व वायु स्वच्छ होती है। प्रदूषण व शोर गुल नहीं व्याप्त होता है। गाँवों से हमें प्रकृति व मनुष्यों के बीच एक ऐसा अनूठा रिश्ता देखते हैं जिसमें दोनों ही एक-दूसरे का सम्मान करते हैं एवं एक-दूसरे पर परस्पर निर्भर है…।