विश्व एक परिवार है और पूरी दुनिया को अपना परिवार मानकर आगे बढ़ने की जरूरत है-सुधांशु जी महाराज

नई दिल्ली। मैं आपसे कहता हूँ कि राग को तोड़ो। राग से मुक्ति बेहद ज़रूरी है। अगर राग को तोड़ने में सहज समर्थ नहीं हो पा रहे हो, तो एक तरीका मैं आपको बताता हूँ। वह यह कि तुम अपने आपे का विस्तार करो, इसको फैलाओ, इसका इतना विस्तार करो कि तुम प्रेम-स्वरूप बन जाओ। अपने प्यार को इतना बढ़ाओ कि वह सीमाबद्ध न रह जाय। प्यार केवल अपने तक नहीं, निज परिवार तक नहीं, अपने मोहल्ले तक नहीं, अपने नगर तक भी नहीं; बल्कि अपने राष्ट्र तक अपने प्यार को लेकर जाओ। तुम जब इसमें सफल हो जाओगे, तब तुम्हारे प्यार का दायरा और अधिक बढ़ जाएगा और वह सारे विश्व तक फैलने लगेगा। तब तुम वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव को आत्मसात कर सकोगे।

तुम्हारे द्वारा अपने प्यार को फैलाने की परिणति क्या होगी, तुम्हें मालूम है? सीमित प्यार को असीम विस्तार दे देने का प्रतिफल यह होगा कि विश्व रूप-विराट् रूप परमात्मा स्वयं तुम्हारे सामने आ खड़ा होगा। तुम बस सेवा करने के लिए निकल पड़ो। प्रभु मिलन का बड़ा सशक्त माध्यम है यह। परमात्मा की तरफ जाने के जितने रास्ते हो सकते हैं, उनमें ‘सेवा’ सबसे अच्छा माध्यम है, यह भी प्रेमभाव बढ़ाए बिना सम्भव नहीं। भगवान की कृपा पाने के लिए प्रेम का वितरण बहुत बड़ा माध्यम है।

कबीर साहब कहते हैं- ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय। अब यह प्रेम, यह प्यार है क्या? इसका उत्तर मैं आपको देना चाहूँगा। किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, किसी वस्तु विशेष का नहीं, किसी परिवार का नहीं, किसी प्रदेश का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण दुनिया को अपना परिवार मानकर निकल पड़ो। यदि तुम ऐसा कर सके तो कहीं रुकावट नहीं आने वाली, सफलता तुम्हारे क़दम चूमेगी।

साभार – राम महेश मिश्र, निदेशक, विश्व जागृति मिशन, नई दिल्ली