हम सभी ब्रह्मांड संकल्प शक्ति से नयी सृष्टि के नव निर्माण में निम्मित बन सकते हैं-अवधेशानंद गिरी जी महाराज

टीकमगढ़। मनुष्य स्वयं के संकल्प का विस्तार है; जैसा संकल्प होगा वैसी ही सिद्धि और सफलता साकार होगी। शुभ-संकल्प ही जीवन सार्थकता और सिद्धि का मूल है …! शुभ-संकल्प में अलौकिक शक्तियाँ एवं अप्रतिम सामर्थ्य विद्यमान है। मन में शुभ, पवित्र और दिव्य संकल्प उदित होते रहें। शुभ-संकल्प के उदय होने का अर्थ है – भागवत-सामर्थ्य, दिव्यता और सकारात्मकता का जागरण। शुभ संकल्प हमें अच्छे पक्ष से जोड़े रखते हैं। विचारों से संकल्प, संकल्प से क्रिया और फिर जो परिणाम मिलता है, इनमें आपस में तालमेल रहता है। साहस और निश्चयात्मक विश्वास संकल्प के दो पहलू हैं, इन्हीं से मनुष्य की जीत होती है। साहस निरन्तर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है। इससे कर्म में गति बनी रहती है। निश्चयात्मक विचार प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सन्तुलन बनाये रहते हैं, इस तरह से मनुष्य अविचल भाव से अपने इच्छित कर्म पर लगा रहता है।

संकल्प शक्ति के महत्व को संक्षेप में प्रतिपादित करते हुए “आचार्यश्री” ने कहा – हमारे वर्तमान में किये जा रहे संकल्पों से ही हमारे भविष्य का निर्माण होता है। इसलिए जितना अधिक हो सकारात्मक संकल्प करें। आपके यही समर्थ संकल्प आपके उज्जवल भविष्य की नींव का कार्य करेंगे…।

“आचार्यश्री” ने कहा – पुरुषार्थ ही जीवन है और इसका अभाव ही मृत्यु। पुरुषार्थहीन व्यक्ति जीवित रहते हुए भी मरे के ही समान होता है। हमारा पूर्व पुरुषार्थ ही आज का भाग्य बन कर आता है और आज का पुरुषार्थ भावी भाग्य रेखायें खींचता हैं। “प्रयत्नशील व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से भाग्य को भी दवा देने की शक्ति रखता है”। पुरुषार्थ ही स्वतन्त्रता और समता का रक्षक है। जो लोग पुरुषार्थी नहीं होते, उनकी स्वतन्त्रता और समानता के हक छिन जाते हैं। उन्हें परतन्त्र और निम्न भेदभाव पूर्ण तिरस्कृत जीवन बिताना पड़ता है। इतिहास साक्षी है कि हमने पुरुषार्थ को छोड़कर जब प्रमादी जीवन बिताना शुरू किया, अपनी शक्ति और क्षमता पर भरोसा न रखकर दूसरों से सहायता की आशा रखी, भाग्य कृपा का आश्रय लिया, तब-तब ही हमें परतन्त्र जीवन बिताना पड़ा, गुलामी के दिन काटने पड़े, दूसरों द्वारा शोषित होना पड़ा एवं ठोकरें खानी पड़ीं। और, जब हमारा सामूहिक पुरुषार्थ जगा, हमने परतन्त्रता के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा तो फिर स्वतन्त्रता और समानता के अधिकार प्राप्त कर लिए। पुरुषार्थ ही हमारी स्वतन्त्रता और सभ्यता की रक्षा करने के लिए दृढ़ दुर्ग है जिसे कोई भी बेध नहीं सकता। हमें अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर, पुरुषार्थ के बल जीवन संघर्ष में आगे बढ़ना होगा। यदि हमें कुछ करना है, स्वतन्त्र रहना है व जीवित रहना है तो एक ही रास्ता है – पुरुषार्थ की उपासना का। इसलिये पुरुषार्थ ही हमारे जीवन का मूल मन्त्र होना आवश्यक है…।

“आचार्यश्री” ने कहा मनुष्य के पास जन्म से संकल्प की सामर्थ होती है, उसके पास अंतहीन संभावनाएं है क्योंकि वो स्वयं ईश्वर का अंश है। व्यक्ति की समझ में ये बात आ जाए तो वो निश्चित रूप से ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। भारतीय संस्कृति नर से नारायण बनाने की संस्कृति है। मनुष्य ही वो प्राणी है जसके पास ब्रह्म को जानने का अनुभव व ज्ञान होता है। मनुष्य के अलावा किसी भी प्राणी के पास ये विशेषता नही है कि वह ब्रह्मतत्व को पहचान सके। जैसे ही मनुष्य को ये अनुभूति होने लगती है, वह अपने सम्पूर्ण स्वरूप से परिचित हो जाता है।

शास्त्रों में लिखा गया है : “ब्रह्मा ने संकल्पों से सृष्टि रची”। हम सभी ब्रह्मांड संकल्प शक्ति से नयी सृष्टि के नव निर्माण में निम्मित बन सकते हैं। हमारे संकल्प ही हमारी स्वस्थिति का आधार है। हमारे संकल्प ही हमारे जीवन की दिशा और दशा को तय करते हैं। संकल्पों से ही हम अपनी स्मृतियाँ जागृत करते हैं। संकल्पों की शक्ति विज्ञान की शक्ति से अधिक शक्तिशाली है। संकल्पों की शक्ति से हम बहुत से कार्य इतनी तीव्र गति से करते हैं जिनके सामने विज्ञान के साधन भी बोने नज़र आते हैं। संकल्पों की शक्ति से हम ऐसे कार्य भी सम्पन्न कर सकते हैं जिन्हें विज्ञान पूरा करने में असमर्थ है। जिसमें पूरी शक्ति से काम करने की दृढ़ लगन है उसके मार्ग में चाहे कितना भी प्रबल विरोध का प्रवाह आये, वह उसकी गति को अवरुद्ध नहीं कर सकता अथवा पीछे नहीं हटा सकता। आप आगे बढ़ने का प्रयत्न जितनी दृढ़ता के साथ करेंगे, सफलता उतनी ही आपके समीप आती जायगी। पुरुषार्थ सब अभावों की पूर्ति करता है। इसीलिए कहा है – “उद्योगे नास्ति दारिद्रयम्…” अर्थात्, पुरुषार्थ करने पर दरिद्रता नहीं रहती। “आचार्यश्री” ने कहा – साधक को अपने विचारों के प्रति हर-पल जागरूक रहना चाहिए। आज का युग समाधि का युग नहीं, जागृति का युग है। अशुभ-विचारों की अशुभ प्रतिक्रिया को ही ध्यान में रखते हुये शास्त्रकार ने लिखा है :

यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च, यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु।

यस्मान्नऋते किंचन कर्म क्रियते, तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु॥

अर्थात्, जिस मन से अनुभव, चिन्तन तथा धैर्य धारण किया जाता है, जो इन्द्रियों में एक तरह की ज्योति है, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो…।”