‘इक्कीसवीं सदी-नारी सदी’ – स्वामी चिदानंद सरस्वती जी महाराज

नई दिल्ली/ उमाशंकर उपाध्याय- प्रतिमा चतुर्वेदी। पवित्र देव भूमि भारत जहां देवियों की पूजा होती है वहीं दूसरी तरफ ‘कन्या भ्रूण हत्या’ जैसी विकृत मानसिकता अपना पांव पसार रही है। मतलबपरस्ती में इंसान इतना अंधा हो गया है कि अपने ही कलेजे के टुकड़े का अपने ही हाथों से गला घोंट रहा है, उस मां के जज़्बात को एक झटके में तार तार कर देता है, जिसे वह 9 महीने तक अपनी कोख में पालती है। वक़्त बदला और बदलते वक्त के साथ नारी ने हर क्षेत्र में अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित किया, चाहे वह राजनीति हो या शिक्षा या फिर अन्तरिक्ष में उड़ान भरने की चाहत, लेकिन जो चीज नहीं बदली वह है पुरुष का नारी को सम्मान ना देने की प्रथा। इसी मानसिकता का परिणाम है कन्या भ्रूण हत्या, जिस तरह से भ्रूण हत्याएं हो रही हैं उससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। यदि यह नहीं रूका तो इसके चौंकाने वाले परिणाम भी सामने होंगे जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। वंश को चलाने के लिए लड़के की चाह में लड़कियों को गर्भ में मार दिया जा रहा हैं। क्या लडकियों के बगैर हम वंश बढ़ा सकते हैं? क्योंकि संतान को जन्म तो एक नारी ही देती है। जब नारी का अस्तित्व ही नही होगा तो वंश कैसे बढ़ेगा….इसलिए आज जरूरत है एक ऐसे समतामूलक समाज के निर्माण की जिसमें नारी को वह मान-सम्मान मिले जिसकी वह हक़दार है। भ्रूण हत्या के कारण लिंगानुपात तेजी से बिगड़ रहा है और यदि इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो देश का सामाजिक ढांचा बिगड़ जाएगा और लड़कों को वंश बढ़ाने के लिए शादी और शादी के लिए लड़कियां नहीं मिलेंगी, इसलिये आज एक समतामूलक सोच समाज में पैदा करना होगा जिसमें लोग कन्या को बोझ नहीं समझेंगे और लड़कियों को भी वंश बढ़ाने के लिए बराबर का आधार मिल जायेगा तभी समाज में कन्या भ्रूण हत्या पर सम्पूर्ण रोक लग सकती है।
आज 21वीं सदी में सरकार कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और समाज में महिलाओं को उनका स्थान दिलाने के हर कोशिश कर रही है. इसके अंतर्गत सबसे पहले गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के अन्‍तर्गत गर्भाधारण पूर्व या बाद लिंग चयन और जन्म से पहले कन्या भ्रूण हत्‍या के लिए लिंग परीक्षण करने को कानूनी जुर्म ठहराया गया है, हाल ही में प्रकाशित केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2001 से 2005 के अंतराल में करीब 6,82,000 कन्या भ्रूण हत्याएं हुई हैं। इस लिहाज से देखें तो इन चार सालों में रोजाना 1800 से 1900 कन्याओं को जन्म लेने से पहले ही दफ्न कर दिया गया। समाज को रूढ़िवादिता में जीने की सही तस्वीर दिखाने के लिए सीएसओ की यह रिपोर्ट पर्याप्त है।
महिलाओं से जुड़ी समस्या पर काम करने वाली संस्था ‘‘डिवाईन शक्ति फाउण्डेशन’’। इस समस्या से काफी चिंतित है। वर्ष 1981 में 0.6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 962 था, जो 1991 में घटकर 945 हो गया और 2001 में यह 927 रह गया है। इसका श्रेय मुख्य तौर पर देश के कुछ भागों में हुई कन्या भ्रूण की हत्या को जाता है। उल्लेखनीय है कि 1995 में बने जन्म पूर्व नैदानिक अधिनियम नेटल डायग्नोस्टिक एक्ट 1995 के मुताबिक बच्चे के लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है। इसके बावजूद इसका उल्लंघन सबसे अधिक होता है। यूनिसेफ के अनुसार 10 प्रतिशत महिलाएं विश्व की जनसंख्या से लुप्त हो चुकी हैं, जो गहन चिंता का विषय है। स्त्रियों के इस विलोपन के पीछे कन्या भ्रूण हत्या ही मुख्य कारण है। तमाम कानून और अधिनियम होने के बाद भी भारत में सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण हत्या होते हैं सीधी सी बात है जब तक समाज के एक बड़े तबके की सोच नहीं बदलती तब तक कुछ नहीं हो सकता।
मंदिरों में जिस देवी को पूजते जाते हैं उसी के स्वरुप को इस संसार में आने से पहले ही ख़तम कर दिया जाता है। वाह क्या सोच है हमारी? अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय मैं न तो बुआ होगी और न ही मास्सी, भाईओं को राखी कौन बांधेगा, बेटों के लिए बहुएं कहाँ से लायेंगे।
इस विषय से चिंतित स्वामी चिदानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि मानव समाज के दो आधार, दो पहिये होते हैं, एक नर दूसरी नारी। नर स्वभावातयः श्रम प्रधान होता है तो नारी भावना प्रधान। दोनों की ही समाज को जरूरत होती है। कर्मयोग की भी, भक्तियोग की भी। एक के बिना दोनों में अपंगता व अपूर्णता रहती है। इसलिए सृष्टि के निर्माणकर्ता ने दोनों को बनाया है और उन्हें अलग-अलग पहचान, आकृति, योग्यता तथा स्वभाव दिया। 
घर, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व को इन दोनों की ही आवश्यकता है। एक के बिना दूसरा अधूरा होता है, एक से जुड़कर एक भी ग्यारह बन जाता है। ऐसी स्थिति में दोनों में किसी को कम ज्यादा आंकना भारी भूल होगी। हमारे यहां गुलामी के समय आर्थिक बदहाली ही नहीं हुई वरन् अशिक्षा, अंधविश्वास, मूढ़ मान्यता जैसी कई कुरीतियाँ भी पनप गई, जिनमें में से एक है, नर-नारी भेदभाव। लड़की बेकार है, लड़का कुल का दीपक, उद्धारक है। ऐसा कुछ भी नहीं है। लड़कियाँ भी लड़कों से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही होती है।
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि नारियाँ लक्ष्मी, दुर्गा तथा सरस्वती का रूप होती है, वे एक ही नहीं वरन् दो कुलों में उजाला करती है। वे नारियाँ ही हैं जो एक अनजाने व्यक्ति, परिवार से जुड़कर उन्हें अपना बना लेती है और अपनी पहचान दूसरों में मिला देती है। इतना समर्पण, इतना लचीलापन भला और कहाँ होगा? किसके पास होगा?
नारी का ये गुण ही उसे महान बनाता है। इसी आधार पर हम कह सकते हैं ‘‘नारी परमात्मा की सर्वोत्तम कृति है।’’ यदि हमें नम्बर देने हों तो नारी को 21 नर को 19 दूँगा, क्योंकि नारी हमेशा किसी न किसी सेवा में ही जीवन गुजरती है। पहले पिता, फिर पति इसके बाद फिर संतान तक ये क्रम बना रहता है, इस तरह से नर के जीवन में नारी की सदैव जरूरत रहती है। फिर भी हमारे समाज में न जाने से एक दकियानूसी परम्परा ने कहाँ जड़ जमा ली कि लड़का कुल का दीपक, नारी नरक की जान? ये मूढ़ मान्यता अन्धपरम्परा है। इसका निवारण होना ही चाहिए। जहाँ तक कन्या भू्रण हत्या का प्रश्न है तो कन्या भू्रण में माँ से अधिक सास और पति दोषी पाये जाते हैं, सासें अधिकांशतथः बिलेन का रोल अदा करती है, कन्याभू्रण हत्या में। नारी ही नारी की दुश्मन बन जाती है। ये अजीब दास्तां है। खासकर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान आदि सम्पन्न प्रान्तों में कन्याभू्रण हत्या, कन्या जन्म दर की सर्वे रिपोर्ट बड़ी चिंताजनक है। इसे रोकने के लिए जागरूकता, जन शिक्षा जरूरी है, लोग जागरुक होंगे तो समझेंगे। तो ही इस बुराई से अपने आप दूर हो सकेंगे। नारी हमारे जीवन के लिए बहुत जरूरी है, पुरुष से भी ज्यादा हर क्षेत्र में, हर कार्य में, यह तथ्य समझना जरूरी है। अन्तिम बात कन्या भू्रण हत्या रोकने के लिए जीवा, सर्व धर्म संसद यहीं आह्वान करती है कि ‘‘21 सेन्चुरी मदर सेन्चुरी’’ ‘इक्कीसवीं सदी-नारी सदी’। हम महिलाओं के सम्मान, इनकी शिक्षा, इनके स्वास्थ्य, इनके रोजगार के विविध कार्यक्रम चला रहे हैं। हमारे यहाँ एक विशेष विंग, नारी उत्थान पर ही कार्य कर रहा है, जिसका नाम है ‘‘डिवाईन शक्ति फाउण्डेशन’’। हम नारियों को अपनी हर गतिविधि में विशेष वरीयता, विशेष महत्व दे रहे हैं। ताकि समाज से भेदभाव भरी सारी प्रथाएँ दूर हो। सरकारों तथा अन्य धार्मिक संस्थाओं तथा सभी सन्तों एवं गुरुओं से भी हमारा यही अनुरोध है।