सत्य प्रताड़ित तो हो सकता है लेकिन पराजित नहीं- राम महेश मिश्र  

नई दिल्ली। सत्य प्रताड़ित हो सकता है, पराजित नहीं। इस छोटी सी उक्ति में वह सार भरा है, जिस पर पूरा का पूरा ग्रन्थ लिखा जा सकता है, पूरा जीवन जिया जा सकता है, जीवन में व्यस्त रहते हुये भी आप स्वस्थ और मस्त रह सकते हैं। छोटी सी बात और जीवन भर की प्रसन्नता। जीवन ही नही, जन्मों-जन्मों तक आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य द्वारा अपने जीवन में गौरवपूर्ण बिताया गया एक क्षण भी कई युगों के समान होता है और वह क्षण आता है सत्य के आचरण से, सत्य भाषण से। सत्य की शक्ति सब शक्तियों से ज्यादा है। सत्य सभी धर्मों से ऊपर होता है, सभी धर्मों का मूल ही सत्य है। सत्य बुराई को अच्छाई से जीतने की प्रेरणा देता है।

सत्यनिष्ठ को विश्वास होता है कि प्रेम और कष्ट उठाने के सिद्धान्त से वह अपने विरोधी के मन में नैतिक भावना को जाग्रत कर सकता है, जो अक्सर सुषुप्त रहा करती है। हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश अवश्य होता है और उस अंश से प्रेम के जरिये सत्य के लिये नैतिक भावना को जाग्रत किया जा सकता है। उसकी बुझी ज्योति को जलाया जा सकता है। ज्योति जलते ही अंधेरा छट जाता है और नूतन प्रकाश का संचार हो जाता है। एक बुझा हुआ दीपक एक दीप भी नहीं जला सकता परन्तु एक जला हुआ दीपक हजारों बुझे दीयों को प्रज्ज्वलित कर देता है। यही तो है सत्यरूपी दीपक की शक्ति।

यह है प्रेम की शक्ति और यही प्रेम वह साधना है जिसके द्वारा सत्य की, समता की, सरसता की अनुभूति होती है। सत्य का धर्म मानववादी होता है, मानवतावादी होता है अर्थात् वह ’हृदय का धर्म’ होता है। सत्य की पुकार हृदय से होती है। हृदय से उठने वाली आवाज ईश्वर की होती है। अर्थात् कहा जा सकता है कि सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है। सत्य तो आत्मा का कवच होता है जो आत्मा में निहित धैर्य, क्षमा, कष्ट, सहनशीलता सद्भावना जैसे गुणों की रक्षा करता है।

इतिहास गवाह है ऐसी महान आत्माओं से, जिनके जीवन का लक्ष्य ही सत्य का आचरण करना रहा है। सत्य का प्रचार करने का परित्याग करने की अपेक्षा विष का प्याला पीना पसन्द करने वाले सुकरात ने सच्चे अर्थो में सत्य का पालन किया था। भक्तराज प्रहलाद भी एक सत्यभाषी राजकुमार थे, जिन्होंने सत्य और विश्वास का परित्याग करने के बजाय अपने पिता की नाना प्रकार की यातनाओं को सहर्ष स्वीकार किया था। धर्मराज युधिष्ठिर आजीवन सत्य पर डटे रहे। विश्व इतिहास में इस तरह के अनेक उदाहरण पाये जा सकते हैं।

‘सत्य’ इन ढाई अक्षरों में वह विलक्षण क्षमता है, जिसके अभ्यास से मानव अपने आप में, अपने परिवार और फिर समाज में आमूलचूल परिवर्तन कर सकता है। ध्यान रहे! मनुष्य को चाहिये कि वह खुद ईमानदार बने, सत्य का पालन करे, सत्य के साथ ईमानदारी का समावेश करे। सत्य व ईमानदारी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज समाज में लाखों बुराईयां व्याप्त हैं, जिनके लिए पूरा समाज, पूरा देश, राजनेता, अभिनेता, सन्त, समाज सभी चिन्तित हैं। वस्तुतः अनेक लोग स्वयं को नहीं बदल पाते।

दरअसल, व्यक्ति अपने-आपको बदलना नहीं चाहता। वह स्वयं भ्रष्टाचारी व असत्यवादी होते हुये भी अपने सहयोगी से सत्य की पूर्ण अपेक्षा करता है। वह सामने वाले से एक क्षण का भी असत्य सहन नहीं कर सकता। सत्य प्राप्त होता है श्रेष्ठ विचार से। बस विचारों में परिवर्तन लाना ही सत्य की ओर बढ़ना है। एक सोच ही हमारी दिशा बदल देती है, संस्कार बदल देती है। जीवन में सत्य की अनुभूति करना ईश्वर की अनुभूति के समान है। जीवन में किसी और को बदलने की बजाय ‘‘मैं और मेरा बच्चा बदले’’ भर से समाज में विलक्षण परिवर्तन हो जाते हैं।

दूसरों से त्याग की अपेक्षा करने से पहले अपना सर्वस्व त्याग देने की भावना एक ऐसी ताकत देती है, जिसे शब्दों में नही बांधा जा सकता। यदि हममें से प्रत्येक व्यक्ति जो कि सत्य की पवित्रता में विश्वास करता है, इस भावना के अनुसार ढालने की चेष्ठा करे, तो नवीन समाज की स्थापना में इतना थोड़ा सा समय लगेगा कि हम उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जायेंगे। परन्तु जरूरत इस बात की है कि हमें सबसे पहले स्वयं अपने को बदलना होगा।

सत्य तो सदा सत्य ही है। सत्य को हम लाखों प्रकार से प्रकट करें, उसे चाहे जितना असत्य सिद्ध करने की कोशिश कर ली जाए फिर भी हर बार सत्य तो सत्य ही रहता है। मस्तिष्क की शक्तियां सूर्य की किरणां के समान हैं, जब वह सत्य पर केन्द्रित होंगी तो जीवन कुन्दन की तरह चमक उठेगा। सच कहूं, वही सत्य-रूपी कुन्दन सा जीवन चिरयुवा स्वामी विवेकानन्द के समान विश्व में अपनी विलक्षण प्रतिभा के झण्डे गाड़ता है।

लेखक विश्व जागृति मिशन, आनन्दधाम, नयी दिल्ली के निदेशक हैं।