जिस अध्यात्म से मनुष्य के मन को शांति मिले, वही सच्चा अध्यात्म है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। प्रसन्नता पदार्थ सापेक्ष नहीं अपितु विचार सापेक्ष है। प्रसन्नता वस्तुओं, परिस्थितियों और लोगों पर निर्भर नहीं है। प्रसन्नता जीवन जीने का एक ढंग है, जो सकारात्मक और श्रेष्ठ विचारों से जीवन में आती है। चिर-स्थायी प्रसन्नता का मूल-आधार आध्यात्मिक चिंतन में निहित है। अतः सत्संग, स्वाध्याय एवं सत्पुरुषों का अनुशीलन ही श्रेयस्कर है ..! प्रसन्नता ही सभी लक्ष्यों का परम लक्ष्य है और यह चैतन्यता की वह अवस्था है, जो आपके भीतर पहले से प्रस्तुत है। किसी कारण से मिली खुशी दुःख का ही एक रुप है, क्योंकि वह कारण आपसे कभी भी छिन सकता है। अकारण खुश होना सही मायने वह खुशी है, जिसका अनुभव सभी करना चाहते हैं। जब हमारा जीवन भीतरी आनंद की अभिव्यक्ति बन जाता है, तब हम स्वयं को इस ब्रह्यांड की रचनात्मक ऊर्जा के साथ एकाकार अनुभव करते हैं और एक बार यह क्रम बन जाए, तो जीव को यह अनुभव होता है कि वह सब कुछ प्राप्त कर सकता हैं, जो वह पाना चाहते हैं। स्थायी सुख की कुंजी है – अपने स्रोत, अपनी अंतर्रात्मा के अपरिवर्तनीय सारतत्त्व के साथ तादात्म्य स्थापित करना। उसके बाद आप सुख की खोज नहीं करते, क्योंकि यह आपके भीतर ही है। सकारात्मक मन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है – शांत मन होना। शांत मन निर्णय, विश्लेषण ओैर व्याख्या की सीमा से परे होता है। जब व्यक्ति जीवन के सारे वैषम्य स्वीकार कर लेता है, तब वह सुख और दुःख के किनारों के बीच, बिना किसी की सहायता के सहजता से तैर सकता है और सही मायनों में यही स्वाधीनता की प्राप्ति है!

“आचार्यश्री” ने कहा – मनुष्य-जीवन का सर्वश्रेठ लक्ष्य है – अपना सम्पूर्ण आध्यात्मिक विकास करना और समस्त संसार को अपने जीवन के द्वारा सर्वोत्तम योगदान देना। जिस अध्यात्म से मनुष्य के मन को शांति मिले, वही सच्चा अध्यात्म है। मन की प्रसन्नता का हमारी शारीरिक स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। हम मानसिक स्तर पर प्रसन्न रहते हैं तो हमारा शरीर भी स्वस्थ रहता है। इसलिए मनुष्य शारीरिक रूप से कितना ही कमजोर क्यों न हो, लेकिन उसे मानसिक रूप से परिपक्व होना चाहिए। मानसिक प्रसन्नता हमें आशावादी बनाती है और आशा हमें लक्ष्य के करीब लाती है। जब हमारे सपने टूटते हैं तो जीवन के प्रति हमारा उत्साह-उमंग भी समाप्त होने लगता है। फिर हमें कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती और हम जीते जी अपने को मृत मान लेते हैं। जबकि हमें सोचना चाहिए कि जब हम अच्छा करेंगे तो अच्छा अनुभव होगा और जब हम कुछ गलत करेंगे तो उसका अनुभव भी बुरा ही होगा। जैसे व्यवहार की अपेक्षा हम दूसरों से करते हैं वैसा ही व्यवहार हमें भी दूसरों से करना चाहिए। हर आत्मा में परमात्मा का वास है। हर आत्मा परमात्मा का मंदिर है। इसलिए हर व्यक्ति को अपने अंदर ईश्वर की खोज करनी चाहिए, ऐसा करने से मनुष्य बुराइयों से अपने आप ऊपर उठ जाता है।

“आचार्यश्री” ने कहा – आत्म के अनुशासन में यदि हम जीवन जीते हैं तो कभी दुःखी नहीं होना पड़ेगा। अपनी आत्म की आवाज को सुनेंगे तो संतोष मिलेगा। हम अपने को नहीं जानते हैं। हम स्वयं को दूसरों की आँख से देखते हैं। अपने मूल्य व चाहत भी हम तय नहीं करते हैं। समाज सारी धारणाएँ देता है, उसी आलोक में हम जीते हैं। हमारे जीवन में धारणाओं का बड़ा महत्व है। हम धारणाओं से संचालित होते हैं। हमारा मस्तिष्क स्वतन्त्र रुप से कार्य नहीं करता है। वह पूर्वाग्रहों से चलता है। अध्यात्म हमें अपने भीतर संतोष भाव जाग्रत करना और आत्म से संबंध स्थापित करना सिखाता है। अध्यात्म जीवन जीने की कला का नाम है। जब मनुष्य अपने भीतर संतोष भाव जाग्रत करता है तो फिर उसे किसी अध्यात्म की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि तब उसे स्वत: ही प्रत्येक वस्तु और अवस्था में अध्यात्म प्राप्त हो जाता है। संतोष से बड़ा कोई धर्म नहीं है और असंतोषी के लिए कोई धर्म नहीं है। असंतोषी व्यक्ति को कितना ही क्यों न मिल जाए उसे हर चीज कम ही लगती है और उसे लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है। इसके विपरीत संतोषी व्यक्ति अपने परिश्रम से जितना प्राप्त करता है उसे ईश्वर का प्रसाद मानकर खुशी-खुशी ग्रहण करता है। मनुष्य के भीतर संतोष भाव पैदा हो इसलिए कहा गया है कि दोनों हाथों से कमाओ और सौ हाथों से लुटाओ। हर व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह इस संसार को उतना तो अवश्य लौटा दे जितना उसने इससे लिया है। दूसरों के लिए जीया गया जीवन ही सच्चा जीवन है और यही मनुष्य के लिए सच्चा अध्यात्म भी है। कोई भी धर्म या अध्यात्म मनुष्य से बड़ा नहीं हो सकता है। इसलिए जो कुछ भी हमारे पास है, उसे हमें परोपकार में अवश्य लगाना चाहिए, क्योंकि नर की सेवा ही नारायण की सेवा है।