वे फिर रह जाते हैं तनहा। आधे-अधूरे!

नई दिल्ली/ उमाशंकर उपाध्याय- प्रतिमा चतुर्वेदी। गुमनामी के अंधेरे में इन्हें कई नामों से नवाज़ा गया। किन्नर, खुजाईन, मौसी, छक्का और न जाने किन किन नामों से इन्हें पुकारा जाता है। कुदरत नें जब इस कायनात का तसब्बुर किया तो क्या इनके लिये कोई जगह नहीं थी। लगता है इस तस्बीर में सिर्फ औरत और मर्द ही उकेरे गये।
इन्सानी जिस्म में एक ऐसी धुंधली तस्वीर भी उभर कर आई, जो न तो औरत की थी और ना ही मर्द की, एक ऐसी तस्वीर जिसे कुदरत की कूंची से निकलते रंग ने भी बदरंग कर दिया और समाज ने उसे करार दिया हिजड़ा ! यह समाज का वो हिस्सा है जिसे समाज अपना हिस्सा नहीं मानता। अनोखी साज-सज्जा, वेश-भूषा इठलाते चाल-ढ़ाल और शोख अदायें। ये सारी चीजें समाज में इन्हे एक अनोखी पहचान देते है। इनमें मर्दों सी ताक़त तो है पर ये मर्द नहीं, मां की ममता तो है पर ये मां नहीं बन सकतीं। कोख की सूनी इन हिजड़ों की आंखों में बेपनाह प्यार और उससे कहीं ज्यादा दर्द छुपा है। दिल में इस दर्द का एहसास लिये जमाने को दुआओं का जामा पहनाकर इसे ही अपनी रोजी रोटी का जरिया बना लिया। सड़को पर खाक छानते और घर घर दस्तक देते लोगों में खुशियां बांटते ये किन्नर। ढ़ोलक की थाप और ताली की गूंज के कशमकश में ही बसता है उनका संसार। इसी कशमकश भरी ज़िन्दगी में ही वे ढ़ूंढ़ते हैं अपनी जीविका। बच्चों की किलकारी, और शादी की शहनाई से सराबोर इन खुशियों के माहौल में अपनी ताली की गूंज से दुनिया को खुशियां ही खुशियां दे जाते हैं ये किन्नर, बदले में समाज इन्हें बख्शीश के रुप में देता है तिरस्कार, डांट, फटकार नोक झोंक और ना जाने कितनी ही गालियां। बेदर्द ज़माने की ठोकरों के बावजूद होठों पर मुस्कान और आंखों में उम्मीद का सपना संजोए, ये बांटते रहते हैं खुशियां ही खुशियां, ये अपनी रोज़ी तलाशते हैं दुसरो के मुस्कान में, बेगानों की महफिल में और अन्जानों की चौखट पर।

ज़माने के अफरा तफरी में इनकी सारी ख्वाहिशे चकना चूर होती गयीं और वे हूकूमत की नज़र अन्दाजगी के शिकार होते गये, सरकारें आती हैं नीतियां बनती हैं उनमें अगड़े की बातें होती है पिछड़े की बात होती हैं पर उनमें कोई नहीं जो हिजड़े की बात करता है।
फिजायें बदली हवायें बदलीं वक्त बदला पर कुछ नहीं बदला तो समाज का नज़रिया और नही बदली इनकी तक़दीर। वहीं इन हिजड़ों के साथ रह गया इक दर्द एक तनहाई और एक एहसास अधूरेपन का। लेकिन इन्होंने हार नहीं माना और अपने इस हक के लिए किन्नर बिरादरी वर्षों से लड़ाई लड़ रही थी। 1871 से पहले तक भारत में किन्नरों को ट्रांसजेंडर का अधिकार मिला हुआ था लेकिन 1871 में अंग्रेजों ने किन्नरों को क्रिमिनल ट्राइब्स यानी जरायमपेशा जनजाति की श्रेणी में डाल दिया था। बाद में आजाद हिंदुस्तान का जब नया संविधान बना तो 1951 में किन्नरों को क्रिमिनल ट्राइब्स से निकाल दिया गया और हक के लिये बदस्तूर लड़ाई जारी रही। गर हौसला हो बुलंद तो आंधियों में भी चराग जलते हैं और

एक दिन ऐसा आया जब 15 अप्रैल 2014 को आजादी के इतने सालों बाद देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति के. एस. राधाकृष्णन व न्यायमूर्ति ऐ. के. सीकरी की पीठ ने नेशनल लीगल सर्विस अथारिटी (नालसा) और किन्नरों के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था पूज्य माता नसीब कौर जी वूमेन वेलफेयर सोसाइटी और किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की याचिकाएं स्वीकार करते हुए किन्नरों को पहचान के साथ ही बराबरी का कानूनी हक देने का फैसला किया और केंद्र व राज्य सरकारों को नौ दिशा निर्देश जारी किए। सुप्रीमकोर्ट ने न सिर्फ किन्नरों को लिंग की तीसरी श्रेणी में शामिल करने का आदेश दिया बल्कि उन्हें शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और नौकरियों में आरक्षण देने का भी आदेश दिया है। कोर्ट ने किन्नरों को बराबरी का हक देते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे किन्नरों की सामाजिक और लिंगानुगत समस्याओं का निवारण करें। इतना ही नहीं उन्हें चिकित्सा सुविधा व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराएं। इतना सुनते ही किन्नरों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी मानो जैसे पंख मिल गये। किन्नरों के अधिकारों के लिए मुखर रूप से पहल करने वाली किन्नरों की नेता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बेहद ख़ुशी जाहिर की और कहा कि आज वे खुद को संपूर्ण भारतीय महसूस कर रही हैं।
हालाकि इन सबके बावजूद समाज नें तो इन्हे तन्हाईयों के कठघरे में लाकर खड़ा किया है पर इन लोगों ने ढ़ूंढ़ ली उन तनहाईयों में ज़िन्दादिली और ढ़ूढ़ लिया अपने जैसों का साथ। छोड़ दी फिक्र उन्होनें इस ज़माने की, छोड़ दी फिक्र अपने दर्द भरे अफसाने की। क्योंकि शायद उन्होने जीवन की अपनी सच्चाई को जान लिया। हालाकि मानवता भलाई कार्यों में अग्रसर डेरा सच्चा सौदा इस समुदाय के लोगों को कोर्ट के आदेश से पहले ही सुखदुआ समाज का दर्जा दे चुका था और आज भी इस समुदाय के लोगों को मुख्य धारा में जोड़ने के लिये लगातार काम कर रहा है।
गुज़रते दौर के साथ समाज के रिहाईशी ढ़ाचे में खुद को ढ़ाल लिया और अपने हिजड़े होने के दर्द को सीने में दबाये अपने इस व्यर्थ जीवन में अर्थ को ढ़ूंढ़नें की नाकाम कोशिशें करने लगे, और इन नाकाम कोशिशों में उठते हैं ढ़ेरों सवाल। सवाल उनके जमीर का, सवाल उनके वजूद का, सवाव उनकी रोज़ी-रोटी का और सवाल उनकी दुआओं का। इन सवालों के ढ़ेरों में सिमटती उनकी दुनियां.. और भी सिमट जाती है और वे फिर रह जाते हैं तनहा। आधे-अधूरे!