“वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना से सभी प्राणियों के हित, सुख, मंगल एवं कल्याण की कामना करें- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। भगवदीय स्मृति ही आनन्द, ऐश्वर्य और समाधान प्रदात्रि है। अतः अन्त:करण में भगवदीय-भाव सातत्त्यता और समस्त प्राणियों के प्रति आत्मवत भावना ही कल्याणकारक है…! शरीर से भगवान का भजन और भगवतस्वरूप जगत के प्राणियों की सेवा बने, तभी शरीर की सार्थकता है, नहीं तो शरीर नरकतुल्य है; अर्थात्, ऐसा जीना कोई सार्थक जीना नहीं है। जिसके हृदय में भगवद भाव होता है उनके नेत्रो से प्रवाह रूप से भगवद रस सदा बहता है, और ऐसे भगवदीय के सान्निध्य में आते ही जीव उस रस से भीग जाता है। भगवदीय का संग अति दुर्लभ है। केवल ग्रंथो को पान करने से ज्ञान जरूर प्राप्त होगा, पर भक्ति का उदय नहीं होगा जब तक किसी भगवदीय का संग प्राप्त नहीं होता, तब तक भगवद् भाव प्रस्फुटित नहीं होता; और, संग प्राप्त होते ही भक्ति का उदय होता है। किसी दीये से हम एक और दीया प्रज्वलित करें तो पहले दीये की ज्योत कम नहीं होती, परंतु दूसरा दीये से भी उतनी ही ज्योत प्रकट होती है, और भगवदीय भी वही है जो यह भावना रखे कि यह मेरे संग मे आया है, तो भक्ति के पंथ मे मुझसे भी आगे कैसे निकले…।

“आचार्यश्री” ने कहा खेद की बात है… मनुष्य शरीर की सेवा में, इसके लिए भोगों को जुटाने में ही दिन-रात व्यस्त रहता है…। भगवदीय प्रेमरस के तो समीप भी वह नहीं जाना चाहता…! जिसके ध्यान मात्र से प्राणों मे अमृत का झरना फूट निकलता है, उस भगवान से सदा दूर रहना चाहता है! श्रीमद्भागवत में कहा है – वह हृदय पत्थर के तुल्य है, जो भगवान के नाम-गुण-कीर्तन को सुनकर गद्गद् नहीं होता, जिसके शरीर मे रोमांच नहीं होता और आँखों में आनंद के आँसू नहीं उमड़ आते। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा कि वर्तमान में व्यक्ति अपने दु:ख से इतना दु:खी नहीं है जिनता दूसरों के सुख से है। कुछ लोग तो प्रसन्न ही तब होंगे जब दूसरा व्यक्ति दु:खी होगा। ऐसे लोग कभी भगवान के भक्त नहीं बन सकते। भगवान का भक्त तो वही हो सकता है जो दूसरों को सुखी देखकर सुख की अनुभूति करता हो और दूसरों का दु:ख देखकर स्वयं दु:खी हो जाता हो। इस प्रकार की संवेदनशीलता का नाम ही सच्चा धर्म है। दूसरों के प्रति संवेदनविहीन होना ही भक्ति धर्म से विमुख होना है। मनुष्य का सच्चा धर्म ही मानव सेवा है। अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन दूसरों के लिए जीने वाले विरले ही होते हैं। भगवान श्रीराम और महादेव शिव इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं। भगवान शिव ने सृष्टि का भला करने के लिए हलाहल विष पीया था और नीलकंठ कहलाए…।

“आचार्यश्री” ने कहा – जिस देश में हमारा जन्म हुआ, हम उस देश के ऋणी हैं। इसलिए राष्ट्र की तन, मन, धन से रक्षा करना हर प्राणी का दायित्व है। उन्होंने कहा – हमें अपनी निजी संपत्तियों की तरह राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा व संरक्षा करनी चाहिए। नाना प्रकार के मतों, पंथों, संप्रदायों में ईश्वर की पूजा, उपासना करने के तरीके अलग-अलग तो हो सकते हैं, लेकिन ईश्वर एक ही है। उदाहरण देते हुए पूज्य आचार्यश्री ने कहा – जैसे एक वृक्ष पर लदी करोड़ों पत्तियों, फूलों और फलों के आकार, प्रकार व स्वाद में भिन्न होते हैं लेकिन उसका तना व मूल जड़ एक ही होती है। ठीक उसी प्रकार देश में भिन्न-भिन्न जाति संप्रदाय होते हुए भी सबके लिए राष्ट्र रक्षा धर्म का पालन एक ही है, क्योंकि राष्ट्र की रक्षा, सबकी रक्षा है और राष्ट्र की समृद्धि सबकी समृद्धि है। जीवन को सुन्दर एवं आनंदमय बनाने के लिए प्रेम, सत्य और अहिंसा व्रत का पालन करें। सृष्टि के प्रत्येक प्राणी में प्रभु का वास है। अत: सभी से प्रेम व ईश्वरीय तत्व की अनुभूति करें। उन्होंने कहा कि प्रेम अजर अमर है। वह न जन्मता और न मरता है। सत्य धर्म का पालन और सभी से प्रेम करने पर हम प्रभु के सच्चे भक्त बन जाते हैं और ऐसे भक्तों की चर्चा प्रभु अपने से पहले करते हैं…।

“आचार्यश्री” ने कहा – सच्चाई का रास्ता इंसान को बुलंदियों पर ले जाता है, जबकि झूठ-फरेब इंसान के पतन का कारण बन जाते हैं। उत्तम कर्म करने वाला मनुष्य महान कहलाता है। जो मनुष्य अपने जीवन को दूसरों की भलाई में लगाता है वह पुण्य का हकदार बन जाता है। उन्होंने कहा कि समाज और राष्ट्र की उन्नति तभी संभव हो सकती है, जब हम बुरे कर्मों का त्याग कर अच्छे कर्म करेंगे। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए यज्ञ अपनाना होगा। यज्ञ हमारे जीवन को ही नहीं समस्त प्राणी, जीव जंतु, पेड़ पौधों तक के जीवन को स्वस्थ बनाता है। समस्त प्राणियों के लिए सद‌्चिंतन करें। “वसुधैव कुटुम्बकम …” की भावना से सभी प्राणियों के हित, सुख, मंगल एवं कल्याण की कामना करें, जिससे सबके मन का प्रदूषण दूर हो। साधना सतत, अबाध एवं नियमपूर्वक हो तो शीघ्र ही आत्मतत्व की अनुभूति होने लगती है। साधना आत्मा की यात्रा है जो प्रभु तक पहुँचने का मार्ग है। मनुष्य की योनि मिली तो है… किन्तु, जन्म-मृत्यु और जरा व्याधि से ग्रस्त इस देह का कोई भरोसा नहीं कब नष्ट हो जाय? अतः जो समय हाथ आया है उसका सदुपयोग करना हमारे ही हाथ में है और इसी में जीवन की सार्थकता भी है…!