इच्छाओं और वासनाओं की नदी शुभ और अशुभ दो मार्गों पर दौड़ती है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। सेवा साधन नहीं अपितु समस्त आध्यात्मिक साधनों की फलश्रुति है। निष्काम-सेवा भाव परमात्मा-सत्ता को द्रवीभूत-अह्लादित कर साधक के प्रति वात्सल्य, करुणा और अकारण कृपा-पात्रता जैसी दिव्य-उदात्त अवस्थाओं का निर्माण करती है। अतः अन्तःकरण में उदारता-सेवा भाव चिरस्थायी रहे ..! दूसरों के प्रति नि:स्वार्थ सेवा का भाव रखना ही जीवन में कामयाबी का मूलमंत्र है। असहायों और गरीबों की अपने हाथों से सेवा करना सच्चे धर्मों में एक है। नि:स्वार्थ भाव से की गई सेवा से किसी का भी हृदय परिवर्तन किया जा सकता है। हमें अपने आचरण में सदैव सेवा का भाव निहित रखना चाहिए, जिससे अन्य लोग भी प्रेरित होते हुए सफलता के मार्ग पर अग्रसर हो सकें। सेवारत व्यक्ति सर्वप्रथम अपने, फिर अपने सहकर्मियों व अपने सेवायोजक के प्रति ईमानदार हो। सेवा भाव ही मनुष्य के व्यक्तित्व में निखार लाता है और उसकी पहचान बनाता है। सेवाभाव हमारे लिए केवल आत्मसंतोष का वाहक ही नहीं बनता, बल्कि संपर्क में आने वाले लोगों के बीच भी अच्छाई के संदेश को स्वत: उजागर करते हुए समाज को नई दिशा व दशा देने का काम करता है। जैसे गुलाब को उपदेश देने की जरूरत नहीं होती, वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है। ठीक इसी तरह खूबसूरत लोग हमेशा दयावान नहीं होते, लेकिन दयावान लोग हमेशा खूबसूरत होते हैं, यह सर्वविदित है। सामाजिक, आर्थिक सभी रूपों में सेवा भाव की अपनी अलग-अलग महत्ता है। बिना सेवा भाव के किसी भी पुनीत कार्य को अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता। असल में सेवा भाव आपसी सद्भाव का वाहक बनता है। जब हम एक-दूसरे के प्रति सेवा भाव रखते हैं तब आपसी द्वेष की भावना स्वत: ही समाप्त हो जाती है और हम सभी मिलकर सफलता के पथ पर अग्रसर होते हैं। सेवा से बड़ा कोई परोपकार इस विश्व में नहीं है, जिसे मानव सहजता से अपने जीवन में अंगीकार कर सकता है। प्रारंभिक शिक्षा से लेकर हमारे अंतिम सेवा काल तक सेवा ही एक मात्र ऐसा आभूषण है, जो हमारे जीवन को सार्थक सिद्ध करने में अहम भूमिका निभाता है। बिना सेवा भाव विकसित किए मनुष्य जीवन को सफल नहीं बना सकता। अतःकग हम सभी को चाहिए कि सेवा के इस महत्व को समझें व दूसरों को भी इस ओर जागरूक करने की पहल करें …।

“आचार्यश्री” ने कहा – अध्यात्म का मुख्य उद्देश्य है – आत्मा का विस्तार करना। आत्मा के विस्तार का अर्थ है -संपूर्ण प्राणियों को भगवान का प्रतिरूप मानकर उनके साथ स्नेह सौजन्य और ममता भरा हितकारी व्यवहार करना तथा प्राणिमात्र की सेवा में स्वयं को विस्मृत कर देना। वस्तुतः जितने भी जप-तप, संयम-साधन, अनुष्ठान आदि किये जाते हैं उनका मुख्य उद्देश्य भी यही है कि आत्म विस्तार किया जाये। माला फिराने की क्रिया मात्र से आध्यात्मिक प्रगति कदापि संभव नहीं। जिस प्रकार किसी सीढ़ी पर चढ़ने के लिए क्रमशः पहली, दूसरी सीढ़ी चढ़कर ही सबसे ऊँचे सोपान पर पहुँचा जा सकता है। उसी प्रकार अध्यात्म की सर्वोच्च सीढ़ी पर पहुँचने के लिए जप-तप तो प्रथम सीढ़ी केवल साधन मात्र है। जप का प्रारंभिक उद्देश्य भगवान के चरणों में चंचल मन को एकाग्र करना है। पूजा-पाठ तो आध्यात्मिक प्रगति के लिए एक आँशिक प्रयत्न मात्र है। आध्यात्मिक उन्नति की कसौटी है – इंद्रिय-संयम तथा मनोनिग्रह। जिस प्रकार किसी रथ में दस घोड़े हों और वे सभी दस विभिन्न दिशाओं की और दौड़ने लगें तो रथ नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा, उसी प्रकार ये दस इंद्रिय रूपी घोड़े यदि अपने-अपने विषयों की और दौड़ने लगे तो आध्यात्मिक उन्नति का रथ भी चरमरा कर टूट जाएगा। इसलिए उन्नत बनने के लिये इंद्रियों पर संयम रखना अत्यंत आवश्यक है। इच्छाओं और वासनाओं की नदी शुभ और अशुभ दो मार्गों पर दौड़ती है। हम सभी का यह पुनीत मानवोचित कर्तव्य है कि उसे प्रयत्न पूर्वक शुभ तथा लोकोपकारी मार्ग पर ही प्रवाहमान होने दें। अपने वैयक्तिक स्वार्थ और वासनाओं को गौण बनाकर, उनमें शक्तिक्षय न कर सामाजिक अभ्युदय के लिए शक्ति, प्रतिभा और श्रम नियोजित करें। जब सुंदरता, कुरूपता के प्रति कोई आकर्षण न रहे, रूखे-सूखे भोजन या षट् रस व्यंजन दोनों में समानता लगे, कटु वचन सुनकर भी क्रोध न आये, बड़े से बड़े प्रलोभन में भी लाभ न हो, हानि-लाभ से मन विचलित न हो, असफल होने पर भी निराशा न हो तब समझना चाहिए कि मन और इंद्रियाँ वश में हो गये हैं। आत्म-विकास के लिए राग-द्वेष, मोह-मत्सर, काम-क्रोध, लोभ, अहंकार आदि का त्याग परम आवश्यक है। इन मनोविकारों पर जब तक नियंत्रण न किया जायेगा, तब तक न तो आत्मशक्ति ही मिलेगी और न ही पूजा-उपासना फलवती होगी। अतः मनोविकारों पर विजय प्राप्त करने का सरल तथा सही उपाय ही है कि हम जनसेवा का भाव लेकर कार्यक्षेत्र में उतर पड़े। समाज में सक्रिय रूप से कार्य करते समय सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ क्रोध-द्वेष आदि के अनेकों अवसर आयेंगे साथ ही अनेकानेक कठिनाइयों और प्रतिकूल परिस्थितियों में से होकर गुजरना होगा। ये अवसर ही यह मापदण्ड हैं जिनसे मनुष्य की परख होती है। क्रोध, लोभ, मोह आदि की परिस्थितियाँ आने पर भी ये मनोविकार मन को व्यग्र न बनायें, तभी समझना चाहिए कि सच्चे अर्थों में हम संयमी बन गये हैं। मनोविकारों को जीत कर जैसे-तैसे मनुष्य जनसेवा की ओर बढ़ता है, उसके गुण-कर्म और स्वभाव का परिष्कार होता जाता है तथा आचार-विचार निर्मल बनाते जाते हैं। आचार-विचार पवित्र हो जाने से आत्म-विकास तथा आत्म-विस्तार स्वतः ही हो जाता है और तब समस्त समाज, राष्ट्र और विश्व उसका अपना परिवार बन जाता है तथा साधक सच्चिदानंद परमात्मा की उपलब्धि कर लेता है। इस प्रकार जनसेवा के मंगलमय मार्ग का अवलंबन करने से स्वार्थ तथा परमार्थ दोनों की साधना पूरी हो जाती है …।