प्रत्येक जीव के लिए आहार, ऊर्जा, प्राण और जीवन-अस्तित्व की आधारभूत सत्ता – अवधेशानंद गिरी जी महाराज

अम्बाला/ असित अवस्थी। परमात्मा स्वभावतः पारमार्थिक सत्ता है, जो प्रकृति और दैव सत्ता के रूप में साकार है और अग्नि, जल, अम्बर, नक्षत्र, निहारिकाएँ आदि विविध स्वरूपों में वह पारमार्थिक कार्यों में ही संलग्न है। अतः प्रकृति के सेवा भाव का अनुसरण करें और सेवा व्रती बनें ! संसार में सबसे दुर्लभ है – मनुष्यता प्राप्त होना। सारी योनियां भोगने के बाद हमें मानव जीवन प्राप्त हुआ है। यदि हम इस जीवन में भी परमार्थ के कार्य नहीं करते हैं तो यह जीवन भी हमारे लिए व्यर्थ है। मनुष्यता और प्रकृति का संरक्षण मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म होता है। जाति-धर्म से ऊपर उठकर पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छता के लिए आगे आना होगा। भेदभाव से दूर रहकर प्रकृति व मानवता की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है। प्रकृति के साथ जुड़कर वृक्षारोपण, जलसंग्रहण जैसे कार्य को समरसता के भाव से करना भी श्रेष्ठ धर्म कार्य है। प्रकृति के बीच रहकर प्रकृति की सेवा करने से हमारा जीवन सुधर सकता है। हमें वृक्षों के साथ ही पशु-पक्षियों का भी सरंक्षण करना चाहिए। वृक्षों से हमें वायु प्राप्त होती है। साथ ही गौ-पूजा से हमारे दु:ख दूर होते हैं। अतः भेदभाव से दूर रहकर प्रकृति व मानवता की सेवा करें, इसी में जीवन की सार्थकता निहित हैं …।

आचार्यश्री ने कहा  कि प्रकृति जैव-जगत आश्रय-प्रदात्री है और प्रत्येक जीव के लिए आहार, ऊर्जा, प्राण और जीवन-अस्तित्व की आधारभूत सत्ता है। प्राचीन समय से ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती हमारी भारतीय परम्पराएं प्रकृति संरक्षण का कोई संस्कार अखण्ड भारतभूमि को छोड़कर अन्यत्र देखने में नहीं आता है। जबकि सनातन परम्पराओं में प्रकृति संरक्षण के सूत्र उपस्थित हैं। हिन्दू धर्म में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के रूप में मान्यता है। भारत में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो नदी को मांं स्वरूप माना गया है। ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं। प्राचीन समय से ही भारत के वैज्ञानिक एवं ऋषि-मुनियों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। वे जानते थे कि मानव अपने क्षणिक लाभ के लिए कई अवसरों पर गंभीर भूल कर सकता है। इसलिए उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंध विकसित कर दिए, ताकि मनुष्य को प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण संस्कार है। हिन्दू परंपराओं ने कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण किया है। हिन्दू धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है …।

आचार्यश्री  ने कहा कि हिंदुत्व वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। प्रत्येक हिन्दू परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। इन रहस्यों को प्रकट करने का कार्य होना चाहिए। हिन्दू धर्म के संबंध में एक बात दुनिया मानती है कि हिन्दू दर्शन ‘जीयो और जीने दो’ के सिद्धांत पर आधारित है। हिन्दू धर्म का सह-अस्तित्व का सिद्धांत ही हिन्दुओं को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। वैदिक वाङ्मयों में प्रकृति के प्रत्येक अवयव के संरक्षण और संवर्धन के निर्देश मिलते हैं। हमारे ऋषि-मुनि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है – “वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव: … ” अर्थात्, वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं – “अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु …’। यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का संवर्धन हुआ है। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है। घर में तुलसी का पौधा लगाने का आग्रह भी हिन्दू संस्कृति में क्यों है? यह आज सिद्ध हो गया है। तुलसी का पौधा मनुष्य को सबसे अधिक प्राणवायु ऑक्सीजन देता है। तुलसी के पौधे में अनेक औषधीय गुण विद्यमान हैं। पीपल को देवता मानकर भी उसकी पूजा नियमित इसीलिए की जाती है, क्योंकि वह भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देता है। परिवार की सामान्य गृहणियाँ भी अपने अबोध बच्चे को समझाती है कि रात में पेड़-पौधे को छूना नहीं चाहिए, वे सो जाते हैं, उन्हें परेशान करना अच्छी बात नहीं …।

आचार्यश्री  ने कहा कि हमारे ऋषि-महर्षियों ने जीव-जन्तुओं के महत्व को पहचानकर उनकी देवरूप में अर्चना की है। मनुष्य और पशु परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। हिन्दू धर्म में गाय, श्वान, बिल्ली, चूहा, हाथी, शेर और यहां तक की विषधर नाग को भी पूजनीय बताया है। प्रत्येक हिन्दू परिवार में पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकाली जाती है। चींटियों को भी बहुत से हिन्दू आटा डालते हैं। चिडिय़ों और कौओं के लिए घर की मुंडेर पर दाना-पानी रखा जाता है। पितृपक्ष में तो काक को विशेष निमंत्रित करके दाना-पानी खिलाया जाता है। इन सभी परम्पराओं के पीछे जीव-संरक्षण का संदेश है। हिन्दू गाय को माँ कहते हैं और उसकी अर्चना करते हैं। नागपंचमी के दिन नागदेव की पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म का वैशिष्ट्य है कि वह प्रकृति के संरक्षण की परम्परा का जन्मदाता है। हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। हिन्दू धर्म के जितने भी पर्व-त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्रि, गुड़ी पड़वा, वट पूर्णिमा, ओणम्, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव प्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा आदि सभी पर्वों में प्रकृति संरक्षण का दिव्य सन्देश एवं उनका पुण्य स्मरण है …।