देश भर में मनाया जा रहा है ईद-उल-अजहा, पीएम मोदी ने दी बधाई।

लखनऊ/ बुशरा असलम। पूरे देश में ईद-उल-जुहा यानी बकरीद मनाई जा रही है। इस दिन कुर्बानी देने की मान्यता है। जो लोग बकरा या अन्य जानवर खरीद सकते हैं वह कुर्बानी देते हैं और एक दूसरे को दावत देकर ईद-उल-अजहा की बधाई देते हैं। दरअसल कुर्बानी का असली मतलब यहां ऐसे बलिदान से है जो दूसरों के लिए दिया गया हो। परन्तु इस त्यौहार के दिन जानवरों की कुर्बानी महज एक प्रतीक है। असल कुर्बानी हर एक मुस्लिम को अल्लाह के लिए जीवन भर करनी होती है।

इस मौके पर पीएम मोदी ने ट्वीट करके देश वासियों को बधाई दी ईद-उल-अजहा की बधाई, हमारे समाज में सद्भाव, भाईचारे और एकजुटता की भावना बनी रहे.

 

“ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष कल्बे सादिक ने कहा कि बकरीद यानि ईद-उल-अजहा खुदा के आदेशों को पालन करने और किसी भी परिस्थिती में अच्छाई के मार्ग पर चलते रहने का सन्देश देती है।”

 

“ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष मौलाना उमेर इल्यासी ने बताया कि ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी का असल मतलब यहां ऐसे बलिदान से है जो दूसरों के लिए दिया गया हो।”

 

“अमेरिकन एम्बेसी में कार्यरत जिय़ाउल्ला सिद्दीकी ने बताया कि ईद-उल-अजहा हमें सत्य के लिए जान और माल कुर्बान करने की शिक्षा देता है।”

 

“दरगाह दादा मियां के सज्जादा नसीन सबाहत हसन शाह ने कहा कि ईद-उल-अजहा का त्यौहार हमें धैर्य और खुदा के बताए मार्ग पर चलने का संदेश देता है। क्योंकि खुदा हमारे चेहरों को नहीं बल्कि हमारे दिलों को देखता है है।”

क्यों मनाया जाता है ईद-उल-अजहा
एक बार इब्राहीम अलैय सलाम नामक एक व्यक्ति थे, जिन्हें ख्वाब (सपने) में अल्लाह का हुक्म हुआ कि वे अपने प्यारे बेटे इस्माइल जो बाद में पैगंबर हुए, को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। यह इब्राहीम अलैय सलाम के लिए एक इम्तिहान था, जिसमें एक तरफ थी अपने बेटे से मुहब्बत और एक तरफ था अल्लाह का हुक्म।लेकिन अल्लाह का हुक्म ठुकराना अपने धर्म की तौहीन करने के समान था, जो इब्राहीम अलैय सलाम को कभी भी कुबूल ना था। इसलिए उन्होंने सिर्फ अल्लाह के हुक्म को पूरा करने का निर्णय बनाया और अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए।लेकिन अल्लाह भी रहीमो करीम है और वह अपने बंदे के दिल के हाल को बाखूबी जानता है। उसने स्वयं ऐसा रास्ता खोज निकाला था जिससे उसके बंदे को दर्द ना हो। जैसे ही इब्राहीम अलैय सलाम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे, वैसे ही फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन ने तेजी से इस्माईल अलैय सलाम को छुरी के नीचे से हटाकर उनकी जगह एक मेमने को रख दिया।फिर क्या, इस तरह इब्राहीम अलैय सलाम के हाथों मेमने के जिबह होने के साथ पहली कुर्बानी हुई। इसलिए तभी से इस त्यौहार पर अल्लाह के नाम पर एक जानवर की कुर्बानी दी जाती है। लेकिन ना केवल इस कहानी के आधार पर, वरन् ऐसी कई मान्यताएं हैं जो एक जानवर को कुर्बानी देने के लिए उत्सुक करती हैं। इस्लाम में कुर्बानी का अर्थ ही ऐसा है जो पाक है।दरअसल इस्लाम, क़ौम से जीवन के हर क्षेत्र में कुर्बानी मांगता है। इस्लाम के प्रसार में धन व जीवन की कुर्बानी, नरम बिस्तर छोड़कर कड़कड़ाती ठंड या जबर्दस्त गर्मी में बेसहारा लोगों की सेवा के लिए जान की कुर्बानी भी खास मायने रखती है।

कुर्बानी के नियम और कानून
कुर्बानी के लिए खासतौर पर जानवरों का चयन किया जाता है। बकरा या फिर ऊंट कुर्बान किए जा सकते हैं लेकिन वह किस रूप एवं अवस्था में हों, यह जान लेना बेहद जरूरी होता है। इसके भी कई नियम एवं कानून हैं, जिनका उल्लंघन करना आल्लाह के नियमों की तौहीन करने के समान है। वह पशु कुर्बान नहीं किया जा सकता जिसमें कोई शारीरिक बीमारी या भैंगापन हो, सींग या कान का अधिकतर भाग टूटा हो या जो शारीरिक तौर से बिल्कुल दुबला-पतला हो। बहुत छोटे पशु की भी बलि नहीं दी जा सकती। कम-से-कम उसे दो दांत (एक साल) या चार दांत (डेढ़ साल) का होना चाहिए। कब कुर्बानी दी जाए इसके लिए भी कड़े कानून हैं, जैसे कि कुर्बानी ईद की नमाज के बाद की जाती है, इससे पहले कुर्बानी देने का कोई अर्थ नहीं है। तथा कुर्बानी के बाद मांस के तीन हिस्से होते हैं। एक खुद के इस्तेमाल के लिए, दूसरा गरीबों के लिए और तीसरा संबंधियों के लिए। वैसे, कुछ लोग सभी हिस्से गरीबों में बांट देते हैं।