एक समय में एक कार्य हाथ में लेने से लक्ष्य के निकट अति शीघ्र पहुंचेंगे- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

नई दिल्ली। जीवन का प्रत्येक पल शुभता, दिव्यता और भगवदीय अनुग्रह से ओतप्रोत है। उत्साही, विवेकी, श्रद्धा संपन्न और भगवद-कृपा आश्रित साधक के लिये काल की हर अवस्था उत्थानकारक है। हर क्षण, हर पल एक भागवत मुहूर्त है। इस मुहूर्त में जो भी किया जाएगा वह शुभ ही होगा। अशुभ से बचें और जो भी शुभ है वह इसी क्षण, इसी पल पूरा करने का प्रयास करें। अब तक जो जीवन मिला है उस के लिए भगवान के प्रति कृतज्ञ रहें और किसी का जो भी ऋण है उससे उऋण हो जाएँ। अन्यथा फिर पता नहीं कब अवसर मिले या न मिले। प्रत्येक दिन प्रभु कृपा से मिला एक वरदान है। कल का क्या भरोसा? कल आये या ना आये, कुछ कह नहीं सकते। जीवन में जो भी शुभ कार्य करने योग्य है वह आज ही, इसी पल जितना हो सकता है उतना पूरा कर लें। हर एक दिन को, हर एक पल को एक जीवन के बराबर जीयें। क्या पता जो साँस हम छोड़ रहे हैं वह आखिरी साँस हो, फिर आये ही ना? यह कोई नकारात्मक बात नहीं, अपितु एक वास्तविकता है, सच्चाई है। अतः हर पल को जीयें, भरपूर जीयें और जीवन के साथ बहें। समय को अपनी इच्छा-शक्ति एवं परिश्रम से अपने वश में लाना होता है, तभी वह शुभ बनता है। अतः एक समय में एक कार्य हाथ में लेने से लक्ष्य के निकट अति शीघ्र पहुंचेंगे…।

आचार्यश्री ने कहा – जीवन का हर प्रभात एक सच्चे मित्र की तरह नित्य अभिनव उपहार लेकर आता है। वह चाहता है कि आप वे उपहार ग्रहण करें और उनसे अपने उस शुभ दिन का श्रृंगार करें। आज का दिन हमारे अब तक के जीवन का सबसे सर्वश्रेष्ठ दिन है। आज के दिन हम परमात्मा का ध्यान बीते हुए कल की अपेक्षा अधिक गहराई से व अधिक समय तक के लिए करेंगे। कल का दिन इससे भी शुभ और अच्छा होगा। आने वाला हर दिन पिछले विगत दिन से अच्छा होगा। शुभकार्य परमार्थ कार्यो से जीवन में हर संकल्प पूर्ण होता है। जीवन एक कृतज्ञता है, प्रभु के प्रति कृतज्ञता। कृतघ्नता सबसे बड़ा पाप है। कृतघ्नता यानी किसी के द्वारा किये गए उपकार को नही मानना। मुझे क्या मिलेगा यह कभी ना सोचें, पर मेरे हर क्षण से समष्टि को क्या मिलेगा, बस यही महत्वपूर्ण है। ईश्वर की स्मृति हर-पल बनी रहे, उसके उपकरण बने रहने में ही जीवन की सार्थकता है…।

आचार्यश्री ने कहा – ईश्वर मनुष्य को एक साथ इकठ्ठा जीवन न देकर क्षणों के रूप में देता है। एक नया क्षण देने के पूर्व वह पुराना क्षण वापिस ले लेता है। अतएव, मिले हुए प्रत्येक क्षण का ठीक-ठीक सदुपयोग करें, जिससे आपको नित्य नए क्षण मिलते रहें। पास ही क्षितिज तट पर लक्ष्य जगमगा रहा है, किन्तु उसको हम स्पष्ट नहीं देख पाते, क्योंकि उस पर हमारी कमजोरियों के बादल छाये हुए हैं। सफल होने के लिए हमें सफलता के बारे में ही सोचना चाहिए। मन में विश्वास बैठा लेना चाहिए कि हम सफलता के लिए ही पैदा हुए हैं और सफलता प्राप्त करके ही रहेंगे। मनमस्तिष्क में जैसा हम सोच लेते हैं, वैसे ही हम बन जाते हैं। सफलता प्राप्त करने के लिए हमें हरपल सकारात्मक सोचना चाहिए। स्वयं को महत्व देते हुए मूल्यवान समझना चाहिए। इस तरह का विश्वास करने वालों को ही सफलता मिलती है। सफल लोगों में ही आत्मविश्वास व आत्मसम्मान होता है, जो उन्हें अपने भीतर की शक्तियों का आभास कराता है। संत तुलसीदास जी कहते हैं – ‘बिनु विश्वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम। राम कृपा बिनु सपनेहुं, जीव न लह विश्राम…॥ यदि व्यक्ति का ईश्वर पर विश्वास ही नहीं है, या वह मानता है कि कोई कृपा करने वाला नहीं है तो उसके ऊपर ईश्वर कैसे कृपा करेंगे? और, जब कृपा ही नहीं होगी तो दु:ख रूपी संसार में उसे सुख-शांति नहीं प्राप्त होगी। कठोपनिषद् के अनुसार ‘अस्ति इति उपलब्धव्य:’ अर्थात, परमात्मा है, पहले ऐसा विश्वास करके तब उसे पाने के प्रयत्न शुरू करने चाहिए। विश्वास ईश्वर द्वारा दिया गया एक वरदान है। इसे विकसित करने के लिए प्रार्थनामय जीवन, त्याग-तपस्या और परोपकार के कार्यो को करना आवश्यक है। इतना ही नहीं, बिना किसी शर्त के प्रभु मे विश्वास करने की घोषणा करते हुए आध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त करें। शांति, कृपा और आनंद उस विश्वास की घोषणा का ही फल है। इस शुभ अवसर को हम दैनिक व्यवस्था और विभिन्न चिंताओं के कारण न गंवाएं। अतः अपनी निगाहें और अपना हृदय उस दयालु प्रभु की ओर ऊपर उठाएं। फिर वह हमें अपनी महिमा के सहभागी अवश्य बनाएंगे, ऐसा विश्वास है …।