आज भी युवाओं के प्रेरणा श्रोत हैं स्वामी विवेकानंद सरस्वती

नई दिल्ली/ बुशरा असलम। “उठो, जागो और लक्ष्य पाने तक मत रूको।” करीब डेढ़ सौ साल पहले लिखा स्वामी विवेकानंद का ब्रह्म वाक्य आज युवाओं को आगे बढ़ने का हौसला देने के लिए काफी है। एक जमाने से कोई व्यक्तित्व, जो डेढ़ सौ साल बाद भी युवाओं की ताकत है, युवाओं का आदर्श है। उस व्यक्ति के कहे अनमोल वचन आज भी युवाओं में जोश भरने का काम करते हैं। उन पर लिखे साहित्य का एक-एक शब्द जोश और हिम्मत का पर्याय है। वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि युवाओं का प्रेरणाश्रोत स्वामी विवेकानंद सरस्वती हैं। उनका नाम जेहन में आते ही एक ऐसी ऊर्जा का संचरण होता है जो अक्षय होती है जिसका कभी नाश नहीं होता। उनके शब्द आज भी अनादिक और आनंदित वाणी के रूप में गूंजायमान होते हैं जिनमें सत्य के साथ साक्षात्कार करने की अनंत ऊर्जा समाहित है।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि “यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढिए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं। उनके अनमोल वचन और बोध कथाएं हर किसी को राष्ट्रहित के लिए कुछ कर गुजरने और खुद का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए प्रेरित करती हैं। उनका साहित्य सकारात्मकता सोच बढ़ाने का सबसे बड़ा स्रोत है।
परमार्थ निकेतन के परमाध्क्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती जी महाराज बताते हैं कि वे एक बेहतर कम्युनिकेटर, प्रबंधन गुरू, आध्यात्मिक गुरू, वेदांतों का भाष्य करने वाला संन्यासी, धार्मिकता और आधुनिकता को साधने वाला साधक, अंतिम व्यक्ति की पीड़ा और उसके संघर्षों में उसके साथ खड़ा सेवक, देशप्रेमी, कुशल संगठनकर्ता, लेखक-संपादक, आदर्श शिष्य जैसी न जाने कितनी छवियां स्वामी विवेकानंद से जुड़ी हैं। हर छवि में वे अव्वल नजर आते हैं। देश का नौजवान आज भी उन्हें अपना हीरो मानता है। कोई डेढ़ सौ साल से भी पहले कोलकाता में जन्मे विवेकानंद और उनके विचार अगर आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं तो समय के पार देखने की उनकी क्षमता को महसूस कीजिए, उनके भावों में बहकर देखिए।
दरअसल स्वामी विवेकानंद सरस्वती ने सिर्फ 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन के छोटे से जीवन में दुनिया भर में आध्यात्म का ऐसा परचम लहराया जो अगले कई सदियों तक अक्षुण्ण रहेगा। उन्होंने आत्मा और परमात्मा की प्रकृति को बहुत सीधे शब्दों में समझाने की कोशिश की और कहा – ‘हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है। किसी के सामने सिर मत झुकाना तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।’
स्वामी विवेकानंद सरस्वती ने भारतवासियों के मन में भारत की गौरवशाली परंपरा और संस्कृति के प्रति आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का संचार किया। आजादी की लड़ाई में स्वामी विवेकानंद के योगदान को कोई कैसे भूल सकता है। विवेकानंद का जीवन बताता है कि कैसे बिना किसी साधन और सुविधा के सिर्फ एक संकल्प के बल पर युवा समाज की देश की सोच बदल सकते हैं।
आज से 152 साल पहले हमारे देश में एक ऐसे सन्यासी ने जन्म लिया था जिसने समूची दुनिया को भारत के प्राचीन ज्ञान की रौशनी से जगमग कर दिया। 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता में हुआ था। डेढ़ सौ साल में वक्त बदल गया, विरासत और सियासत बदल गई। एक गुलाम मुल्क, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गया लेकिन कुछ नहीं बदला।

हिंदुस्तानी संस्कृति की वो तासीर, वसुधैव कुटुम्बकम की वो अलख जो 122 साल पहले नरेन्द्र की आवाजों से जली थी और आज भी नरेंद्र के अल्फाजों में जिंदा है। स्वामी विवेकानंद की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मैं उन्हें नमन करता हूं, वो मेरी प्रेरणा हैं। धर्म संसद में भाषण से पहले स्वामी विवेकानंद सिर्फ नरेंद्र थे जो बहुत मुश्किलों का सामना करते हुए जापान, चीन और कनाडा की यात्रा कर अमेरिका पहुंचे थे। उनको तो धर्म संसद में बोलने का मौका भी नहीं दिया जा रहा था लेकिन जब उन्होंने अमेरिका के भाइयों और बहनों के संबोधन से भाषण शुरू किया तो पूरे दो मिनट तक आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो में तालियां बजती रहीं। इसके बाद धर्म संसद सम्मोहित होकर स्वामी जी को सुनती रही। अमेरिकी मीडिया ने उन्हें भारत से आया ‘तूफानी संन्यासी’ ‘दैवीय वक्ता’ और ‘पश्चिमी दुनिया के लिए भारतीय ज्ञान का दूत’ जैसे शब्दों से सम्मान दिया। अमेरिका पर स्वामी विवेकानंद ने जो असर छोड़ा वो आज भी कायम है। इसीलिए, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जब भारतीय संसद को संबोधित किया तो स्वामी विवेकानंद का संदेश उनकी जुबान पर भी था।
हिंदू धर्म के प्रतीक के रूप में गेरुए कपड़े से अमेरिका का पहला परिचय स्वामी विवेकानंद ने ही कराया था। उनके भाषण ने अमेरिका पर ऐसा असर छोड़ा कि गेरुए कपड़े अमेरिकी फैशन में शुमार किए जाने लगे। शिकागो-भाषण से ही दुनिया ने ये जाना कि भारत गरीब देश जरूर है लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान में वो बहुत अमीर है। 121 साल पहले दुनिया के धर्मों पर हुई विश्व संसद में दिए गए स्वामी विवेकानंद के भाषण ने भारत के बारे में अमेरिका ही नहीं समूची दुनिया की सोच को बदल दिया।