क्षुद्र अहंता को विराटता में समर्पण करने वाले ही आत्मा की सर्वोच्च पदवी परमात्मा को प्राप्त करते हैं- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

अम्बाला। विनय, कृतज्ञता, समर्पण और परदोष दर्शन का अभाव परमात्म-प्रसन्नता के अचूक साधन हैं…! आनंदमय जीवन और सुखमय जीवन के लिए हमें अपने अंदर कुछ दैवीय गुणों को विकसित करने की आवश्यकता होती है। गीता में श्रीकृष्ण जी ने भी इन गुणों का बहुत अच्छी तरह से उल्लेख किया है। सबसे पहले किसी भी इंसान का विनम्र होना बहुत मायने रखता है। विनम्र होना आप में एक बहुत महत्वपूर्ण दैवीय गुण है। अगर आप किसी के साथ नम्र तरीके से पेश आते हैं तो सामने वाला कितना भी बुरा क्यों न हो आपका कभी अहित नहीं सोचेगा और उसके अंदर आपके प्रति एक विशेष तरह का आदर भाव उत्पन्न होगा। विनम्रता सज्जन व्यक्तियों का आभूषण होता है। विनम्रता मनुष्य में विनय के द्वारा प्रदर्शित होती है। श्रीरामचरित मानस में जब श्रीराम जी को सागर पार लंका जाने की आवश्यकता हुई तो उन्होंने विनम्रता पूर्वक सागर से तीन दिनों तक रास्ता मांगने के लिए विनय किया। हालाँकि उनके अनुज श्रीलक्ष्मण जी उनकी इस बात से सहमत नहीं थे, फिर भी प्रभु श्रीरामचंद्र जी ने यहाँ पर विनय का मार्ग अपनाया। वैसे तो भगवान श्रीराम बिना विनय के भी सागर पार करने में समर्थ थे, जिनके एक भृकुटी घुमाने भर से अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्डों का संहार हो जाता है। उन प्रभु श्रीराम जी को सागर के समक्ष विनय की क्या आवश्यकता? लेकिन भगवान ने मानव रूप में स्वयं विनय करके हम सभी को यह सन्देश दिया है कि जीवन में कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो हमें विनम्रता युक्त स्वाभाव कभी नहीं छोड़ना चाहिए…।

“आचार्यश्री” ने कहा – ज्ञान प्राप्ति सदा ही समर्पण से होती है। सरल शब्दों में समर्पण का अर्थ है – अपने आपको मन व बुद्धि से पूर्णरूपेण किसी ऐसे ईष्ट को नि:स्वार्थपूर्वक सौंप देना, जिस पर पूर्ण श्रद्धा व विश्वास हो; अथवा, बिना किसी तर्क व संदेह किए, बिना किसी भी उपयोग हेतु ज्यों का त्यों स्वयं को किसी के समर्पित कर देना। समर्पण में संदेह व तर्क की कोई गुंजाइश नहीं होती। जिसका समर्पण किया जाता है, यदि उस पर किसी भी प्रकार का संदेह व स्वार्थ है तो वहां समर्पण नहीं होता, बल्कि वह केवल नाम मात्र का दिखावा है, जो सच्चे समर्पण से कोसों दूर होता है। समर्पण में छल-छिद्र व कपट का कोई स्थान नहीं होता। श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने जैसे संकेत भी दिया है कि भगवान को छलिया, छिद्रान्वेषी बिलकुल भी पसंद नहीं हैं, क्योंकि ये विकार समर्पण में बाधक हैं। समर्पण ठीक वैसे ही है, जैसे एक कन्या विवाह के बाद अपने पति के प्रति समर्पित हो जाती है। माता-पिता का मोह छोड़कर वह अपना सब कुछ पति को ही मानती है। क्षुद्र अहंता को विराटता में समर्पण करने वाले ही आत्मा की सर्वोच्च पदवी परमात्मा को प्राप्त करते हैं। जिस किसी ने भी अपनी मनःस्थिति और गतिविधियां इस स्तर की बना ली, उन्हें निरन्तर सच्चिदानन्द रूप परब्रह्म की निकटता का दिव्य दर्शन होता है और देवताओं के समान अनिर्वचनीय संतोष, आनंद और उल्लास सतत् अनुभव होता रहता है। परमात्मा सबके परम श्रद्धेय हैं। इसलिए परमात्मा के प्रति समर्पण से परम सुख मिलता है, शांति का संचार होता है और जीवन सुखी तथा आनंदमय बनता है। अत: मनुष्य को परम श्रद्धेय परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पित होकर अपने जीवन को सरस तथा मधुर बनाने का पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए, जो मनुष्य को पूर्णता की ओर ले जाता है…।