“शीष दिए यदि गुरु मिलें तो भी सस्ता जान” सुधाशु जी महाराज

नई दिल्ली। गुरुभक्ति बड़ी अनोखी और अनूठी चीज़ है। इसमें शिष्य को गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण करना होता है। चूँकि गुरु तपशक्ति से परिपूर्ण और सक्षम होते हैं, अतः उनसे मिलना लघु का विभु से मिलने जैसा है, तुच्छ का महान में विलय होने के समान है। जिसने गुरु को पा लिया, उसने सब कुछ पा लिया। हाँ! यह सदैव ध्यान रहे कि गुरु कोई व्यक्ति नहीं, वरन् एक शक्ति होते हैं। उनकी कोई सीमा नहीं होती बल्कि वे असीम हैं, क्योंकि वह परमात्मा के साक्षात् व स्थूल प्रतिनिधि हैं।

गुरुतत्व पर विचार करते समय जिन बातों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी होता है, उसमें पहला शब्द है ’’भक्तोऽसि’’…। गीतानायक श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम मेरे भक्त हो। भक्त बनना बहुत जरूरी है। भक्त बनने का मतलब है कि उसकी सेवा में तत्पर हो। अगर अपने रब को, अपने मालिक को अपना बनाने की इच्छा है, तो उसके रंग में रंगना पड़ेगा। जब तक आप भक्ति के रंग में पूरी तरह से रंगेगे नहीं, तब तक वहाँ से जो कुछ प्रवाहित हो रहा है, वह प्राप्त नहीं होगा। अपने आपको एक बार अर्पित करना ही पड़ेगा।

यही बात गुरुसत्ता के साथ लागू होती है। ध्यान रखिये कि यह शीष देने वाली बात है, जिसके बारे में सन्त कबीर ने कहा है- “शीश दिये यदि गुरु मिलें तो भी सस्ता जान।” अगर शीष (सिर) देने से सदगुरु मिल जायें तो भी इसे सस्ता समझना। सस्ता समझने से मतलब है कि आसान मामला हो गया। शीष देने का मतलब क्या होता है- पूर्ण समर्पण कर देना। फिर आगे कुछ बचा ही नहीं, अपनी गरदन उठाकर चढ़ा दी।शीष दिये का मतलब खोपड़ी देना नहीं है बल्कि अपना सर्वस्व न्योछावर कर देना है।

इसके बाद गुरुदेव अपने शिष्य को बहुत कुछ देते हैं। वह उसे भक्ति देते हैं, शक्ति देते हैं, ज्ञान देते हैं, ईमान देते हैं, चरित्र देते हैं, समझ देते हैं, समर्पण देते हैं, हृदय की अनुपम विशालता देते हैं, उसे परपीड़ा के निवारण की क्षमता देते हैं और उसे अपना जैसा बना लेते हैं। तब शिष्य लाखों में एक बन जाता है और वेषक़ीमती बन जाता है, ठीक उसी तरह, जैसे पारस के सम्पर्क में आने पर लोहा सोना बन जाता है। इतना होने पर धन और ऐश्वर्य, जिसके पीछे दीवाना होकर व्यक्ति भाँति-भाँति के कर्म-कुकर्म करता है, उस शिष्य के, उस भक्त के पीछे दौड़ता है। कारण, उसे लक्ष्मी का सदुपयोग करना आ जाता है। इसलिए तुम सद्शिष्य बनना, तुम्हें सद्गुरु अवश्य मिलेंगे।

लेखक विश्व जागृति मिशन के संस्थापक हैं।