“आपके मन के भावों को जानवर तक समझ जाते हैं, अंतर्मन को स्वच्छ बनाइए”- सुधांशु जी महाराज

नई दिल्ली। देखिए! आप अपने मन के भावों को छुपा तो सकते हैं, लेकिन यदि आप यह मान लें कि सामने वाला कुछ समझ नहीं पा रहा है और वह अनजान है, तो आप ग़लती पर हैं, आप ख़ुद अनजान हैं। मनुष्य तो छोड़िए, पशु-पक्षी तक इसे समझते हैं, वे आपके मन के भाव पकड़ लेते हैं और उसी अनुसार आपके साथ व्यवहार करते हैं।

कुत्ते को आप रोटी डालिये, सही नीयत से डालेंगे तो गली का कुत्ता, जंगली कुत्ता, आसपास आया हुआ कोई भी कुत्ता आपसे आराम से रोटी खा लेगा। किसी दिन आप अपनी कमर के पीछे डंडा छिपाकर रखना और आगे से उसे रोटी डालना; कुत्ता रोटी की तरफ देखकर ललचायेगा तो सही, लेकिन आपकी आँखों की तरफ देखकर वह पीछे की ओर हटने लगेगा। वो कुत्ता भूखा होने के बावजूद और चाहते हुए भी आपकी रोटी नहीं खाएगा। उसे पता है कि रोटी तो मिलेगी, लेकिन रोटी के बाद में डंडा जरूर मिलेगा। वह आपके मनोभाव पढ़ लेता है। दुखद बात यह कि जानवर समझकर हम उसे अनपढ़ मान बैठते हैं और अपने को समझदार।

इस विषय को और स्पष्ट करना हो, तो मैं आपसे कहूँगा कि आप रास्ते पर चले जा रहे हैं और कोई कुत्ता आपको देखकर भौंकने लगता है। उस समय आप कुत्ते से बचकर के भागिये, वो आपका पीछा करेगा। आप बन्दर की घुड़की से डरकर उसके सामने से भागिये, तो वह आपका पीछा करेगा। क्योंकि जब आप भयभीत होते हैं तब आपके शरीर से ग्रंथियों का जो स्राव प्रसारित होता है, उस बन्दर को, उस कुत्ते को उसकी गंध आने लगती है और वह जान जाते हैं कि आप उनसे डर रहे हैं। प्रकृति का यह नियम है और मानवीय स्वभाव भी, कि डरे हुए को सब डराते हैं। आप ज्यों ही उनके सामने स्थिर होकर तनकर खड़े हो जाते हैं, ग्रंथियों का वह स्राव बंद हो जाता है। जैसे ही आपकी स्थिति दृढ़ता वाली और स्थिरता वाली बनी, आपके शरीर की गंध बदल गई। कुत्ता हो या बन्दर, सभी जानते हैं कि अब वो बात नहीं रही और, अब इस आदमी से दूर हटना ही ठीक है। तब, वे दूर हटकर चुपचाप बैठ जाएँगे।

इसलिए, मैं आपसे कहूँगा कि डर सामने वाले से हो या अपने-आपसे। आप उस भय के भूत को अपने पास से भगाइए। आप भीतर व बाहर दोनों से साफ़-सुथरे रहिए और निडर बनिए, निर्भीक बनिए। कहा भी गया है- “बहादुर व्यक्ति जीवन में एक बार मरते हैं और डरपोक व कायर लोग दिन में चार बार”।