“विश्वसनीय बनें, विश्वसनीय बनाएँ”- सुधांशु जी महाराज

नई दिल्ली/ नेहा मिश्रा। ज्ञान और तप से अपने-आपको पकाओ तथा पूरी निर्भयता के साथ जीवन-रण में आगे बढ़ते चले जाओ। जीवन की सफलता में विश्वसनीय व्यक्तियों का बहुत बड़ा योगदान होता है, इसलिए ज़िन्दगी में अपने कुछ विश्वसनीय साथी और सहयोगी बनाओ और उनके साथ उचित व्यवहार करो, उन्हें भरपूर निभाओ। ध्यान रहे- विश्वसनीय बनकर ही विश्वसनीय व्यक्ति बनाए जा सकते हैं।

जो मेरे करीब मेरा बनकर रहा, अगर वह कभी शत्रु बनकर सामने खड़ा हो जाए, तो वह ज्यादा खतरनाक होता है। उससे ज़्यादा ख़तरनाक और कोई हो नहीं सकता। जब ऐसा होता है, तब हृदय पर बहुत चोट लगती है। तब मन यह सोचता है कि या तो उसका अपना होना ही गलत था अथवा वह उसका ढोंग था। हो सकता है कि वह प्रच्छिन्न रूप में पहले का कोई शत्रु रहा हो। जब इसका पता चलता है तब तो और ज्यादा आन्तरिक चोट लगती है। ऐसी स्थिति आने पर आत्मसमीक्षा भी करनी चाहिए और यह जाँचना चाहिए कि ख़ुद मुझसे उस साथी को निभाने में कोई व्यवहारगत त्रुटि तो नहीं हुई।

सबसे ज्यादा डर उन्हीं से होता है जो मित्र बनकर आस्तीन में बैठे हुये सर्प हैं, जिन्हें अपनी छाया में संभालकर रखा, लेकिन आज वह शत्रु बनकर सामने खड़े हुये हैं। लेकिन परमात्मा की शरण तो अपने-आपमें अभयता देती है। भगवान के सन्निकट होने का मतलब है- भय से रहित हो जाना। इसलिए महान पुरुष कभी भी किसी से भी भयभीत नहीं होते और वे निडर होकर चलते रहते हैं।

किसी का एक आदमी भी विरोधी हो जाये, तो उसको उसी से डर लगने लग जाता है; लेकिन महान पुरुषों के सामने तो ऐसा भी हुआ कि दुनिया भर के लोग विरोधी बनकर उनके सामने खड़े हो गये, लेकिन फिर भी वो कांपें नहीं, डरे नहीं। एक समय ऐसा भी आया कि लोगों ने उनकी पवित्रता को समझा, उनकी गहराई को समझा। फिर उनका विरोध टूटते देर नहीं लगी और फिर वे सारे ही लोग प्यार के फूल लेकर खड़े हो गये। इस दुनिया की यही रीत है। बस ज़रूरत इस बात की है कि अपने मार्ग पर ईमानदारी से सही ढंग से चलते चला जाय, सर्वहित की व्यापक दृष्टि रखी जाय और पूरी निडरता के साथ क़दम बढ़ाए जायें।