दूसरों का मनोबल बढ़ाना भारतीय संस्कृति की बड़ी विषेषता- आचार्य सुधांशु जी महाराज

नई दिल्ली। तुम्हें थोड़ा मिला या ज्यादा, इसकी परवाह मत करना। हाँ! जितना मिला है, उसे अकेले मत खाना। मैं कहता हूँ कि प्रभुकृपा से जो कुछ भी मिला है, उसे मिल-बांटकर खाओ। तुम्हारा यह सहज कर्म महान ‘यज्ञ’ बन जायेगा और यज्ञ भगवान को तुम्हारी यह सुन्दर सी आहुति परमात्मा बड़े प्रेम से स्वीकार करेंगे, तुम्हारा कर्म सीधे-सुविस्ते ढंग से प्रभु चरणों में आदर सहित अर्पण हो जायेगा।

मित्रों! प्रभु को उनके भक्त का ऐसा अर्पण और समर्पण बड़ा अनोखा होता है, वह देने वाले को भी अच्छा लगता है और पाने वाला को भी। तुम्हारा यह कर्म तुम्हें बड़ा आनन्द देगा। लो और आगे दो, इसी में कल्याण है, इसी में आनन्द है, इसी में भक्ति है, इसी मे ंधन्यता है। खुशी को बांटो, ताकि वह बढ़ जाए और दुःख को बंटाओ, जिससे भारी दुःख भी बहुत हल्का पड़ जाये तथा वह तुम्हारे ही दुखियारे स्वजन को ज्यादा पीड़ा न पहुँच सके। इससे दोहरा लाभ होगा, इधर तुम्हें अनपेक्षित व अनकही प्रसन्नता एवं सन्तोष मिलेगा और उधर दूसरे व्यक्ति का दुःख का कठोर पहाड़ उसे रुई की मानिंद हल्का महसूस होगा तथा वह दुःख उसे छोड़कर आगे निकल जायेगा। तुमकों भान नहीं कि यह कितना बड़ा काम होगा। वह भी बिना किसी अतिरिक्त पुरुषार्थ के बल्कि सहज-सरल तरीके से, यूँ ही। काश! इस दुनिया के लोग इस सामान्य सी बात को समझ सकें, उसे हृदयंगम कर सकें।

भाईयों-बहिनों! जब भी किसी के जीवन में खुशी आती है, लोग उसका कार्ड लेकर अपनों के पास पहुँच जाते हैं। अपनी खुशी को सब जगह बांटने के लिए, कि मेरी खुशी में आप भी शामिल होइये, जिससे मेरी खुशी और ज्यादा बढ़ जाये। भारतीय संस्कृति की यह बहुत बड़ी खूबी है।

हमारे यहाँ उससे भी महान खूबी यह है कि यदि किसी के ऊपर कोई दुःख आ जाये और लोगों को उसका पता लग जाये, तो लोग भागते हुए उस व्यक्ति के पास पहुँचते हैं, सब लोग उसके साथ खड़े हो जाते हैं यह कहने के लिए कि तुम्हारे साथ संवेदना और सहानुभूति लेकर हम आये हैं। तुम अपने को अकेला मत समझना। वह अपने साथी से यह जताते हैं कि तुम बिल्कुल भी यह मत सोचना कि तुम अकेले हो। वह उसे समझाते हैं कि तुम पर दुःख आया है, यह कोई खास बात नहीं। दुनिया में हर किसी के ऊपर दुःख आता है। दुःख से कोई भी अछूता नहीं। हरेक को अपना दुःख भोगना ही पड़ता है, हम सब तुम्हारे साथ हैं, इस दुःख का सामना हिम्मत से करो।

बन्धुओं! इतने भर से उस आदमी का मनोबल बढ़ जाता है और उसका दुःख घट जाता है। भारतीय संस्कृति की अपनेपन की ये गंगा प्रवाहित होती रहनी चाहिए, इसे अबाध गति से बढ़ाते रहने में ही सबकी भलाई है, तुम्हारी भी और अन्य सभी की भी। आइए! इस उच्च भावना को सहज क्रम में अपनाएँ और इसे अपने जीवन का अविभाज्य हिस्सा बनाएँ।

लेखक विश्व जागृति मिशन के संस्थापक हैं।