“श्रीमद्भावतगीता” शाश्वत जीवन मूल्यों का आकाशदीप है- अवधेशानंद जी महाराज

हरिद्वार। जूनापीठाधीश्वर महामंडलेश्वर आचार्य अवधेशानंद जी महाराज ने कहा दोषदृष्टि, परनिंदा और आत्महीनता; स्वाध्याय-सत्संग अभाव की उपज हैं। अतः समता, शुभता और आन्तरिक समृद्धि का स्रोत सत्संग ही श्रेयस्कर है…! मनुष्य के जीवन में सत्संगति का बड़ा महत्व होता है। अच्छे लोगों के साथ मनुष्य अच्छे विचारों को ग्रहण करता है और बुरे लोगों के साथ बुरी आदतों को ग्रहण करता है। अच्छे विचार और अच्छी संगति इंसान में हिम्मत और सकारात्मकता का भाव लाती है। कोशिश यही हो बुरे व्यसन, बुरी आदतों से बचा जाए। जो व्यक्ति जीवन में ऊँचा उठना चाहता है उसे समाज में अच्छे लोगों से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए। जीवन में सत्संगति का बड़ा महत्व है। जिसे सत्संगति नहीं मिलती उसका जीवन निरर्थक होता है। जिसे सत्संगति मिल जाती है, उसका जीवन सार्थक और सफल हो जाता है…।

“गोस्वामी तुलसीदास” जी ने ठीक ही कहा है – सज्जनों के साथ रहकर दुराचारी भी अपने दुष्कर्मो को त्याग देता है। लोहे के साथ पवित्र अग्नि को भी लुहार अपने हथोड़े से पीटता है। कुसंगति के कारण महान से महान व्यक्ति भी पतन के गर्त में गिरते देखे गये हैं। विद्यार्थी जीवन में सत्संगति का अत्यंत महत्व है। इस काल में विद्यार्थी पर जो भी अच्छे बुरे संस्कार पड़ जाते हैं, वे जीवन भर नही छुटते। अतः युवकों को अपनी संगती की ओर से विशेष सावधान रहना चाहिए। विद्यार्थियों की निर्दोष तथा निर्मल बुद्धि पर कुसंगति का वज्रपात ना हो जाये, यह प्रतिक्षण देखना अभिभावकों का कर्तव्य है। मनुष्य विधाता की सर्वश्रेष्ठ रचना है।

महर्षि वेदव्यास जी ने इसके संबंध में कहा है – ”गुह्य ब्रह्म तदिदिं ब्रवीमि, नहि मानुषात् श्रेष्ठतरं हिं किंचित” अर्थात्, मैं बड़े भेद की बात आपको बताता हॅू, मनुष्य से बढ़कर संसार में कुछ नहीं है। जीवन एक किताब की तरह है, जिसके हर पृष्ठ पर हमें नई बात लिखनी होती है। हर पृष्ठ एक सुबह है, एक शाम है। अतः चतुर वही है, सुजान वही है जो जीवन की हर सुबह-शाम को सुन्दर और दिव्य बना ले..।

“आचार्यश्री” ने कहा शब्द का, श्रुति का अथवा गुरु वाक्यों का माहात्म्य यह है कि उन्हें सुनते ही जीवन से अंधकार सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाता है। जीवन में प्रकाश ही प्रकाश फैल जाता है। हां, शब्द आत्मसात् तभी होता है, जब हृदय सीपी की तरह पूरी तरह खुला हुआ हो, स्वाति नक्षत्र की बूंद को आत्मसात् करने के लिए। ये वेद वाक्य हैं – महाजनो येन गतः स पन्थाः यानि, महापुरुष जिस मार्ग से गये हैं, वही उत्तम मार्ग है।

महर्षि वेदव्यास जी ने पुराण में लिखा है – धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्। अर्थात्, धर्म का रहस्य अथवा स्वरूप इतना गहन है, मानो वह गुफाओं में छिपा है। अतः सभी उसका गहन अध्ययन नहीं कर सकते। सुगम मार्ग यही है कि जिन्होंने घोर तपस्या कर उस परम तत्व को जान लिया तथा जिस रास्ते वे चले, हमें भी उसी मार्ग पर चलना चाहिए। ब्रह्मनिष्ठ संत-महात्माओं, ज्ञानियों और निर्मल हृदय वाले महापुरुषों के सत्संग के महत्व को प्रदर्षित करते हुए धर्मग्रंथों में कहा गया है कि सत्संग ही एकमात्र ऐसा सरल साधन है, जो अज्ञान और कल्पित भ्रामक धारणाओं से मुक्ति दिलाकर मानव जीवन के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करने की क्षमता रखता है…।

“आचार्यश्री” ने सत्संग के सुयोग्य पात्र कौन हैं? इस पर प्रकाश डालते हुए कहा – मन, वाणी और कर्म की एकरूपता रखने वाला, जिसका आचरण पवित्र है, जो किसी भी प्रकार के लोभ-लालच-मोह आदि से मुक्त आत्मा है, परम जितेंद्रिय है, उसी महापुरुष का सत्संग करने से ज्ञान व भक्ति की प्राप्ति संभव है। महाभारत में कहा गया है –यद्यदाचरित श्रेष्ठः तत्तदेबेतरो जनः स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते…।

अर्थात्, उत्तम सद्गुणों से संपन्न श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, उसी का अनुगमन करने से कल्याण होता है। स्वयं धन-संपत्ति की आसक्ति से आबद्ध, काम, क्रोध, लोभ जैसे दुर्गुणों से दूषित व्यक्ति के उपदेश का श्रोता पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता..। पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा – “श्रीमद्भावतगीता” शाश्वत जीवन मूल्यों का आकाशदीप है। गीता धर्मग्रंथ ही नहीं, कर्म भी ग्रंथ है। गीता में कर्म को प्रधानता दी गई है। अतः गीता के उपदेश पर चलने से व नित्य सत्संग करने से ही जिंदगी होगी खुशहाल…।