श्रीहरिनाम संकीर्तन करना ही सर्वोत्तम भगवद भजन है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

टीकमगढ़। सृष्टि में हर पल परिवर्तन है। प्रभात-दोपहर, सायं-रात्रि, दिवस-सप्ताह, मास-अयन, संवत, विविध ऋतु-चक्र सर्वत्र विद्यमान दृश्य-सत्ता और सम्पूर्ण प्राणि-जगत् कालमुख ग्रास है। अतः परमार्थ, भगवद-भजन एवं स्वयं की अविनाशी, नित्य-शाश्वत स्वरूप-सत्ता का प्रबोध ही श्रेयस्कर है…! संसार के सब सम्बन्ध नश्वर हैं, केवल आत्मा के साथ सम्बंध ही शाश्वत है। यह संसार क्षणभंगुर है, नाशवान है। मनोहर दिखाई देने वाला प्रत्येक पदार्थ प्रतिक्षण विनाश की प्रक्रिया से गुजर रहा है। जो कल था, वह आज नहीं है और जो आज है, कल नहीं होगा। संसार प्रतिक्षण नाशवान और परिवर्तनशील है। फिर हम क्यों बाह्य पदार्थों, जड़ तत्त्वों में भटक रहे हैं? क्यों हम नश्वरता के पीछे बेतहाशा दौडे जा रहे हैं? हम आत्म-स्वरूप को समझकर शाश्वत सुख की ओर क्यों न बढें? जहां जीना थोड़ा, जरूरतों का पार नहीं, फिर भी सुख का नामोनिशान नहीं; ऐसा है संसार और जहां जीना सदा, जरूरतों का नाम नहीं, फिर भी सुख का शुमार नहीं; वह है मोक्ष! फिर भी हमारी सोच और गति संसार से हटकर मोक्ष की ओर नहीं होती, यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है? हम अनन्त काल से संसार की क्षणभंगुरता को समझे बिना परभाव में रमण करते चले आ रहे हैं, यही हमारे जन्म-मरण और संसार परिभ्रमण का कारण है, यही दुःख-शोक-विषाद का कारण है। हर पल हम परभाव में व्यस्त रहते हैं, एक क्षण के लिए भी यह विचार नहीं करते कि हम आत्मा के लिए क्या कर रहे हैं? जो भी आत्मा से ‘पर’ है, वह नाशवान है और संसार के नाशवान पदार्थ ही सब रगड़े झगडों की जड़ हैं; जब तक यह चिन्तन नहीं बनेगा, संसार से आसक्ति समाप्त नहीं होगी, हम स्व-बोध को, आत्म-बोध को प्राप्त नहीं कर सकेंगे और उसके बिना आत्मिक आनंद, परमसुख की उपलब्धि असम्भव है…।

“आचार्यश्री” ने कहा करते हैं कि हमें नियमित रूप से स्वाध्याय करना चाहिए। स्वाध्याय में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए। स्वाध्याय स्वस्थ विचार लाता है, स्वाध्याय मन की मलिनता को साफ करके आत्मा को परमात्मा के निकट बिठाने का सर्वोत्तम मार्ग है। प्रत्येक विचारवान व्यक्ति को प्रतिदिन संकल्पपूर्वक सद्ग्रंथो का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। जो हमेशा स्वाध्याय करता है, उसका मन हमेशा प्रसन्नचित और शांत रहता है। स्वाध्याय से ज्ञानवर्धन होता है, जिससे धर्मं और संस्कृति की सेवा होती है। स्वाध्याय से अज्ञान और अविद्या का आवरण हटने लगता है और वेदादि शास्त्रों के दिव्य ज्ञान का प्राकट्य होता है। प्रतिदिन स्वाध्याय करने से बुद्धि बहुत तीव्र हो जाती है। कठिन से कठिन विषय के तुरंत समझ लेती है।।जो साधक प्रतिदिन स्वाध्याय करते हैं वे कभी भी साधना से भटकते नहीं तथा जो बिना स्वाध्याय के साधना करेगा, उसकी साधना कभी सफल नहीं हो सकती। जो प्रतिदिन स्वाध्याय करता है, उसकी बुद्धि इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि वह प्रकृति के रहस्यों को स्वतः जानने लगता है। जो प्रतिदिन साधना करता है, वही उच्चस्तरीय साधनाओं का अधिकारी हो सकता है। अध्यात्म सागर पर जो कुछ भी लिखा गया है, यह सब लेखक के स्वाध्याय का ही परिणाम है। जीवन में यदि साधना-स्वाध्याय-संयम और सेवा हो तो हर कोई ऋषि-महर्षि हो सकता है। लोग व्यक्तित्व विकास (Personality Development) की Classes करते है, जबकि स्वाध्याय से स्वतः Personality Development हो जाती है…।

“आचार्यश्री” ने कहा करते हैं कि भगवत भजन और विश्वास तथा निर्लोभ कामना ही सच्चा भक्ति मार्ग है। भक्ति में सदगुण, सुविचार, समभाव के साथ भगवत भजन ही जीवन-कल्याण का मार्ग है। भक्त की भक्ति के प्रति भगवान सर्वत्र हैं, लेकिन भक्ति सच्चे मन से होनी चाहिए। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – कठिन कलिकाल में भगवद-भजन, पारमार्थिक-चिंतन, स्वाध्याय एवं प्राकृतिक नियमों का निर्वहन ही आनंद साम्राज्य की कुंजी एवं जीवन सिद्धि के सहज साधन हैं। श्रीमद्भागवत कहती है कि कलियुग में श्रीहरिनाम-संकीर्तनयज्ञ के द्वारा ही आराधना करना शास्त्र सम्मत है। वे लोग बुद्धिमान हैं जो नाम संकीर्तन रूपी यज्ञ के द्वारा श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं। श्रीरामचरित मानस में भी कहा गया है कि कलियुग में भवसागर पार करने के लिए “राम नाम” छोड़ कर और कोई आधार नहीं है। “कलियुग समजुग आन नहीं, जो नरकर विश्वास। गाई राम गुण गन विमल, भव तर बिनहिं प्रयास…” गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि आप भक्ति का कोई भी मार्ग अपनाएं, उसे श्रीनाम कीर्तन के संयोग से ही करें। इसका फल अवश्य प्राप्त होता है और शीघ्र प्राप्त होता है। सब कहते हैं कि भगवान का भजन करो…. भजन करो! तो क्या करें हम भगवान का भजन करने के लिए? सच्चे भक्तों के संग करना, सत्संग करना, श्रीहरिनाम संकीर्तन करना ही सर्वोत्तम भगवद भजन है। सच्चे भक्तों के साथ मिलकर, उनके आश्रय में रहकर नाम-संकीर्तन करने से एक अद्भुत प्रसन्नता और अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है, उसमें सामूहिकता होती है, व्यक्तिगत अहंकार नहीं होता और उतनी प्रसन्नता अन्य किसी भी साधन से प्राप्त नहीं होती, इसीलिए इसे सर्वोत्तम हरिभजन माना गया है…।