‘‘बड़ों को सम्मान दें, वह तुम्हें स्नेह देंगे’’-राम महेश मिश्र

नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति आदर्शों की संस्कृति है। इस सनातन संस्कृति का आधारभूत तत्व है- श्रद्धा। श्रद्धा सम्मानास्पद व्यक्तियों के प्रति, देवों के प्रति, आदर्शों के प्रति, सत्य के प्रति, धर्म के प्रति, धर्मग्रन्थों के प्रति, गुरुजन के प्रति, समाज के प्रति, जन्मभूमि के प्रति, राष्ट्र के प्रति, विश्व मानवता के प्रति; आदि-आदि। श्रद्धा हमारा संस्कार है और यही है सर्वोत्कृष्ट धर्म भी एवं सर्वोत्तम कर्तव्य भी।

जब बात श्रद्धा की अभिव्यक्ति की आती है, तब सबसे पहले स्थान पर आते हैं- हमारे बड़े व बुजुर्ग। इनमें भी जन्मदात्री ‘माँ’ और जनक ‘पिता’ का स्थान सबसे ऊपर बैठता है। इस सृष्टि में प्रथम पूज्य कहे जाने वाले गणपति भगवान गणेश द्वारा ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने की बात आने पर अपने माता-पिता ‘शिव-पार्वती’ की परिक्रमा करके उस परिक्रमा को ही सम्पूर्ण घोषित किये जाने का पौराणिक तथ्य इस बात को सही ठहराता है। किशोर बालक श्रवण कुमार द्वारा अपने माता-पिता की काँवड़ कन्धे पर रखकर चारधाम यात्रा और उसी में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान कर देना माता-पिता को प्रथम गुरु व देव के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

भक्त पुण्डरीक की पितृ-सेवा को देखकर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें दर्शन देने की गाथा पण्ढरपुर नाम का तीर्थ आज भी गाता है। युवराज देवव्रत द्वारा अपने पिता के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेना तथा उसका दृढ़ता से पालन करना और लोक को ‘भीष्म-प्रतिज्ञा’ की उक्ति सदा-सदा के लिए देकर भीष्म पितामह के रूप में अमर हो जाना जनक-जननी के लिए सम्मान का अनूठा उदाहरण है। मातृभक्त शिवाजी के जीवन के ढेरों उदाहरण तथा मातृसेवा से ही अकूत मान, सम्मान, राज-ऐश्वर्य सभी  कुछ पा जाने की ऐतिहासिक घटना माता-पिता को उच्च पद पर आसीन करती है।

अनेक गुरुभक्तों द्वारा पितातुल्य गुरुदेव और मातृवत् गुरुमाता को सर्वोच्च देव के रूप में प्रतिष्ठा के उदाहरण हृदय को माता-पिता के प्रति गहन-श्रद्धा से भर देते हैं। आदर्शों की सजीव प्रतिमा माँ शारदामणि, अरविन्द आश्रम की अधिष्ठात्री माताजी और लाखों-करोड़ों गायत्री साधकों की वन्दनीया माता भगवती देवी आध्यात्मिक आकाश में घ्रुवतारे की तरह अमर हो गयी हैं, जिन्हें ढेरों गुरुनिष्ठ आत्माओं ने आध्यात्मिक पिता गुरुवर्य के साथ आध्यात्मिक माता का सर्वोच्च सम्मान दिया।

भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के इस तरह के अनेक कीर्ति स्तम्भों से प्राप्त प्रेरणा तथा वर्तमान समय में माता व पिता सहित बड़े-बुजुर्गों की गम्भीर अवमानना की स्थितियों के बीच ‘रामसेतु’ का काम किया है- विश्व जागृति मिशन द्वारा वर्ष 1997 में आरम्भ किए गये ‘श्रद्धापर्व’ ने। मिशन के कल्पनापुरुष आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज की प्रेरणा से आरम्भ हुआ तथा महामन्त्री श्री देवराज कटारिया के संयोजन में मना श्रद्धा-पर्व हर साल 02 अक्टूबर को मुख्यालय आनन्दधाम सहित देश-विदेश में मनाया जाता है। समाजदेव को समर्पित लगभग 200 विशिष्टजनों को अब तक सम्मानित किया जा चुका है। इसके माध्यम से माता-पिता एवं बड़े-बुजुुर्गों के प्रति नयी पीढ़ी में सम्मान व सहकार की भावना तेजी से बढ़ रही है।

इस सेवा के दौरान इतिहास-प्रतीकों एवं धर्मग्रन्थों में उपलब्ध मूर्त उद्धरणों को भी श्रद्धापूर्वक याद किया गया। माता-पिता एवं बड़े-बुजुर्गों के प्रति श्रद्धासिक्त हृदयों वाले भारत देश में माँ-बाप साधन-सम्पन्न पुत्र-पुत्रियों के होते हुए भी दुःखी हृदय से दूसरों की तरफ सहायता की चाहना की निगाह से देखें तथा उस समय उनकी आँखों में आत्म-पीड़ा के आँसू हों, इसे तपस्वी ऋषियों-मुनियों का यह देश कैसे सहन कर सकता है? विश्व जागृति मिशन ने अनेक जीवन्त उदाहरण सामने लाते हुए देश की युवा पीढ़ी का ध्यान अपने माता-पिता व परिवार के वृद्धजनों की ओर खींचा और उन्हें यथोचित सम्मान देने को कहा।

इस विषय पर चर्चा के दौरान एक दिवस श्रद्धेय महाराजश्री ने कहा था कि पितृ-वचन का पालन करने हेतु सम्मुख प्रस्तुत राज्यपद व ऐश्वर्य को क्षण भर में त्यागकर व 14 वर्ष बियाबान जंगल में बिताकर राजकुमार राम का युगों-युगों के लिए मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम बन जाना तथा दो माताओं व दो पिताओं के प्रति अनोखे पुत्र-धर्म का निर्वहन कर देवकीनन्दन, यशोदानन्दन, वासुदेव एवं नन्दनन्दन बालक कन्हैया का परम यशस्वी गीतानायक श्रीकृष्ण बन जाना, यह दो इतिहास घटनायें विश्व जागृति मिशन के ‘श्रद्धापर्व’ के लिए अनुकरणीय उदाहरण हैं। आचार्यवर चाहते हैं कि आज की दुनिया के हर पुत्र एवं पुत्री को ऐसे महान उदाहरणों को अंगीकार करके माता-पिता का सम्मान कर स्वयं को महान बनाना चाहिए।

राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनरुत्थान को समर्पित विश्व जागृति मिशन का आह्वान है कि जनरेशन गैप के दानव से त्रस्त इस देश व विश्व को नये रूप में गढ़ने का एक गम्भीर अभियान चलाया जाए और आयु व सेवा दोनों से वरिष्ठ लोगों का मौलिक हक ‘आत्मसम्मान’ उन्हें वापस दिया जाए, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाए एवं आभार प्रकट किया जाए; तभी संस्कृति, समाज एवं समय की रक्षा हो सकेगी। बीती अर्द्धशती में बुजुर्गों एवं सुयोग्यों के असम्मान व तिरस्कार के रूप में राष्ट्र-विश्व पर छा गए कुहांसे को अभियानपूर्वक छाँट डालने और इस बीच की पुरानी सड़ी-गली सोच एवं व्यवस्थाओं को बदल डालने का वक्त अब आ गया है।

आइए! दिवंगतों को श्राद्ध और तर्पण के तुरन्त बाद आगामी दो अक्टूबर को देश भर में ‘श्रद्धा पर्व’ मनायें। यह पर्व नगर-नगर और गाँव-गाँव में मने। भारतवर्ष के हर वर्ग के हर व्यक्ति से हमारा भावभरा आह्वान है कि अपनों को अपनापन दें, उन्हें यथोचित सम्मान दें, उन्हें गले लगायें, उनकी सेवा-सुश्रूषा करें। जिनका कोई नहीं है, उन्हें आदर भरा अपनापन दें। अपनी गल्तियों का परिमार्जन करके एक नयी भाव-परम्परा की पुर्नस्थापना करें, उत्साह एवं उल्लास के साथ गाँधी जयन्ती-शास्त्री जयन्ती के दिन श्रद्धापर्व मनायें।

 

क्या है श्रद्धा पर्व

  1. हमें जीवन जीने में सहयोग दिया। यह साधुवाद है उन माता-पिता के प्रति जिन्होंने हमें नाम दिया।
  2. यह उन आदरणीयों के प्रति श्रद्धा अर्पण करने का दिन है, जिन्होंने इस समाज और देश को ऊपर उठाने में महनीय योगदान दिया।
  3. यह कृतज्ञता दिवस है उन विशिष्टजनों के प्रति, जिन्होंने समाज में अपने-अपने क्षेत्रा में कार्य करते हुए विशेष मानक स्थापित किये। जो भले ही आयु में छोटे हों, परन्तु जिनके कार्य बहुत बड़े हैं, यह देश श्रद्धापर्व के दिन उनको सादर स्मरण करता है।
  4. यह पावन पर्व है नई पीढ़ियों को प्रेरित करने का, कि आओ! हम सब बड़ों का सम्मान करें।
  5. यह दिवस है देशवासियों से यह आह्नान करने का कि राम व कृष्ण के इस देश में अब कोई भी माता-पिता और कोई भी आयु-वृद्धि उपेक्षित न रहे।
  6. यह पर्व है देवभूमि भारतवर्ष के निवासियों को चेताने का, कि किसी भी बूढ़ी आँख में उनकी सन्तान की उपेक्षा के कारण आँसू न आने पायें।
  7. विश्व जागृति मिशन परिवार को प्रसन्नता है कि इस श्रद्धापर्व को लोक-मान्यता मिली है। देश-विदेश में यह पर्व प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर को बड़ी श्रद्धा व आदरभाव के साथ मनाया जाता है। अनेक विद्वतजनों एवं मनीषियों ने इसमें प्रतिभाग किया है तथा अपना अनुमोदन दिया है। उन्होंने भी सुपात्रा व्यक्तियों को अभिनन्दित किया है।

यह प्रवाह गाँव-गाँव, नगर-नगर, गली-गली तक पैफल रहा है। वृद्ध माता-पिता एवं बड़े-बूढ़े उपेक्षित न हों, वृद्धाश्रमों का चलन इस देश में बन्द हो। बड़े-बूढ़ों का जीवन शान्ति व सन्तोष से भरा-पूरा होऋ यही ईश्वर से प्रार्थना, यही शुभकामना।

जागे भारत, जागे आर्य सन्तान, जागे सकल जहान।

घर-घर में हों राम-कृष्ण और हो वृद्धों का सम्मान।।

विश्व जागृति मिशन द्वारा आरम्भ किये गये श्रद्धा पर्व की लोकमानस ने मुक्तकण्ठ से सराहना की है। भू.पू. राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने कहा कि माता-पिता का आदर करना और उनकी सेवा करना हमारी देश की परम्परा रही है। आजकल हम इसे भूल गये हैं। श्री संधाशु जी महाराज ने लोगों का ध्यान इस ओर दिलाया है, यह सराहना की बात है। प्रकाण्ड गायत्री साधक सिद्धसन्त स्वामी कल्याण देव (136 की आयु में ब्रह्मलीन) ने श्रद्धा पर्व अभियान को बड़े पुण्य का कार्य बताया। भू.पू. उपप्रधानमन्त्री श्री लाल कृष्ण आडवाणी ने श्रद्धा पर्व को भारत के प्राचीन गौरव की पुर्नस्थापना में सहयेागी बताया। प्रख्यात चिन्तक, विचारक एवं भू.पू. केन्द्रीय मन्त्री डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि विश्व जागृति मिशन के प्रति इस देश को कृतज्ञ होना चाहिए, जिसने भारत के युवा वर्ग को एक नई ज्योति दी है।

प्रख्यात पर्यावरणविद एवं उत्तराखण्ड के चिपको आन्दोलन के शिखर पुरुष श्री सुन्दर लाल बहुगुणा ने श्रद्धा पर्व को एक पुनीत पर्व बताया और कहा कि यह पर्व भारतीय परम्पराओं की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। राष्ट्र के शिखर संस्कृति पुरुष आचार्य डॉ. प्रभाकर मिश्र बोले- श्रद्धा पर्व ने हमारे संस्कृति का पुर्नजागरण किया। इस मिशन द्वारा मानव क्षेत्र में किये जा रहे कार्य परम स्तुत्य हैं। मैं आपको हृदय से प्रणाम करता हूँ। संस्कृत के उद्भट विद्वान प्रोफेसर रमाकान्त शुक्ल ने कहा- श्रद्धा पर्व के अवसर पर आनन्दधाम में आकर ऐसा लगता है कि हम बैकुण्ठ में गये हैं। आज बड़ी जरूरत है कि देश के सभी टी.वी. चैनलों से इसके कार्यक्रम प्रसारित किए जायें, जिससे समाज व राष्ट्र को प्रायः सुन्दर सुविचार मिलें। भारत-पाकिस्तान युद्ध में 90,000 से अधिक पाक सैनिकों को समर्पण कराने वाले भारतीय सेना के महावीर ले.जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने सुविख्यात आध्यात्मिक संस्थान में एक बूढे़ सैनिक के सम्मान को अद्वितीय बताया तथा भारतीय संस्कृति को नमन कहा।

बीसवें श्रद्धा पर्व पर आगामी 02 अक्टूबर को हम आपको आनन्दधाम में सप्रेम आमन्त्रित करते हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि इस देश का सर्वविधि मंगल हो।

-लेखक विष्व जागृति मिशन, नई दिल्ली के निदेशक हैं।