“यौन पिपासु होता समाज और शिकार होते बच्चे”

नई दिल्ली/ अनुज अग्रवाल। स्कूलों में बच्चों के साथ हो रहे यौन दुर्व्यवहार और हिंसा के लिए दोष किसे दें? उस बाजार को जो सबको उत्पाद बना देने पर उतारू है, चाहे वह वस्तु हो अथवा देह, शिक्षा हो या स्वास्थ्य। या फिर उस जीवनशैली को जो अस्तित्ववाद व भौतिकवाद को ही अंतिम सत्य मानकर बेलाग और बेलगाम जीवन जीने पर उतारू है। जो आठ से अस्सी साल तक भी अपनी यौन पिपासा की पूर्ति के समय को कम मानता है और कपड़ों व साथियों के बीच के फर्क को तार-तार कर चुका है, या फिर उस पुरुषवादी मानसिकता को जो औरत तथा अब बच्चों तक को अपना खिलौना, दासी, गुलाम या चेरी समझकर गुडिय़ा की भांति खेलकर तोड़ देने की मानसिकता से ग्रस्त है या फिर वह नारीवाद जो सदियों की जंजीरों को तोड़ आजाद होने को तड़प रही है, किन्तु अपनी आजादी की अभिव्यक्ति यौन पूर्ति व उच्चश्रंखलता के माध्यम से ही अभिव्यक्त करने को अभिशप्त है।

पशुता की ओर बढ़ता समाज जानवर होने पर उतारू है। हम मानवता के नये पड़ावों, यथा बढ़ती उम्र, घटता जीवन संघर्ष, यौन सम्मिलन के बढ़ते अवसर, टूटती वर्जनाओं और बढ़ती यौन आवश्यकताओं व आक्रामकताओं के बीच अपने सामाजिक सम्बन्धों व मौलिक आवश्यकताओं के बीच अन्तर्संम्बन्धों को पुनर्परिभाषित ही नहीं कर पा रहे हैं। विविध आर्थिक, सामाजिक व मानसिक स्तरों का समाज, जिसे जबरदस्ती बाजार द्वारा ‘ग्लोबल’ बनाने की जिद की जा रही है, ‘आत्मघाती’ हो चुका है। बुरी तरह हावी बाजार हमारी हर भावना, संवेदना व नैसर्गिक जैविक आवश्यकताओं का उद्दीपन कर हमें उत्तेजित कर रहा है। हम फिल्में, रेडियो, टीवी, इंटरनेट, समाचार पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य सभी प्रसार-माध्यमों के माध्यम से जकड़े जा चुके हैं और हमारी सोच को, संस्कारों को, नैतिकता को और सामाजिकता की भावना को कुंठित कर दिया गया है।

निश्चित रूप से यह विध्वंस का समय है। सामाजिक संस्थाओं के विध्वंस का, सामाजिकता के विध्वंस का और व्यवस्था के विध्वंस का, मगर क्या पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है? शायद नहीं या बहुत कम और बहुत धीमी। अभी तो बाजार हावी है और अपने समाप्त होने से पूर्व की प्रक्रिया में और ज़्यादा हावी होने की कोशिश में है। यह तो संभव ही नहीं है कि यह प्रक्रिया जल्दी से समाप्त हो जाये, विशेषकर विकासशील देशों में। ऐसे में एक बड़ी आबादी जो अपने सांस्कृतिक मूल्यों व विरासत के साथ जी रही है, उसे बदलाव व परिवर्तन की प्रक्रिया के नाम पर बाजार के इस पशुवत आचरण का शिकार होना पड़ेगा। शायद हम अपनी पूर्व की गुरुकुल शिक्षा पद्धति, संस्कारों ओर ब्रह्मचर्य की अवधारणाओं, धर्म के अनुरूप अर्थ और काम का भोग, योग, अध्यात्म और मुक्ति के लिए जीवन जैसे सनातन मूल्यों को पुनः स्थापित नहीं कर पाएंगे। अभी इसके कोई लक्षण देश में दिखलाई नहीं देते।

अगर भारत के संदर्भ में बात करें तो उच्चतम न्यायालय की लाख फटकार और आदेशों के बावजूद हमारी केन्द्र सरकार पोर्नोग्राफ़ी वेबसाइटों, विशेषकर ‘चाइल्ड पोर्न’ पर प्रतिबंध लगाने की इच्छुक नहीं है और विपक्षी दलों की चुप्पी भी इस कृत्य को अघोषित समर्थन दे रही है। नशे के जाल में पूरा देश मानों जकड़ा हुआ है। सम्पूर्ण भारतवर्ष यूरोप, अफ्रीका व अमेरिकी, एशियाई, सभी देशों के जीवित/मरे लोगों की नई-पुरानी यौन पिपासों के श्रव्य-दृश्य आनन्द से दो-चार हैं या दो-चार किया जा रहा है तथा जानवर होने पर उतारू हैं/या उतारु बनाये जा रहे हैं।

अब अवैध व गैरकानूनी कार्यों को जब सरकारें ही परोक्ष समर्थन दे रही हों, तब समाज की क्या बिसात। सरकार द्वारा प्रायोजित ‘रूपान्तर’ की जद में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भी आ गये हैं, राम रहीम व आसाराम जैसे बाबा भी, विभिन्न राजनीतिक दलों के अनेकानेक नेता भी। हमारे देश के नौकरशाह तो पुराने खिलाड़ी हैं ही। अब आम आदमी की मां-बहन-बेटी और बच्चे बलात्कार के शिकार होती रहें, तो इन्हें क्या फर्क पड़ता हैं? ये तो सम्बन्धों से ऊपर उठ चुके लोग हैं ‘बहुगामी’ प्रवृत्ति के बंदे। इन्हें प्लूटो का ‘पत्नियों का साम्यवाद’ पसन्द है और बच्चों को ‘कम्यून’ में भेज देने का शौक़। यौन क्षमतावर्धक दवाईयों व वस्तुओं का सेवन कर ये दिन-दहाड़े ताल ठोकने वाले ‘महामानव’ नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में परिवार संस्था व समाज की वॉट लगाने के लिए वे तैयार बैठे हैं। अब यह समझ चुके हैं कि डिजीटलीकरण और बाजार की आड़ में शिक्षा की दुकानें और ‘पोर्नोग्राफी तो शायद सभी को पसन्द है; सोनिया जी को भी, राहुल जी को भी, सुषमा जी को भी, जेटली जी को भी और शायद मोदी जी को भी, सारे यूपीए व एनडीए के नेताओं को भी! अब बच्चे या बड़े कोई भी इनका शिकार बने, क्या फर्क पड़ता है? इन पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है? यदि ऐसा नहीं है तो तो फिर ये चल ही क्यों रही है?