सेवा से संतुष्ट हुए अनेक लोगों के आशीर्वाद, सद्भाव, शुभ-संकल्प, देवताओं की भाँति पुष्पवृष्टि करते रहते हैं

सीकर। जितेंद्रिय, निराभिमानी और ईश-समर्पित साधक को अभयता, आनन्द और आत्म-ऐश्वर्य का अनुभव होने लगता है…! श्रीमद्भावतगीता में आत्मसंयमयोग की यात्रा आत्मा की परमात्मा से तद्रूप होने की यात्रा है। मन पर नियंत्रण से होता है – आत्मविकास। समस्त पापों की जड़ इन्द्रियों की आधीनता है। इन्द्रियों की इस आधीनता से बचने के लिए ही महापुरुषों ने इन्द्रिय-निग्रह पर जोर दिया है। और, इन्द्रियों पर नियंत्रण, निग्रह के लिए ही मन पर संयम रखने को कहा गया है और तप का प्रावधान किया गया है। मन को जितना ही परमेश्वर को पाने का मार्ग है। जिसने अपने मन को जीत लिया है, वह किन्ही भी परिस्थितियों का सामना कर सकता है। परिस्थितियाँ उसके लिए बाधित नहीं होतीं। उसका मनोबल इतना प्रचंड होता है कि वह फिर किसी भी परिस्थिति से अप्रभावित रह अपनी आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करता चला जाता है। उसकी आत्मा उसके वश में होती है। महर्षि अरविन्द जी के शब्दों में – ‘‘यह समाधिस्थ परम आत्मा सदा, हर पल, मन की जाग्रत् अवस्था में भी, जब वासना और अशांति के कारण उपस्थित हों तब भी, शीत-उष्ण, सुख-दुःख तथा मान-अपमान आदि के प्रसंग होने पर भी अपनी वृत्तियों को भली-भाँति शांत बनाए रखता है।’’ इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण ही ब्रह्मचर्य है। गुरु की आज्ञा में रहना और उनके मार्गदर्शन पर चलना भी ब्रह्मचर्य धर्म है। सादगी पूर्ण जीवन जीना, राग-द्वेष का भाव ना होना और इन्द्रियो से नाता तोड़कर अपने आप को ध्यान के लिए तैयार कर लेना वास्तव् में ब्रह्मचर्य धर्म है। ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करने से शक्ति का संचार होता है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और चेहरे पर दिव्यता झलकती है एवं हर-पल परम आनन्द की, ब्रह्मानंद की अनुभूति होने लगती है…।

“आचार्यश्री” ने कहा करते हैं कि सफलता का एक ही मंत्र है – समर्पण। समर्पण में हर चीज सहर्ष स्वीकार होती है। गुरु के प्रति, इष्ट के प्रति सम्मान, समर्पण भाव रखने से हमारा जीवन नित्य समृद्धि की ओर बढ़ता चला जाता है। समर्पण से जीवन में प्रश्न समाप्त हो जाते हैं। समर्पण से जीवन में शान्ति व आनन्द आता है, समर्पण से जीवन में स्वयमेव ही उत्तर मिलते जाते हैं, समर्पण से जीवन में स्वयमेव ही मार्गप्रशस्त होता है। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – समर्पित भावना से ही लक्ष्य प्राप्त होगा। परमार्थ को पाने के लिए और द्वंद्व, अज्ञान, आलस्य, संशय से मुक्ति के लिए साधु-महात्माओं के संग और नित्य सत्संग से श्रेष्ठ कोई साधन नहीं हो सकता। सत्संग के माध्यम से स्वयं को एकाग्र कर इस सृष्टि पर आप विजय प्राप्त कर सकते हैं। अपने ही भीतर के विकारों को जीतना, अपने ही स्वरूप को जानना और खोजना ही सत्संग का फल है। सत्संग से आत्मज्ञान का बोध होता है। धर्म की व्यवहारिकता का परिचय अहं भाव के शून्य-समर्पण में ही है। यह समर्पण समाज के प्रति प्रारंभ होता है और उसका पर्यवसान परम तत्व पर होता है। जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को त्यागकर समाज तथा धर्म की उन्नति के लिए प्रयासरत रहता है उसका अभिनन्दन सम्पूर्ण राष्ट्र व समाज का अभिनन्दन होता है…।

“आचार्यश्री” ने कहा – साधु-संतों, महापुरूषों के जीवन से हमें परोपकार की भावना के साथ जनमानस के प्रति समर्पित होकर परमार्थ कार्य करने की सीख मिलती है। अपने दृष्टिकोण को सेवा धर्म से ओत-प्रोत बना लेने से अन्तःकरण को असाधारण शक्ति प्राप्त होती है। जीवन में पग-पग पर उल्लास बढ़ता जाता है। क्रूरता, कुटिलता, छल, पाखंड से जो मानसिक उद्वेग उत्पन्न होता है वह जीवन को बड़ा ही अव्यवस्थित, अशान्त एवं कर्कश बना देता है। मानव जीवन में जो आध्यात्मिक अमृत छिपा हुआ है वह स्वार्थी लोगों को उपलब्ध नहीं हो सकता। जो व्यक्ति अपने ही सुख का ध्यान रखता है, अपनी ही चिन्ता करता है और दूसरों के स्वार्थों की परवाह नहीं करता, वह विषम विपत्ति में फँस जाता है। सब लोग उससे घृणा करते हैं। कोई भी उसे सच्चे दिल से प्रेम नहीं करता। स्वार्थी मनुष्य कुछ सम्पदा इकट्ठी भले ही कर ले, परन्तु वह असल में बहुत घाटे में रहता है, उसकी सारी मानसिक सुख शान्ति नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। परमार्थ, सेवा, त्याग और निस्वार्थ प्रेम-व्यवहार को अपनी प्रमुख नीति बना लेने से अपना जीवन आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। शत्रु भी उससे घृणा नहीं करते। सेवा से संतुष्ट हुए अनेक लोगों के आशीर्वाद, सद्भाव, शुभ-संकल्प, देवताओं की भाँति पुष्पवृष्टि करते रहते हैं। जीवन का अमर फल उसी को प्राप्त होता है जो स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ को अधिक महत्व देता है। अतः जो व्यक्ति समाज का और जनमानस का भला करता है वो सदैव के लिए अमर हो जाता है…।

उपरोक्त जूनापीठाधीश्वर महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी जी महाराज के वचन हैं।