सड़कों पर आ गए, कोई बात नहीं। लेकिन अब यथार्थ का आत्मचिन्तन करिए और उसे व्यवहार में लाईए -राम महेश मिश्र

नई दिल्ली। सड़क पर आ गए, कोई बात नहीं। उत्थान अभियान के लिए आगे आना ही चाहिए। लेकिन लोगों के ‘तीन जुमलों’ का जवाब आपकी ओर से देश को अवश्य दिया जाना चाहिए। पहला यह कि ३-३/४-४ पीढ़ियाँ प्रान्तीय और राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर तक सुप्रतिष्ठित हो चुकने के बाद भी भावी पीढ़ियाँ ‘दलित’ कब तक बनी रहेंगी? दूसरा यह कि परदादा ज़ुल्म का मारा था, दादा भी ज़ुल्म का मारा रहा। पिता ज़ुल्म का मारा, बेटा भी ज़ुल्म का मारा। पोता भी और उसकी पीढ़ियाँ भी सब ज़ुल्म की मारी रहेंगी। गंगा से पानी कितना गुज़र चुका है, स्थितियों एवं सोच में भारी अन्तर आ चुका है और हम जहाँ के तहाँ खड़े हुए हैं। आख़िर यह कब तक चलेगा? आख़िर कब तक? तीसरा यह कि तरक़्क़ी और उत्थान के चरम पर पहुँचे लोग वास्तव में दलित व दबे-कुचले ‘अपनों के उत्थान’ के बारे में सोचना कब शुरू करेंगे?

अब हमारे स्वजनों को एक बात ज़रूर ध्यान रखनी चाहिए कि एक बड़ा वर्ग जो इस देश द्वारा सारी सुविधाएँ खुलेदिल से दिए जाने के बाद भी दशकों से उनसे वंचित व अछूता रहा, उसके लिए भी आवाज़ उठाने और उनका हिस्सा उन्हें देने का साहस करने का समय अब निकल रहा है। इसके लिए भी आप जुटें और 70 साल बाद भी नीचे पड़े भाई-बहिनों को मिलकर ऊपर उठाएँ। केवल 10 साल की अवधि के सात गुना पार हो जाने के बाद भी यह देश बड़ी शिद्दत के साथ अब वास्तविक दबे-कुचलों के उत्थान की बाट बड़ी बेसब्री से जोह रहा है।

वास्तव में आरक्षण इसलिए दिया गया था कि दबा-कुचला व्यक्ति अपने तथा अपने परिवारीजनों का विकास कर सके और अगले चरण में उन व्यक्तियों के लिए भी सोचे, जो उसी वर्ग के हैं और उन्हीं के आसपास मौजूद जो बड़ी ग़रीबी, बदहाली, भुखमरी और अभाव में जीवन जी रहे हैं। बाबा साहेब की और हमारे संविधान की यही मंशा थी। लेकिन भारी दुःख है कि उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना तो दूर, वो उसकी छाया तक से वंचित हैं।

हमारा सुझाव है कि जिस व्यक्ति को एक बार आरक्षण मिल गया, उसकी ज़िम्मेदारी है कि उसी आरक्षण व मज़बूतीके सहारे अपने व अपने बच्चों का स्तर ऊँचा उठा लें। उन्हें दुबारा अपने बच्चों और उनकी भी संतानों के लिए आरक्षण का सहारा न ताकना पड़े। इससे अन्य वंचित स्वजनों को भी ऊपर उठने का मौक़ा मिल सकेगा। इसके लिए लाभ उठा चुके व्यक्तियों की एक बड़ी ज़िम्मेदारी यह भी होनी चाहिए कि वे अगले चरण में अपने बच्चों एवं भावी पीढ़ियों को आरक्षण के कोटे में लाने की अपेक्षा अपने ही आसपास रह रहे अपनी ही जाति-वर्ग के अभावग्रस्त, दबे-कुचलों को आरक्षण दिलाने का प्रयास करें।

हमारी सरकार भी यह सुनिश्चित करे कि एक बार आरक्षण पाकर ऊँचा उठा जो व्यक्ति पुनः अपने परिवार को उसकी सुविधा देने की चिन्ता करने की बजाय अपने वर्ग के अन्य लोगोंपरिवारों के लिए अपने आरक्षण को त्यागने को तैयार हों, ऐसे व्यक्तियों को समुचित सामाजिक सम्मान दिया जाए। समर्थों द्वारा अपने आरक्षण का त्याग कर दिए जाने पर वंचितों को ढूँढ-ढूँढकर उसका लाभ दिया जाय। इससे देश में बड़ा बदलाव सम्भव हो सकेगा।

आज सड़कों पर उतरे भाई और बहिनें इस अभियान के लिए आन्तरिक आन्दोलन चला सकें तो दलितों के जीवन में बड़ा बदलाव आ सकता है। इस अभियान में क्या अवर्ण क्या सवर्ण सभी वर्गों के लोग साथ दें, सहयोग करें। यह राष्ट्र उस दिन की भी प्रतीक्षा कर रहा है, जब न्यायप्रिय सभी दलित और पिछड़े एक साथ माँग कर उठेंगे कि इस देश के सभी कमज़ोरों, पिछड़ों, वंचितों को ऊपर उठाया जाय और यह जाति-पाँति से ऊपर उठकर केवल आर्थिक आधार पर हो।

हम सब तनिक सोचें! क्या यह उचित है कि एक मन्दिर में प्रसाद बँट रहा हो और कुछ व्यक्तियों को वह प्रसाद चार-पाँच बार मिल जाय, लेकिन अधिकांश लोग अपनी बारी का इन्तज़ार करते रहें। इससे उनमें खीज तो पैदा होगी ही ना? जिस तरह आज देश का 90 प्रतिशत धन मात्र 01 प्रतिशत लोगों की तिजोरियों में क़ैद होकर रह गया है, उसी तरह आरक्षण-सम्पदा कुछेक आलीशान महलों में सिमट गयी है। ऐसे तो दलित समाज का भला तो नहीं होने वाला। फिर! वह परमात्मा और आत्मा की तरह अनश्वर और शाश्वत तो है नहीं।

आइए! हम सभी देशवासी ऊँच-नीच, जाति-पाँति, भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे को गले लगाएँ और परस्पर प्रेमभाव रखकर एक-दूसरे को आगे बढ़ाएँ। ढेरों वैश्विक संकटों के मद्देनज़र अब हम-सब केवल और केवल ‘भारतीय’ बन जाएँ। आज ईराक़ से भारत लाए गए विभिन्न जातियों के सभी कंकालों से जुड़ी आत्माओं को हम-सबकी यही श्रद्धांजलि होगी।

साभार- राम महेश मिश्र, संरक्षक, आल इंडिया जर्नलिस्ट यूनियन