जगत गुरु बनने के लिए एक बार फिर से सोचने की जरूरत है।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

शिलांग/ अमित मिश्र। हमारा देश अपनी अतुलनीय संस्कृति के लिए विश्व विख्यात है इसी कड़ी में आज का दिन भी सर्वोपरि है आज के दिन हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। वह बच्चों के बीच में बहुत ही प्रभावशाली और पसन्दीदा शिक्षक रहे । लगभग 40 वर्षों तक अध्यापन के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया । आज के युग मे अध्यापन एक ब्यवसाय के रूप में परिलक्षित होने लगा है जो नैतिक उन्नति के लिए घातक है जिस देश मे बच्चा जन्म के तुरंत बाद से अपनी माँ से संस्कार सीखने लगता था उसी देश मे नैतिक शिक्षा को एक विषय विशेष के रूप में अनिवार्य किया गया क्या यही हमारी उन्नति और प्रगति है । यह चिंतन और चिंता का विषय है आज हम पाश्चत्य सभ्यता के पीछे भाग रहे है कभी एकांत में बैठकर सोंचना चाहिए इससे हमें क्या मिला ।

अमित मिश्र

शिक्षक और बच्चों के बीच सदियों से चली आ रही गुरु शिष्य परंपरा आज विलुप्त हो रही है आज गुरु को फैसिलिटेटर कह कर पुकारा जाता है अगर गुरु ,गुरु न होकर फैसिलिटेटर बन जाएगा तो नैतिक शिक्षा एक विषय बनना तय है हमारा यहां पर  किसी भी नई ब्यवस्था का विरोध करना मकसद नही है मगर आज के मनीषियों को सोचना चाहिए हम जगत गुरु क्यों थे और आज क्या है सभी को पता है एक बार डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जब इलाहाबाद में रेलवे स्टेशन जा रहे थे तब विद्यार्थियों ने उन्हें बैलगाड़ी में बैठाया और बैलों की जगह पर स्वयं बैलों की जगह पर गाड़ी को खींचा उस दृश्य में बच्चे और राधाकृष्णन दोनो रो रहे थे यह थी हमारी गुरु शिष्य परंपरा । हमें एक बार फिर जगत गुरु बनने के लिए सोचना पड़ेगा।