परमेश्वर की प्राप्ति के लिये अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाइये- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। मन, वचन और कर्म की पवित्रता और इन्द्रिय संयम ही साधना का प्रथम सोपान है…! हमारे मन, वचन और कर्म की पवित्रता केवल अपने लिए ही कल्याणकारी नहीं होती, अपितु वह संपूर्ण समाज तथा विश्व के लिए भी मंगलमय होती है। जिसका अंत:करण शांत है, वही आध्यात्मिक व्यक्ति है। जैसे ही अंतःकरण पवित्र होगा; हमारी दृष्टि में सौंदर्य, माधुर्य तथा रस का अनुभव होने लगेगा l मन, वचन और कर्म की प्रवृत्ति पर नियंत्रण ही धर्म का सार है। धरती में देवत्व का विकास और दनुजता का विनाश हो इसके लिये पवित्र अंतःकरण के व्यक्तियों की अधिकता होना परम आवश्यक है। देवत्व के विकास का प्रथम सोपान मानव का निर्मल अन्तःकरण ही माना गया है। इसके बिना अणु से विभु, लघु से महान बनने की अभिलाषा अधूरी ही बनी रहेगी। अपवित्र अन्तःकरण बना रहा तो दिव्य दृष्टि का उदय होना असम्भव है। आन्तरिक निर्मलता एवं पवित्रता में वह शक्ति है, जो अन्य साधनों के अभाव में भी जीवन लक्ष्य की प्राप्ति करा सके। भाव की पवित्रता से भक्ति मिलेगी। स्वयं के प्रति अविश्वास की भावना पैदा होना पलायन है। पलायन करने वाला व्यक्ति बहाने बनाता है। वह लक्ष्य से भटक जाता है। वह संशय, भय और असमंजस में रहने लगता है। इससे जड़ता और अकर्मण्यता भी आती है। अतः जो भोग के परिणाम से परिचित हैं, वे कभी दु:खी नहीं होते…।

“आचार्यश्री” ने कहा – “सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है।” संयम ही सामाजिक जीवन की सच्ची नींव है। संयम से जो शक्ति पैदा होती है, वही चरित्र का आधार है। पूज्य “आचार्यश्री” जी कहा करते हैं कि इन्द्रियों की आधीनता पाप की जड़ है। जिस प्रकार पाप नीति का विनाशक है, उसी प्रकार पाप का मूल इन्द्रियों की आधीनता है। हमें पाप क्यों करना पडता है? सुन्दर-मधुर शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श की प्राप्ति के लिए ही हमें पाप करना पडता है। आँखें सौन्दर्य देखना चाहती हैं, कान मधुर आवाज सुनना चाहते हैं, नाक को मोहक गंध की आवश्यकता है, जीभ को सुन्दर-मधुर रस चाहिए और स्पर्शेन्द्रिय को सुन्दर-सुकोमल स्पर्श चाहिए। बस, इन्हीं पांच इन्द्रियों की आधीनता ही पाप करवाती है। सब इन्द्रियों का पोषण करने वाली जीभ-रसना है। समस्त इन्द्रियों को पुष्ट बनाकर बहकाने वाली यह जीभ ही है। यह जीभ ही हमारा खान-पान एवं भक्ष्याभक्ष्य का विवेक नष्ट कर देती है। इस जीभ को स्वच्छन्दतापूर्वक उसका पोषण करने वाली सब सामग्रियां देने के कारण सब इन्द्रियों में पशुता आ जाती है। इन इन्द्रियों पर जितना नियंत्रण कम होगा, उतना पाप अधिक होगा। चतुर कौन है? सुजान कौन है? तो इसका उत्तर है – जो चित्त का स्थायी समाधान कर ले, वही सुजान है। इन्द्रियों की इस आधीनता से बचने के लिए ही महापुरुषों ने इन्द्रिय-निग्रह पर जोर दिया है। और, इन्द्रियों पर नियंत्रण, निग्रह के लिए ही मन पर संयम रखने को कहा गया है एवं तप का प्रावधान किया गया है। मन के दुराचार से मनुष्य अपने को बचाए और अपने मन का संयम करे। अतः मन के दुराचार को छोड़कर सदाचार का पालन करने में ही जीवन की सार्थकता है…।

“आचार्यश्री” ने कहा – मन पर संयम किये बिना कोई साधना फलीभूत नही होती। इन्द्रियों को जीतने के लिए मन-शुद्धि की आवश्यकता होती है। अतः कहा है कि ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः …’। स्वतंत्र छोड़ा हुआ मन बंधन का कारण है और नियंत्रण में रखा हुआ मन मुक्ति का कारण है। जिस व्यक्ति का मन स्वच्छंद होता है, वह पाप करता है, जिससे वह आत्मा का अहित करता है। जो व्यक्ति अपने मन पर नियंत्रण कर लेता है और उसे सर्वज्ञ की आज्ञानुसार चलाता है, वह व्यक्ति अपना तथा दूसरों का कल्याण कर सकता है। हमें मन की इच्छा के आधीन नहीं होना है, अपितु उसे अपनी इच्छा के आधीन बनाना है। मन जो कुछ मांगे, वह उसे नहीं देना है, बल्कि हम जो उसे देना चाहें, वही उसे देना है। इस प्रकार मन पर संयम-नियंत्रण रखने की आवश्यकता है। मन पर अंकुश रखने के लिए उसे तृष्णा से सदा दूर रखना चाहिए। मन को वश में करने का एक मार्ग यह है कि अच्छी और बुरी इच्छाओं की हमें परीक्षा लेनी चाहिए। जो-जो बुरी इच्छाएं हैं, उन्हें पूरी नहीं करनी चाहिए और अच्छी इच्छाओं को पूरा करने का प्रबल प्रयत्न करना चाहिए। केवल साधुओं को ही नहीं, गृहस्थियों को भी सुखी होना हो तो उन्हें अपने मन पर अंकुश रखना चाहिए। मनुष्य को किसी भी तरह बुरी इच्छा को दबाना और अच्छी इच्छा के अनुसार चलने का प्रयत्न करना चाहिए। मैले दर्पण में सूर्य की किरणों का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता। ठीक उसी प्रकार जिनका अन्तःकरण मलिन और अपवित्र है, उनके हृदय में ईश्वरीय प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता। इसलिये परमेश्वर की प्राप्ति के लिये अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाइये। ध्यान रखिये, आपको औरों के हित साधन में भी प्रवृत्त होना है, सो विशाल अन्तःकरण धारण कीजिये। अतः जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिये संयमित जीवन जीने का अभ्यास कीजिये और उसे स्वच्छ और निर्मल बनाइये, क्योंकि इसी में मानव-जीवन की सार्थकता है…।