सनातन के विरुद्ध षड्यंत्र: मंदिरों और धार्मिक संस्थानों पर भारत सरकार का नियन्त्रण

जयपुर। भारत में पहले आक्रांता मुसलमान तुर्क और मुग़लों ने भारत के लगभग 40,000 बड़े और सम्मानित मन्दिरों को तोड़ा जिनमें अयोध्या काशी, मथुरा के राम, शंकर और श्री कृष्ण के मंदिर शामिल हैं। फिर अत्याचार का नम्बर था डकैत इसाइयों का जिन्होंने शुरुआत रेगुलेशन 4 के कानून के तहत, पहले पूरी (गोवर्धन पीठ), जिसकी स्थापना आदि शंकर ने की थी, वहां पहले आने वाले तीर्थ यात्रियों पर टैक्स वसूलने का कानून बनाया। 10 रुपये, 6 रुपये, 5 रुपये और 3 रुपये, और 2 रुपये। ईसाईयों ने ही एक विशेष वर्ग को मंदिर में प्रवेश वर्जित किया उनका संज्ञा थी पुंज तीर्थी या  कंगाल। इसी को सन्दर्भ मानते हुए आंबेडकर ने 1932 में लिख दिया की शूद्रों का मंदिर में प्रवेश वर्जित ब्राह्मणों ने किया (झूठ)।

हिन्दुओं के मंदिर और उनकी सम्पदाओं को नियंत्रित करने के उद्देश से सन 1951 में एक एक्ट बना – “The Hindu Religious and Charitable Endowment Act 1951” इसी कानून के अंतर्गत राज्य सरकारों को अधिकार मिला की मंदिरों की चल-अचल संपत्ति, चढ़ावा आदि को जैसे चाहे उपयोग कर सकते हैं। इसी कानून के श्रद्धालुओं के दिए दान का दुरूपयोग किया गया। मंदिर अधिकारिता अधिनियम के तहत आंध्र प्रदेश के 43000 मंदिरों के संपत्ति से केवल 18% दान मंदिरों को अपने खर्चो के लिए दिया गया और बचा हुआ 82 % कहा खर्च हुआ इसका कोई उल्लेख नहीं है। यहां तक कि विश्व प्रसिद्ध तिरूमाला तिरूपति मंदिर भी बख्शा नहीं गया, हर साल दर्शनार्थियों के दान से इस मंदिर में लगभग 1300 करोड़ रुपये आता है, जिसमे से 85 % सीधे राज्य सरकार के राजकोष में चला जाता है, क्या हिंदू दर्शनार्थी इसलिए इन मंदिरों में दान करते है की उनका दान हिंदू-विरोधी तत्वों के काज करने में लगे? तमिलनाडु में कम से कम 10 मंदिरों की जमींन राज्य सरकार में हड़प ली। एक विदेशी लेखक स्टीफन ने खुलासा किया की कर्नाटक में कुल 2 लाख मंदिरों से 79 करोड़ रुपये सरकार ने बटोरा, जिसमे से केवल 7 करोड रुपए मंदिर कार्यकारिणी को दिए गए और इसी समय 59 करोड़ रुपये मदरसों और हज सब्सिडी के दिए गए और चर्च जीर्णोद्वार के लिए 13 लाख का अनुदान दिया गया स्टीफन लिखते हैं कि यह सब हिन्दुओ की निष्क्रियता के कारण होता रहा है। बहुत दुखदाई घटना उड़ीसा सरकार के जगन्नाथ मंदिर मंदिर की 7000 एकड़ जमीन बेच दी है इसी से उड़ीसा के राज्य सरकार के वित्तीय संकट को टाला जा सका।

सरकारों के अत्याचारों से बचे धन का उपयोग सिद्धिविनायक मंदिर में स्कॉलरशिप स्कीम के अंर्तगत मृतक किसान परिवारों के बच्चो के लालन पोषण में लगा रहा है जिसके लिए 1 करोड़ का धन सुरक्षित किया गया है, इसके अतिरिक्त और भी अन्य समाजसेवी कार्यो में लगा रहे हैं। सभी धार्मिक ट्रस्ट और मंदिर किसी ना किसी रूप में जाति, सम्प्रदाय से अलग हट कर समाज के सभी वर्गों को सहयोग कर रहे है।

16जुलाई 2013 में धार्मिक संस्थानों पर ट्रस्ट के रूप में सरकार के प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ हिंदू धर्म आचार्य सभा ने जनभावना तैयार करने का अभियान शुरू किया गया था। मंदिरों में धर्मार्थ दान पर सरकारी नियंत्रण के खिलाफ हिंदू धर्म आचार्य सभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी जो अभी विचाराधीन है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसकी जानकारी देते हुए कहा, केवल हिंदू धार्मिक संस्थानों के साथ भेदभाव किया जाता है।

हमें जागना होगा, जगाना होगा, यह देश वैदिक देश है। हमारे अपने देश में ही हमारे साथ दोगला व्यवहार होता रहा है। संकल्प ले हम अपनी परम्परा और इतिहास के साथ अब छेड़छाड़ नहीं होने देंगे..

संभव है यदि हम उठ खड़े हो, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए……जय वैदिक, जय सनातन जय हिन्दू राष्ट्र

प्रख्यात बुद्धिजीवी और ब्राह्मण विचारक डॉ. विजय मिश्रा की कलम से।

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