संत रमेश भाई ओझा जी और स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी की मुलाकात में ’कथाकार सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’  पर हुई चर्चा

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष एवं ग्लोबल इण्टरफेथ वाश एलायंस के सह-संस्थापक स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज और संत रमेश भाई ओझा जी की भेंट वार्ता हुई। स्वामी जी ने उत्तराखण्ड की भूमि पर भाई श्री का अभिनन्दन किया। दोनों पूज्य संतों ने आध्यात्मिक चर्चा के उपरांत सामाजिक, पर्यावरण एवं जल संरक्षण, यमुना जी की स्वच्छता तथा कथा की याद में वृक्षारोपण के मुद्दों पर विचार-विमर्श किया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने सीएसआर की तरह केएसआर  की भूमिका पर जोर देते हुये अर्थात कथाकार सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (कथाकारों की सामाजिक जिम्मेदारी)  चर्चा के दौरान कहा ’दिव्य कथाओं में आध्यात्मिक चर्चा के साथ पर्यावरण एवं जल के महत्व एंव संरक्षण का संदेश प्रेषित किया जाये तो इसका श्रोतोओं पर अधिक प्रभाव पड़ सकता है। कथा के माध्यम से जीवन में दिव्यता का समावेश होता है उसी प्रकार कथा के द्वारा ही दैनिक कार्यो से प्लास्टिक को हटाने का यत्न भी किया जा सकता है। उन्होने कहा कि कथाकार पर्यावरण मित्र बनने और स्वच्छता की ओर बढ़ने का संदेश प्रेषित करें क्योंकि यह आज की आवश्यकता है। कथा भीतर के पर्यावरण को अर्थात अन्तःकरण को शुद्ध करती है साथ ही अब कथाकारों द्वारा दिया गया संदेश बाहरी पर्यावरण को शुद्ध एवं परिष्कृत करने का कार्य भी करेंगा इससे स्वच्छ एवं पवित्र वातावरण का निर्माण होते देर नहीं लगेगी।
स्वामी जी ने कहा कि कथा, मनुष्य को आध्यात्मिकता सिखाती है और आध्यात्मिकता से जीवन में दयालुता एवं परोपकार के गुण विकसित होते है उसे प्रकृति एवं पारिस्थितिकी के संरक्षण मंे लगायें। उन्होने कहा कि हमें कथाओं के माध्यम से ऐसी रणनीति बनानी होगी जो मनुष्य के विचारों में सकारात्मक परिवर्तन लाये। स्वामी जी ने भाई श्री को परमार्थ गंगा तट पर होने वाली दिव्य गंगा आरती में सहभाग हेतु आंमत्रित किया।
संत रमेश भाई ओझा जी ने कहा कि मनुष्य और प्रकृति के मध्य संवेदनात्मक रिश्ता नितंात आवश्कयक है और इसका जीवन में समावेश आध्यात्मिकता के माध्यम से ही सम्भव है। उन्होने स्वामी जी द्वारा चर्चा के दौरान जो केएसआर का उल्लेख किया गया उसे अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं प्रभावी बताते हुये कहा कि इस विषय पर अन्य कथाकारों के साथ विस्तृत चर्चा कर पर्यावरण एवं नदियों के संरक्षण हेतु प्रभावी कदम उठाये जाने चाहिये।