विशुद्ध अन्तःकरण ही मनुष्य का भाग्य-विधाता है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। सभी सात्त्विक चेष्टाओं, दिव्य क्रियाओं एवं अन्य आध्यात्मिक साधन प्रणालियों के अनुसरण का एक ही लक्ष्य है; विशुद्ध अन्त:करण की निर्मिति। सभी प्रकार से साधक का एक ही प्रयत्न होना चाहिए कि वह अंतर्मन, हृदय और स्वभाव की पवित्रता स्थिर रख सके, बाह्यंतर पवित्रता जीवन सिद्धि की पहली माँग है ..! पवित्रता मानव-जीवन की सार्थकता के लिए अनिवार्य है। मनुष्य का विकास और उत्थान केवल ज्ञान अथवा भक्ति की बातों से ही नहीं हो सकता, उसे व्यवहारिक रूप से भी अपनी उच्चता और श्रेष्ठता का प्रमाण देना आवश्यक है और इसका प्रधान साधन बाह्यंतर पवित्रता ही है। मनुष्य के लिए शरीर मन, चरित्र, आचार-विचार आदि सब प्रकार की पवित्रता आवश्यक है। यदि शारीरिक पवित्रता का ध्यान न रखा जायेगा तो स्वास्थ्य कभी अच्छा नहीं रह सकता और अस्वस्थ व्यक्ति कोई भी अच्छा काम नहीं कर सकता। इसी प्रकार मानसिक पवित्रता के बिना मनुष्य में सज्जनता, प्रेम सद्व्यवहार आदि के भाव उत्पन्न नहीं हो सकते और वह संसार में किसी की भलाई नहीं कर सकता। जिस व्यक्ति में चरित्र की पवित्रता नहीं है, वह कभी भी संसार में प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए यदि आप वास्तव में अपने कल्याण की अभिलाषा रखते हैं तो अपने भोजन, वस्त्र, निवास स्थान, देह, मन, आत्मा आदि सबकी स्वच्छता और पवित्रता का ध्यान रखना अति आवश्यक है। इन सबकी सम्मिलित पवित्रता से ही जीवन में उस निर्मलता और प्रकाश के भाव का विकास हो सकेगा, जिसके द्वारा आप वास्तविक मनुष्य कहलाने के अधिकारी बन सकते हैं। आपको केवल अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् आपके आस-पास भी कहीं गन्दगी, अस्वच्छता आदि दिखलाई नहीं पड़नी चाहिए, क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है और उसके जीवन का एक क्षण भी बिना दूसरों के सहयोग के व्यतीत नहीं हो सकता। इसलिए उसकी पवित्रता तभी स्थिर रह सकती है जबकि समस्त समाज में पवित्र-जीवन की भावना समाविष्ट हो जाये …।

आचार्यश्री ने कहा विशुद्ध अन्तःकरण ही मनुष्य का भाग्य-विधाता है। वास्तव में चेतना की पूर्णता का केन्द्र मष्तिष्क नहीं, वरन् विशुद्ध अन्तःकरण है। ईश्वर से सम्पर्क साधने के लिए एकमात्र स्थान मानवी अन्तःकरण है। इसीलिए आवश्यक है कि अन्तःकरण सदैव पवित्र भावों से अनुप्राणित रहे। जिस तरह परमाणु का ऊर्जा केन्द्र ‘न्यूक्लियस’ को माना जाता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य की स्थिति और संभावनओं का केन्द्र-बिन्दु उसके अन्तःकरण अन्तराल को समझा जा सकता है। यहीं से मनःसंस्थान को निर्देश मिलता है और वह वैसा ही सोचना आरम्भ कर देता है जिससे कि आकांक्षा की पूर्ति संभव हो सके। विज्ञान की भाषा में अन्तःकरण को ही “सुपर चेतन” कहा गया है। ‘सुपर’ इसलिए कि उसकी मूल प्रवृत्ति मात्र उत्कृष्टता से ही भरपूर है। वेदान्त दर्शन में जिस सत्ता को परम तत्व परमात्मा माना गया है वह परिष्कृत अन्तःकरण ही है। इसे ही विकसित करने के लिए भक्तियोग का आश्रय लिया जाता है। कर्म योग से शरीर, ज्ञान योग से मष्तिष्क और भक्ति योग से अन्तःकरण की साधना की जाती है। कार्य-कौशल से लोक-व्यवहार बनता है। बुद्धि-वैभव से उपयुक्त निर्णय होते हैं। किन्तु, अन्तःकरण तो सम्पूर्ण व्यक्तित्व का ही अधिष्ठाता है। उसकी परिष्कृत स्थिति ही सामान्य मानव को ऋषि, देवात्मा और देवदूत स्तर तक पहुँचाने में समर्थ होती है। नित्य सत्संग भजन व कीर्तनादि से शुद्ध अन्तःकरण एवं सद्भावों का निर्माण होता है। सद्भाव कहाँ से होता है? शुद्ध अन्तःकरण से। सोने-चाँदी के गहनों से देह की सजावट होती है और भजन-कीर्तन एवं नाम-जप आदि से शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता है। देह की अपेक्षा अन्तःकरण हमारे ज्यादा नजदीक है। अतः शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करने वाला शील ही सच्चा आभूषण है …।

आचार्यश्री ने कहा अगर शीलरूपी भूषण हमारे पास नहीं है तो बाहर के वस्त्रालंकारादि किसी काम के नहीं। चित्त में आत्म-प्रसाद है, भीतर प्रसन्नता है तो वह शील से, सदगुणों से ही है। परहित के लिए किया हुआ थोड़ा-सा संकल्प, परोपकारार्थ किया हुआ थोड़ा-सा कार्य हृदय में शान्ति, आनन्द और साहस लाता है। शील में क्या आता है? सत्य, तप, व्रत, सहिष्णुता, उदारता आदि सदगुण शील से आते हैं। आप जैसा अपने लिए चाहते हैं, वैसा दूसरों के साथ व्यवहार करें। अपना अपमान नहीं चाहते तो दूसरों का भी अपमान करने का सोचें तक नहीं। आपको कोई ठग ले, ऐसा नहीं चाहते तो दूसरों को ठगने का विचार नहीं करें। आप किसी से दुःखी होना नहीं चाहते तो अपने मन, वचन और कर्म से दूसरा दुःखी न हो इसका ध्यान रखें। प्राणीमात्र में परमात्मा को देखने का अभ्यास करके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना ही शील है। इसे महा धन कहा गया है। जिसके जीवन में शील होता है उसको ईर्ष्या, पुण्यक्षीणता या किसी भी प्रकार का भय नहीं होता। शील आभूषणों का भी आभूषण है। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – बाह्य आडम्बरों से कभी आन्तरिक शुद्धि नहीं हो सकती। आन्तरिक पवित्रता के लिए मन परमार्थ के भाव से भीगा हुआ होना चाहिए। यदि किसी सद्गुरु योगी अथवा संत-महात्मा की तप:स्थली में अथवा उनके सनिध्य में हम साधना करते हैं तो बहुत अच्छा है। वैराग्य वहां स्वाभाविक रूप से जाग्रत हो जाता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – इन चारों को शुद्ध करना अत्यंत आवश्यक है। बिना इन्हे शुद्ध किए परमात्मा के दर्शन नहीं होते। इसलिए ईश्वर दर्शन के लिए जाते समय इन चारों को शुद्ध करके जाना चाहिए, क्योंकि अंतःकरण चतुष्टय के शुद्ध होने पर ही ईश्वर के दर्शन होते है …।