उचित आहार, व्यायाम, तप आदि के द्वारा अंतःकरण को पवित्र रखना चाहिए- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। मनुष्य-जीवन ईश्वरीय उपहार है। अतः अपने वास्तविक स्वरूप का बोध और जीवन के प्रयोजन की पूर्ति ही जीवन का लक्ष्य हो; यही परम पुरुषार्थ है! श्रीमद्भावतगीता को अध्यात्म दीप कहा गया है, इसकी फलश्रुति ही अध्यात्म है। अध्यात्म का अर्थ है – स्वभाव की और लौटना। “स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते”… । हमारी संस्कृति की जड़ें ही अध्यात्म है। अध्यात्म का अर्थ है – अपने स्वभाव में लौटना। अध्यात्म अपने स्वभाव में लौटने की यात्रा का नाम है। जहां शांति, आनन्द और स्थाई समाधान है। अध्यात्म भीतर की उर्जा को, स्वयं की आग को जगाता है। यह बताता है कि कैसे विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों में बड़ा बना जाएं? स्वयं का बाहरी विकास विज्ञान है और भीतरी विकास अध्यात्म है। अध्यात्म की प्रेरणा भी पूरी वसुधा को एक परिवार मान कर चलने की है। बहिर्जगत में विज्ञान ने दुनिया को एक सूत्र में आबद्ध करने का आधार प्रस्तुत किया है तो अंतर्जगत में वही प्रयोजन अध्यात्म पूरा करता है। अध्यात्म के बिना विज्ञान अधूरा है। जीवन की स्वाभाविक मांग अध्यात्म है। जब उसकी पूर्ति होने लगती है, तब सहसा प्रसन्नता, आनंद, उल्लास, जीवन में धन्यता, उत्सव-धर्मिता, स्थायित्व, प्रसन्नता आदि अनुभूत होने लगती हैं। जिसके आने पर भ्रम-भय नहीं रहता, शोक नहीं रहता, फिर द्वंद भी कहाँ रहता है। हानि-लाभ, जन्म-मरण, यश-अपयश इन द्वंदों से ऊपर उठना ही अध्यात्म है। जो चेतना को प्रसादिक बना दे, वही तो अध्यात्म है। अध्यात्म स्वभाव का नाम है। जो हमें स्वभाव की ओर, अपने अस्तित्व की ओर, अपनी सत्ता की ओर ले आए, उसे अध्यात्म कहते हैं। महापुरुषों के उपदेश ठीक तरह से सुनना आ जाए तो जीवन की शंकायें स्वमेव ही समाप्त हो जाएंगी। आत्म-तत्त्व के दर्शन, जागरण और समुन्नयन के लिए चार सोपान अति आवश्यक हैं – आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास। जीवन को सही दिशा में ले जाने का प्रयास तो हम सभी करते हैं, लेकिन यदि हम महापुरुषों के बताए दिशा-निर्देशों के अनुरूप चलें तो सम्भव है, हमारा जीवन सार्थक बन जाए। आध्यात्मिक चिन्तन के अंतर्गत व्यक्ति को एकमात्र अतीन्द्रिय स्वरूप अनुसंधान के उद्देश्य को प्राप्त करने का संदेश दिया गया है। जिससे प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता, संतुष्टि तथा शांति को प्राप्त करते हुए श्रेष्ठ जीवन जीने की कला सीख जाए। मनुष्य के भ्रम, भय, संदेह, तर्क-वितर्क और समस्याओं को अध्यात्म के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। अध्यात्म भारतीय संस्कृति के प्राण हैं और भारतीय संस्कृति तो समूची वसुधा के प्राण हैं। अतः सनातन काल से भारत की संस्कृति ही मनुष्य जाति को आदर्शों, मर्यादाओं, प्रेम, त्याग और मानवीय मूल्यों का पाठ पढ़ा रही हैं….।

“सद्गुरुदेव” ने कहा – मनुष्य-जीवन ईश्वर का अनुपम उपहार है। जो सुविधाएं किसी जीव-जंतु को नहीं मिली, वह मनुष्य को मिली है। मनुष्य को ही परमात्मा ने यह प्रेरणा प्रदान की है, कि वह अमृत्व को प्राप्त करे। जिन्हें भजन करना है वो पहले अपना भोजन ठीक कर लें। आहार का अर्थ केवल भोजन ही नहीं है। आहार का अर्थ है – हमारा देखना, सोचना, सुनना आदि। हम क्या ग्रहण कर रहे हैं, वो पवित्र तो है ना? “आहार शुद्धौ सत्वाशुद्धि: सत्व-शुद्धौ। ध्रुवा स्मृति:, स्मृतिलम्भे सर्वग्रंथीनां विप्रमोक्षा:” … अर्थात्, शुद्ध भोजन करने से सत्व की शुद्धि होती है। सत्वशुद्धी से बुद्धि शुद्ध और निश्चयी बन जाती है। फिर पवित्र एवं निश्चयी बुद्धि से मुक्ति भी सुगमता से प्राप्त होती है। अतः हमें सदा उचित आहार, व्यायाम, तप आदि के द्वारा अंतःकरण को पवित्र और शुद्ध रखना चाहिए। शुभ कर्म करते हुए, आत्मा की अमरता का आनंद लेते हुए, सदाचार का जीवन व्यतीत करना चाहिए। मनुष्य परम चेतना एवं ईश्वरीय संकल्प की साकारता है। मनुष्य अपनी अनन्तता, व्यापकता, अतुल्य-सामर्थ्य और सनातनता को हरपल अनुभूत करे। मनुष्य ईश्वर की सृष्टि की उत्कृष्टतम और अत्यन्त महनीय कृति है। मानव जीवन ईश्वरीय उपहार व भवसागर तरण के लिए है। अनुभूत वही कर पाता है जिसके ऊपर परमात्मा अनुग्रह करते हैं और परमात्मा अनुग्रह उन्हीं पर करते हैं जो उनका होकर जीते हैं, जो उनकी सच्चे मन से उपासना करते हैं, जो शास्त्रों व धर्मग्रंथों में बताए परमात्मा के मार्ग पर चलकर अपना जीवन संवारने की आकांक्षा रखते हैं अथवा जिनका परमात्मा व उसकी बनाई सृष्टि पर पूरा विश्वास होता है। अतः वे उसके शरणेय होकर परमात्मा से अपने अभिष्ट की पूर्ति करा ही लेते हैं…।