कैसे बनता है प्रेम योग जानिए ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय से

 वाराणसी। बहुत सी ऐसी प्रेम कहानियां होती है जो अपने मुकाम तक नहीं पहुंच पाती है। यानी इनका संबंध विवाह से पहले ही खत्म हो जाता है। बहाने चाहे कुछ भी बने लेकिन कुछ ऐसी स्थिति बनती है कि प्रेम विवाह की बजाय पांरंपरिक विवाह के माध्यम से दांपत्य जीवन के सूत्र में प्रेमी बंध जाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका प्रेम अपनी मंजिल को पाने में कामयाब होता है। कुछ ऐसे योग हैं जो कुंडली में मौजूद होने पर व्यक्ति का प्रेम विवाह करने में सफल होता है।
चंद्रमा आकर्षण –
पैदा करने वाला ग्रह माना गया है। जबकि मंगल जोखिम लेने और राहु केतु परंपरा को तोड़कर आगे बढ़ने वाला ग्रह है। इसलिए इन ग्रहों का प्रेम विवाह में बहुत महत्व होता है। कुंडली में मंगल सातवें घर में होने पर मंगलिक योग बनाता है जो वैवाहिक जीवन में दूरियां बढ़ाने का काम करता है लेकिन यही मंगल जब सातवें घर के स्वामी ग्रह के साथ हो या उसके साथ दृष्टि संबंध बना रहा हो तब व्यक्ति का प्रेम विवाह होता है। जैसे सातवें घर में तुला या वृष राशि में हो तो उसका स्वामी शुक्र मंगल से चौथे, सातवें या आठवें घर में हो। शुक्र , शनि या राहु के साथ हो या शुक्र से सातवें घर में हो या अन्य स्थान से शनि राहु शुक्र को देख रहे हों तब प्रेम विवाह का योग बनता है। शुक्र अगर लग्न या सातवें घर के स्वामी के साथ हो या उसके साथ दृष्टि संबंध बना रहा हो तब व्यक्ति का प्रेम विवाह होता है। पंचमेश व सप्तमेश का किसी भी प्रकार से संबंध हो। लग्नेश व सप्तमेष का किसी प्रकार से संबंध हो । शुक्र की स्थिति बहुत अच्छी हो तो भी प्रेम विवाह में सफलता होती है। इस तरह कुंडली में और भी बहुत से योग रहते है, जो प्रेम विवाह के सूचक होते है।
 
ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय, वाराणसी 
9450537461